नीतीश का सियासी प्रस्थान: बिहार की राजनीति में एक युग का अंत

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Anjaan Jee : Editor in Chief & Publisher

बिहार की राजनीति में पिछले पांच दशकों से प्रभावी रहे समाजवादी दौर का एक महत्वपूर्ण अध्याय अब समाप्ति की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा जाने का फैसला केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि राज्य की राजनीतिक संस्कृति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत भी है।

लगभग पचास वर्षों तक बिहार की राजनीति तीन प्रमुख नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही-लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार। इन तीनों नेताओं ने न केवल सत्ता के समीकरण तय किए, बल्कि राज्य के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को भी गहराई से प्रभावित किया। अब जब यह त्रयी धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति के केंद्र से दूर होती दिख रही है, तो बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है।

इस राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 1970 के दशक के उस ऐतिहासिक छात्र आंदोलन से मानी जाती है, जिसका नेतृत्व समाजवादी चिंतक जयप्रकाश नारायण ने किया था। उसी आंदोलन की पृष्ठभूमि से लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे नेता उभरे। इन नेताओं ने सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा दी और समाज के वंचित वर्गों को सत्ता में भागीदारी दिलाने का प्रयास किया।

साल 1990 में लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री बनने के साथ बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय का एक नया अध्याय शुरू हुआ। पिछड़े और दलित वर्गों को राजनीतिक आवाज मिली। हालांकि समय के साथ सत्ता के केंद्रीकरण, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों ने इस आंदोलन की छवि को भी प्रभावित किया।

रामविलास पासवान ने दलित राजनीति को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। वे गठबंधन राजनीति के कुशल रणनीतिकार माने जाते थे और लंबे समय तक केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। लेकिन समय के साथ उनकी राजनीतिक विरासत भी परिवार के भीतर सिमटती नजर आई।

इसी बीच नीतीश कुमार ने ‘सुशासन’ और विकास की राजनीति को आगे बढ़ाने की कोशिश की। उनके शासनकाल में सड़क, बिजली, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में कई बदलाव देखने को मिले। हालांकि उनकी बदलती राजनीतिक साझेदारियों को लेकर समय-समय पर आलोचनाएं भी होती रहीं।

अब जब नीतीश कुमार राज्यसभा की ओर बढ़ रहे हैं, तो बिहार की राजनीति एक संक्रमण काल से गुजरती दिखाई दे रही है। एक ओर नई पीढ़ी के नेता उभर रहे हैं-जैसे तेजस्वी यादव और चिराग पासवान-तो दूसरी ओर नई राजनीतिक विचारधाराएं और प्रयोग भी सामने आ रहे हैं।

आज का बिहार 1990 के दशक के बिहार से काफी अलग है। राज्य की युवा आबादी तेजी से बढ़ी है और अब रोजगार, शिक्षा, उद्योग और आर्थिक विकास जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आते जा रहे हैं। जातीय समीकरण अभी भी प्रभावी हैं, लेकिन उनके साथ विकास की राजनीति भी अपनी जगह बना रही है।

ऐसे में नीतीश कुमार का सक्रिय सत्ता राजनीति से हटना केवल एक नेता के पद परिवर्तन भर नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक दौर के धीरे-धीरे समाप्त होने का संकेत है जिसने दशकों तक बिहार की दिशा तय की। अब देखना यह है कि आने वाला समय नई सोच और नई राजनीति को कितना अवसर देता है।

बिहार की जनता के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है-क्या राज्य की राजनीति अब जातीय समीकरणों से आगे बढ़कर विकास, सुशासन और अवसर की नई कहानी लिख पाएगी? आने वाले वर्षों में इसी सवाल का जवाब बिहार की नई राजनीतिक पटकथा तय करेगा।

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