
– आचार्य संतोष जी
भारतीय संत परंपरा में अनेक ऐसी घटनाएँ मिलती हैं जो केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन का गहरा दर्शन प्रस्तुत करती हैं। ऐसी ही एक प्रेरक घटना महान संत संत मलूक दास के जीवन से जुड़ी हुई है, जो हमें विश्वास, समर्पण और ईश्वर की अद्भुत व्यवस्था का संदेश देती है।
कहा जाता है कि एक बार संत मलूक दास के मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा- यदि परमात्मा वास्तव में कण-कण में व्याप्त है और वही सबका पालनहार है, तो क्या वह मुझे बिना मांगे भी भोजन करा सकता है? क्या वह मुझे इस निर्जन जंगल में भी खोज लेगा?
इस विचार के साथ उन्होंने एक प्रकार का आध्यात्मिक प्रयोग करने का निश्चय किया। वे एक सुनसान जंगल में पहुँचे और एक विशाल बरगद के पेड़ की ऊँची डाल पर जाकर बैठ गए। उन्होंने अपने मन में प्रतिज्ञा कर ली- “न मैं हाथ हिलाऊँगा और न ही अपना मुँह खोलूँगा। अब देखता हूँ कि ईश्वर मुझे कैसे भोजन कराते हैं।”

दिन ढलने लगा। धीरे-धीरे शाम हो गई और भूख से उनका शरीर कमजोर होने लगा, लेकिन उनका संकल्प अडिग था। तभी संयोग से उस रास्ते से एक राजा का काफिला गुजरा। उनके साथ राजसी भोजन-छप्पन भोग-सजाकर लाया गया था। अचानक डाकुओं के भय से काफिला वहाँ से जल्दी-जल्दी भाग गया और भोजन वहीं छूट गया।
अब पेड़ के नीचे स्वादिष्ट भोजन के थाल सजे थे, लेकिन संत मलूक दास अपनी प्रतिज्ञा के कारण नीचे नहीं उतरे। तभी थोड़ी देर बाद जंगल से डाकुओं का एक गिरोह वहाँ आ पहुँचा। उन्होंने जब इतने कीमती बर्तनों में सजा भोजन देखा तो उन्हें संदेह हुआ कि कहीं यह कोई जाल तो नहीं।
तभी एक डाकू की नजर ऊपर पेड़ पर बैठी आकृति पर पड़ी। उन्होंने संत मलूक दास को नीचे उतार लिया। सरदार ने तलवार दिखाते हुए कठोर स्वर में कहा कि यदि खाने में जहर नहीं है तो पहले वह स्वयं खाकर दिखाए।

संत मलूक दास ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार न हाथ हिलाया और न ही मुँह खोला। यह देखकर डाकुओं को लगा कि सचमुच भोजन में जहर है। उन्होंने जबरदस्ती उनका मुँह खोलकर उन्हें वही भोजन खिलाना शुरू कर दिया। देखते-देखते उनका पेट भर गया।
उस समय संत मलूक दास की आँखों से आँसू निकल पड़े। उन्होंने आकाश की ओर देखकर मन ही मन कहा- “हे प्रभु! तेरी लीला भी अद्भुत है। मैं हाथ नहीं उठाना चाहता था, तो तूने डाकुओं से मेरे हाथ पकड़वा दिए। मैं मुँह नहीं खोलना चाहता था, तो तूने भय दिखाकर मुँह खुलवा दिया। तू सचमुच सबका पालनहार है।”
डाकुओं को जब यह बात समझ में आई कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि एक सिद्ध संत हैं, तो वे उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगने लगे।
कहा जाता है कि इसी घटना के बाद संत मलूक दास ने वह प्रसिद्ध दोहा कहा-
“अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कहि गए, सब के दाता राम॥”
इस दोहे का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य कर्म करना छोड़ दे। इसका वास्तविक संदेश यह है कि जीवन में अहंकार छोड़कर परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिए। मनुष्य को कर्म अवश्य करना चाहिए, लेकिन यह स्मरण रहे कि कर्म करने की शक्ति, अवसर और फल-सब उसी परम सत्ता की देन हैं।
आज के व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन में यह कथा हमें याद दिलाती है कि विश्वास और समर्पण के बिना जीवन अधूरा है। जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वर पर भरोसा करता है, तब परिस्थितियाँ भी उसके पक्ष में बदलने लगती हैं।

संत परंपरा का यही संदेश है-
परिश्रम करो, लेकिन अंतिम भरोसा उस परम शक्ति पर रखो, जो पूरे संसार का पालन करती है।
– आचार्य संतोष
(ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य)
(वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक)
वास्तु शुद्धि और जन्म कुंडली जागरण के लिए
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