अंजान जी : चैती छठ, जिसे विशेष रूप से सूर्य देव और छठी मैया के समर्पण में मनाया जाता है, उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की छठी तिथि को मनाया जाता है, जिसमें व्रती 36 घंटे का कठिन निर्जला उपवास रखते हैं। इस उपवास में सूर्य देव की पूजा के साथ-साथ छठी मैया की भी पूजा की जाती है।
आचार्य संतोष के अनुसार चैती छठ का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, प्रकृति के प्रति आभार और परिवार की सुख-शांति की प्राप्ति का एक अद्भुत अवसर है। सूर्य देव की पूजा से जीवन में ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार होता है, जबकि छठी मैया की पूजा से संतान सुख, दीर्घायु और परिवार में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस पर्व में व्रती प्रकृति से जुड़ी ऊर्जा को स्वीकार करते हुए, अपने जीवन को शुद्ध और समृद्ध बनाने की कोशिश करते हैं।
सूर्य देव और छठी मैया की पूजा
इस पर्व का मुख्य उद्देश्य सूर्य देव और छठी मैया की पूजा करना होता है। सूर्य देव को जीवन का स्रोत और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जबकि छठी मैया को संतान सुख और समृद्धि की देवी के रूप में पूजा जाता है। व्रती इस दिन सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं और छठी मैया की पूजा करती हैं, जिससे परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान सुख की प्राप्ति के लिए किया जाता है। छठी मैया को संतान के स्वास्थ्य और दीर्घायु की देवी माना जाता है। इस पूजा से संतान को लंबी उम्र और खुशहाली प्राप्त होती है, साथ ही यह व्रत परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए सुख-समृद्धि और मानसिक शांति का कारण बनता है।
छठी मैया कौन हैं?
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, छठी मैया सृष्टि की रचयिता देवी प्रकृति का छठा भाग हैं। ये ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं और विशेष रूप से संतान सुख की प्राप्ति और बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए पूजी जाती हैं। छठी मैया को सूर्य देव की बहन भी माना जाता है, और इन्हें देवसेना के नाम से भी जाना जाता है।
छठी मैया की पूजा से परिवार में सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है। यह पूजा विशेष रूप से शिशुओं के जन्म के छह दिन बाद की जाती है, जिसमें बच्चों के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की जाती है। छठी मैया और कात्यायनी देवी के बीच गहरा संबंध है, क्योंकि दोनों ही देवी बच्चों की रक्षा और जीवन को सुखमय बनाने का आशीर्वाद देती हैं।
चैती छठ का पर्व चार प्रमुख दिनों में मनाया जाता है:
- नहाय-खाय (1 अप्रैल, 2025): इस दिन व्रती शुद्ध जल में स्नान करते हैं और पवित्र भोजन ग्रहण करते हैं।
- खरना (2 अप्रैल, 2025): इस दिन व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को गुड़ की खीर, रोटी और केले का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
- संध्या अर्घ्य (3 अप्रैल, 2025): व्रती छठ घाट या तालाब के किनारे जाकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
- उषा अर्घ्य और पारण (4 अप्रैल, 2025): व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं और व्रत का पारण करते हैं।
आचार्य संतोष ने बताया की चैती छठ न केवल एक धार्मिक व्रत है, बल्कि यह समाज में भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने वाला एक सांस्कृतिक उत्सव भी है। इस पर्व के माध्यम से लोग अपने रिश्तों को मजबूत करते हैं और सामूहिक रूप से सूर्य देव और छठी मैया की पूजा करते हैं। विशेष रूप से महिलाएं इस व्रत को श्रद्धा और विश्वास से करती हैं, क्योंकि छठी मैया को संतान सुख देने वाली देवी माना जाता है। चैती छठ का पर्व एक अद्भुत अवसर है, जिसमें न केवल सूर्य देव और छठी मैया की पूजा होती है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, प्रकृति के प्रति आभार और परिवार में सुख-समृद्धि की प्राप्ति का प्रतीक है।