– आचार्य संतोष, ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य
हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व शक्ति, भक्ति, साधना और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। वर्ष में प्रमुख रूप से दो नवरात्रियां- चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि- विशेष श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई जाती हैं। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। भक्तजन माता से सुख, शांति, समृद्धि, आरोग्य और परिवार के कल्याण की कामना करते हैं। नवरात्रि के दौरान देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहन को लेकर भी धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इन मान्यताओं के अनुसार, माता किस वाहन पर सवार होकर आती हैं और किस वाहन से विदा होती हैं, इसका निर्धारण विशेष तिथियों और सप्ताह के वार के आधार पर किया जाता है।
देवी के वाहन निर्धारण का आधार
हिंदू धार्मिक परंपरा में देवी भागवत पुराण के संदर्भ से एक प्रसिद्ध श्लोक उद्धृत किया जाता है, जिसमें देवी के वाहन और उनसे संबंधित शुभ-अशुभ फलों का वर्णन मिलता है। यह श्लोक नवरात्रि में देवी के गमन के वाहन की व्याख्या के लिए प्रचलित है।
श्लोक –
शशिसूर्ये दिने यदि सा विजया महिषागमने रुज शोककरा,
शनिभौमदिने यदि सा विजया चरणायुध यानिकरी विकला।
बुधशुक्रदिने यदि सा विजया गजवाहनगा शुभवृष्टिकरा,
सुरराजगुरौ यदि सा विजया नरवाहनगा शुभसौख्यकरा॥
इस श्लोक का सामान्य भावार्थ यह है कि विजयादशमी के दिन के अनुसार देवी के प्रस्थान के वाहन की कल्पना की जाती है और प्रत्येक वाहन को अलग-अलग फल से जोड़ा जाता है। इस परंपरा में रविवार और सोमवार को महिष, मंगलवार और शनिवार को चरणायुध अथवा मुर्गा, बुधवार और शुक्रवार को गज अर्थात हाथी तथा गुरुवार को नर वाहन का उल्लेख मिलता है।
1. रविवार या सोमवार को विजयादशमी: महिष वाहन
मान्यता के अनुसार, यदि विजयादशमी रविवार या सोमवार को पड़ती है, तो मां दुर्गा का प्रस्थान महिष अर्थात भैंसे के वाहन पर माना जाता है। पारंपरिक फलादेश में इस वाहन को रोग, शोक और कठिन परिस्थितियों से जोड़कर देखा गया है।
धार्मिक प्रतीकवाद में महिष का संबंध भारीपन, संघर्ष और प्रतिकूल परिस्थितियों से जोड़ा जाता है। इसलिए इस वाहन के उल्लेख को सावधानी, संयम और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश देने वाली मान्यता के रूप में भी समझा जा सकता है। ऐसी स्थिति में भक्तजन मां दुर्गा की आराधना करते हुए परिवार तथा समाज के आरोग्य, शांति और कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
हालांकि, इस मान्यता का अर्थ यह नहीं है कि रविवार या सोमवार को विजयादशमी पड़ने से वास्तव में रोग या शोक बढ़ना निश्चित है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या का आकलन वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आधार पर ही किया जाना चाहिए।
2. मंगलवार या शनिवार को विजयादशमी: चरणायुध अथवा अश्व वाहन
प्रचलित धार्मिक व्याख्याओं में मंगलवार या शनिवार को विजयादशमी पड़ने पर देवी के प्रस्थान के संबंध में चरणायुध, अर्थात मुर्गे, अथवा अश्व यानी घोड़े का उल्लेख मिलता है। इन प्रतीकों को कुछ परंपराओं में अशांति, संघर्ष, कष्ट या उथल-पुथल की आशंका से जोड़ा जाता है।
घोड़ा गति, शक्ति, साहस और परिवर्तन का प्रतीक है। वहीं मुर्गे को जागरूकता और सतर्कता के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है। इस दृष्टि से ऐसी मान्यताओं का सकारात्मक संदेश यह हो सकता है कि समाज को कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना चाहिए, निर्णय सोच-समझकर लेने चाहिए और आपसी सहयोग को प्राथमिकता देनी चाहिए।
3. बुधवार या शुक्रवार को विजयादशमी: गज वाहन
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि विजयादशमी बुधवार या शुक्रवार को पड़ती है, तो मां दुर्गा का प्रस्थान गज अर्थात हाथी पर माना जाता है। हाथी को भारतीय संस्कृति में ऐश्वर्य, स्थिरता, शक्ति, बुद्धिमत्ता और मंगल का प्रतीक माना गया है। इस वाहन को शुभ वर्षा, कृषि की उन्नति, सुख-समृद्धि और जनकल्याण से जोड़कर देखा जाता है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में वर्षा का विशेष महत्व है। अच्छी वर्षा से खेतों में फसलें लहलहाती हैं, जलस्रोतों का स्तर सुधरता है और किसानों की आजीविका को सहारा मिलता है। इसी कारण देवी के हाथी पर गमन को परंपरागत रूप से वर्षा और समृद्धि के अनुकूल संकेत के रूप में देखा जाता है।
यह मान्यता भारतीय समाज की कृषि आधारित जीवनशैली और प्रकृति के प्रति श्रद्धा को भी दर्शाती है। भक्तजन ऐसी स्थिति में मां दुर्गा से प्रार्थना करते हैं कि धरती पर पर्याप्त वर्षा हो, किसानों को अच्छी फसल मिले और सभी के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहे। फिर भी वास्तविक वर्षा का निर्धारण मौसम संबंधी परिस्थितियों से होता है; वाहन संबंधी धार्मिक मान्यता को मौसम का वैज्ञानिक पूर्वानुमान नहीं समझना चाहिए।
4. गुरुवार को विजयादशमी: नर वाहन
मान्यता के अनुसार, यदि विजयादशमी गुरुवार को पड़ती है, तो मां दुर्गा का प्रस्थान नर वाहन अर्थात मनुष्य या पालकी से माना जाता है। इस वाहन को समाज में सुख, शांति, सौहार्द और कल्याण की वृद्धि का प्रतीक बताया गया है।
गुरुवार का संबंध धार्मिक परंपरा में गुरु, ज्ञान, धर्म और सदाचार से जोड़ा जाता है। नर वाहन की कल्पना को इस दृष्टि से सामाजिक सहयोग, मानवीय मूल्यों और सामूहिक उन्नति का संदेश देने वाला माना जा सकता है। यह मान्यता प्रेरित करती है कि समाज में परस्पर सम्मान, सहिष्णुता और सद्भाव बना रहे तथा लोग एक-दूसरे की सहायता के लिए आगे आएं।
मां दुर्गा की उपासना का मूल उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सुख-समृद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज में धर्म, न्याय, करुणा और सकारात्मकता की स्थापना करना भी है। इसलिए नर वाहन से संबंधित शुभ फल को मानवीय संबंधों की मजबूती और सामूहिक कल्याण की कामना के रूप में समझा जा सकता है।
आगमन और प्रस्थान के वाहन में अंतर
नवरात्रि के दौरान देवी के आगमन और प्रस्थान के वाहन को लेकर अलग-अलग नियम प्रचलित हैं। कई परंपराओं में आगमन के वाहन का निर्धारण नवरात्रि के प्रारंभिक दिन और उस दिन के वार के आधार पर किया जाता है, जबकि प्रस्थान के वाहन के लिए विजयादशमी के वार को देखा जाता है। कुछ पंचांगों में तिथि और वार के विशेष संयोग के अनुसार भी व्याख्या की जाती है।
धार्मिक मान्यताओं का वास्तविक संदेश
मां दुर्गा के वाहनों से जुड़ी परंपरा भारतीय धार्मिक संस्कृति की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। इसके माध्यम से प्रकृति, कृषि, समाज, स्वास्थ्य और जनजीवन के प्रति लोगों की चिंताओं को धार्मिक भाषा में व्यक्त किया गया है। प्राचीन भारतीय समाज में पंचांग, ऋतुचक्र और धार्मिक पर्वों का दैनिक जीवन से गहरा संबंध था। ऐसे में देवी के वाहन को लेकर प्रचलित मान्यताएं लोगों को आने वाले समय के प्रति सजग रहने और सामूहिक कल्याण की कामना करने की प्रेरणा देती रही हैं।
नवरात्रि का वास्तविक संदेश भय या आशंका नहीं, बल्कि शक्ति, साहस, आत्मसंयम और सकारात्मक कर्म है। मां दुर्गा महिषासुर का वध करके अन्याय और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक प्रस्तुत करती हैं। उनका प्रत्येक स्वरूप मनुष्य को किसी न किसी सद्गुण की प्रेरणा देता है। इसलिए वाहन संबंधी मान्यताओं को समझते समय देवी की आराधना के मूल भाव – सदाचार, करुणा, न्याय और लोककल्याण – को प्राथमिकता देनी चाहिए।
नवरात्रि में मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान के वाहन का निर्धारण हिंदू धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व रखता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, रविवार या सोमवार को विजयादशमी होने पर महिष वाहन, मंगलवार या शनिवार को चरणायुध अथवा अश्व वाहन, बुधवार या शुक्रवार को गज वाहन तथा गुरुवार को नर वाहन से देवी के प्रस्थान की व्याख्या की जाती है। इन वाहनों को क्रमशः विभिन्न शुभ-अशुभ संकेतों से जोड़ा गया है।
लेकिन इन मान्यताओं को निश्चित भविष्यवाणी या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखना चाहिए। इनका उद्देश्य धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और जीवन के प्रति सजग दृष्टिकोण को अभिव्यक्त करना है। मां दुर्गा की सच्ची आराधना तभी सार्थक है, जब हम अपने जीवन में सत्य, साहस, सेवा, सद्भाव और न्याय को अपनाएं।
मां दुर्गा से यही प्रार्थना है कि सभी के जीवन से भय और निराशा दूर हों, समाज में सुख-शांति बनी रहे, किसानों को समृद्धि मिले और संपूर्ण मानवता का कल्याण हो। जय माता दी!

आचार्य संतोष
ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य
https://wa.me/c/919934324365
Make an Appointment
See on Google
Reviews : https://g.page/r/CahjHRndp1TjEAE/reviewhttps://share.google/rcndENQZwdAj5IjmF
