क्या सौगात ए मोदी से बीजेपी साध पायेगी मुस्लिम मतदाताओं को ?

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दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की बीजेपी सरकार ने सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सब का प्रयास का मंत्र दिया है। पीएम मोदी के नेतृत्व में देश में हो रहे चौतरफा विकास का सबसे ज्यादा लाभ मुसलमान और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ही उठा रहे हैं। लेकिन देश के विपक्षी पार्टियों द्वारा कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के साथ मिलकर देश के गरीब मुसलमानों को नरेंद्र मोदी और बीजेपी के खिलाफ भड़काया जाता है और केंद्र कि मोदी सरकार का विरोध करने पर विवश कर देती है। संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव, बहरीन ,कुवैत, फलीस्तीन जैसे मुस्लिम देशों में पीएम मोदी भले ही डंका बजा चुके हों, पर पहले से जारी कयी योजनाओं के साथ “सौगात ए मोदी” से बीजेपी मुस्लिम मतदाताओं के बीच डंका बजा पायेगी इसमें संदेह है।

दरअसल,भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा ने ‘सौगात-ए-मोदी’ अभियान शुरू किया है। पार्टी ने आगामी दिनों में ईद के दौरान 32 लाख गरीब मुस्लिम परिवारों तक पहुंचने की योजना बनाई है। भाजपा ने जिला स्तर पर ईद मिलन समारोह आयोजित करने का फैसला भी लिया है। मोर्चा के 32,000 पदाधिकारी 32,000 मस्जिदों से संपर्क कर 32 लाख जरूरतमंद व्यक्तियों की पहचान करेंगे और उन्हें सहायता प्रदान करेंगे। उन्हें ईद मनाने में कोई परेशानी न हो, इसका ख्याल रखेंगे और उन्हें ईद मनाने के लिए जरूरी सामान उपलब्ध कराएंगे। ऐसे परिवारों को सौगात-ए-मोदी किट दिया जाएगा। हलांकि, यह अभियान सिर्फ अल्पसंख्यक मुसलमानों तक केंद्रित नहीं रहेगा। आने वाले समय में गुड फ्राइडे, नवरोज जैसे अल्पसंख्यकों के त्योहारों पर भी मोर्चा इसी तरह का अभियान चलाएगा, जिससे मुख्य पर्व मनाने में इन समुदायों के गरीब लोगों को आर्थिक परेशानी न हो। पर इस योजनाओं का शुभारंभ मुस्लिम अल्पसंख्यकों के पर्व ईद से किया जा रहा है।

बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा रमज़ान के महीने में मिस्कीन, कमजोर पड़ोसी और गरीब रिश्तेदारों की दिल खोलकर मदद करेगी, साथ ही मोर्चा गुड फ्राइडे, ईस्टर, नवरोज़ और भारतीय नववर्ष के आयोजनों में शामिल होकर जरूरतमंदों को ‘सौग़ात-ए- मोदी’ किट वितरीत कर गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल पेश करेगा। मोहन भागवत का यह कहना कि हिंदुस्तान मुसलमानों के बिना अधूरा है और नरेंद्र मोदी का मस्जिदों में जाना बड़े नीतिगत बदलाव का संकेत हैं। इस पर लोगों की राय भले ही बंटी हुई हो, पर क्या मुस्लिम मतदाता मोदी को अपनाने के लिए तैयार हैं और क्या मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन मोदी को चुनावों में मिलेगा, यह प्रश्न तो उठना लाजमी है।

सीएसडीएस-लोकनीति के लोकसभा चुनाव-पश्चात सर्वेक्षण से पता चलता है कि राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों के एक बड़े हिस्से ने गैर-भाजपा दलों को उत्साहपूर्वक वोट दिया। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भाजपा को मुस्लिम वोट नहीं मिले। सर्वेक्षण से यह भी पता चलता है कि बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 8% मुस्लिम वोट पाने में सफल रही। यह आंकड़ा लगभग भले ही नगण्य हो, फिर भी, उन महत्वपूर्ण कारकों की खोज करने की आवश्यकता है- जिनके कारण मुसलमानों के एक वर्ग ने इस चुनाव में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को वोट दिया।

केंद्र की मोदी की सरकार द्वारा चलाए जा रहे प्रधानमंत्री आवास योजना, जनधन योजना, उज्जवला योजना, सौभाग्य योजना, उस्ताद योजना, मुद्रा योजना समेत जितनी भी योजनाएं केंद्र सरकार की चल रही है , उसका सबसे ज्यादा लाभ मुसलमानों को ही मिला है। इसके अलावे उड़ान योजना, शादी शगुन योजना, उस्ताद योजना, सीखो और कमाओ योजना, ईदी योजना केंद्र सरकार की मुस्लिमो के लिए महत्वपूर्ण योजनाएँ हैं। केंद्र की मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता संभालते ही अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए बजट की राशि भी बढ़ा दी। इसके अलावा यह नरेंद्र मोदी की ही सरकार थी, जिसने सैकड़ों साल से तीन तलाक का दंश झेल रही मुस्लिम महिलाओं को कानून बनाकर उन्हें बराबर का हक दिलाने का काम किया। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने मुसलमानों के लिए सऊदी अरब से आग्रह कर न सिर्फ हज का कोटा बढ़वाया बल्कि उस पर लगने वाली जीएसटी को 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया। इसके अलावा नरेंद्र मोदी की सरकार ने ही 6 लाख से अधिक वक्फ बोर्ड और वक्फ संपत्तियों के कागजातों का डिजिटलीकरण करवाने का काम किया है जो सभी मुस्लिमो के उत्थान के लिए किए गए प्रमुख कार्य हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी ने भी मानते है कि उनका शासन मॉडल धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करता है, जबकि 2002 के बाद उनकी छवि को खराब करने के प्रयास किए गए थे। पीएम मोदी हर मंच से यह कहते आए हैं कि उनके सरकार की योजनाएं हर एक व्यक्ति के लिए हैं, इसका लाभ किसी जाति या धर्म को देखकर नहीं दिया जाता, लेकिन 2002 से लेकर अब तक एक वर्ग हमेशा से यह मानता आया है कि बीजेपी केवल हिंदुओं की पार्टी है। मुसलमानों की स्थिति इस सरकार में ठीक नहीं है। मोदी एक समुदाय की बस सुनते हैं। एक निजी चैनल को दिए इंटरव्यू में मोदी ने ऐसे लोगों की भी गलतफहमी दूर की जो उन्हें मुसलमानों का दुश्मन मानते हैं। मोदी ने कहा कि मैं बचपन में मुस्लिम परिवारों के बीच रहा हूं, और मेरे कई मुस्लिम दोस्त भी हैं।

मुसलमानों की दुनिया में मोदी की स्वीकार्यता का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि मुस्लिम देश उन्हें अपना सबसे बड़ा सम्मान दे रहे हैं, मुस्लिमों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पाकिस्तान की मुखालफत के बाद भी भारत को जगह दिया जाता है। यह बड़े बदलाव का संकेत है जिसका असर पूरी दुनिया में दिखाई पड़ रहा है। पीएम मोदी मुस्लिम समाज और उनके पढ़े-लिखे लोगों से कहते रहें हैं कि आप आत्ममंथन कीजिए। सोचिए, देश इतना आगे बढ़ रहा है। कमी अगर आपके समाज में महसूस होती है तो क्या कारण है? सरकार की व्यवस्थाओं का लाभ कांग्रेस के जमाने में आपको क्यों नहीं मिला? क्या कांग्रेस के कालखंड में इस दुर्दशा का शिकार हुए हैं? आपको आत्ममंथन करने की जरूरत है। एक बात तय कीजिए कि आपके मन में जो चल रहा है कि सत्ता पर हम बिठाएंगे, हम उतारेंगे। उससे आप अपने बच्चों का भविष्य खराब कर रहे हैं।

इससे कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि मुस्लिम समाज में बीजेपी के लिए अभी भी संकोच है। वह खुलकर भाजपा के साथ नहीं आ रहा है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि पढ़े-लिखे मुस्लिमों के अंदर एक हलचल है, यह समझने के लिए कि क्या वाकई भाजपा उनके लिए ठीक नहीं है। मुस्लिम राष्ट्रों के बीच मोदी की लोकप्रियता ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। इससे पाकिस्तान की मुस्लिम परस्त राजनीति का भी पर्दाफाश हुआ है। इन्हीं पढ़े लिखे मुस्लिमो से पीएम मोदी ने यह कहकर पार्टी में अपनी भागीदारी बढाने के लिए संदेश भी दिया है कि आप कब्जा करो न बीजेपी कार्यालय में जाकर। कौन रोकता है आपको?

पर यह दावा किया जाता है कि मुसलमानों ने निर्वाचन क्षेत्र स्तर पर भाजपा उम्मीदवारों को हराने के लिए रणनीतिक मतदान करने का फैसला करते हैं । यह स्पष्टीकरण बिल्कुल गलत नहीं तो बिल्कुल सही भी नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि, समुदाय के एक छोटे से हिस्से ने अलग-अलग कारणों से भाजपा को स्वीकार किया। हो सकता है राज्य स्तरीय कारक हावी रहे हों या लाभार्थी कार्ड काम आया हो या फिर वर्ग भी एक निर्धारक रहे हों। पर अब देखना दिलचस्प होगा कि सौगात-ए-मोदी का असर मुस्लिम मतदाताओं खासकर बिहार के मुस्लिम मतदाताओं पर कितना होता है। क्योंकि इस साल बिहार में ही चुनाव होने हैं।

संजय कुमार विनीत
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

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