– एस०एन०चतुर्वेदी की रिपोर्ट
लोकतंत्र की प्रथम धरती वैशाली से 160 लोकतांत्रिक देशों तक बज्जिका भाषा और संस्कृति पहुंचाने का लिया गया संकल्प
पटना/दरभंगा, 23 जुलाई। बिहार राज्य बज्जिका विकास परिषद का 31वां स्थापना दिवस समारोह दरभंगा स्थित तारामंडल सभागार में गरिमामय एवं सांस्कृतिक वातावरण में आयोजित किया गया। समारोह में बज्जिका भाषा के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक विस्तार पर विशेष जोर दिया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बज्जिका साहित्य के वरिष्ठ हस्ताक्षर देवेंद्र राकेश ने की, जबकि संचालन परिषद के पूर्व महासचिव डॉ. ओंकार प्रसाद सिंह ने किया।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में परिषद के नए पदाधिकारियों का सर्वसम्मति से चुनाव संपन्न हुआ। डॉ. ब्रह्मदेव प्रसाद कार्यी को अध्यक्ष, डॉ. विद्या चौधरी एवं प्रो. हरिनारायण सिंह हरि को उपाध्यक्ष, डॉ. ओंकार प्रसाद सिंह को महासचिव, मनोज कुमार सिन्हा को सचिव, अश्विनी कुमार आलोक को साहित्य संभाग सचिव तथा अमित कुमार मंडल को कोषाध्यक्ष चुना गया।

द्वितीय सत्र में आयोजित “प्रगति पथ पर बज्जिका” विषयक विचार गोष्ठी में मुख्य अतिथि ओम प्रकाश खेड़िया ने बज्जिका भाषा को भारतीय संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग दोहराई। मुख्य वक्ता प्रो. हरिनारायण सिंह हरि ने अपने शोध आलेख के माध्यम से विद्यापति, रहमतुल्ला सहित अनेक साहित्यकारों के योगदान का उल्लेख करते हुए बज्जिका साहित्य की समृद्ध परंपरा और विकास यात्रा पर प्रकाश डाला।
वरिष्ठ पत्रकार एवं मानवाधिकार टुडे के संपादक डॉ. शशि भूषण कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र की प्रथम धरती वैशाली की मातृभाषा बज्जिका और उसकी सांस्कृतिक विरासत को विश्व के 160 लोकतांत्रिक देशों तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया है। उन्होंने बताया कि इस अभियान के तहत अब तक बज्जिका भाषा और संस्कृति को सार्क देशों के अलावा थाईलैंड और मॉरीशस सहित 10 देशों तक पहुंचाया जा चुका है तथा इसे आगे और विस्तार देने की दिशा में लगातार कार्य किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि इस वैश्विक अभियान में नेपाल के राजू लामा एवं निर्पेंद्र लाल श्रेष्ठ, श्रीलंका के राहुल समांथा, थाईलैंड के डॉ. पी.सी. चंद्रा तथा मॉरीशस की समाजसेवी डॉ. सरिता बुद्धू का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त हो रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की भाषा और संस्कृति उसकी पहचान होती है और इसे वैश्विक मंच तक पहुंचाने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता अमिय कश्यप ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार में सिनेमा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने भविष्य में बज्जिका भाषा में फिल्म निर्माण का संकल्प व्यक्त करते हुए कहा कि इसके माध्यम से भाषा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल सकती है।
डॉ. विद्या चौधरी ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाएं हिंदी की आधारशिला हैं और इनके विकास से हिंदी को कोई खतरा नहीं है। उन्होंने लोगों से आगामी जनगणना में अपनी मातृभाषा के रूप में बज्जिका दर्ज कराने का आह्वान किया।
पद्मश्री राजकुमारी देवी ने मातृभाषा के संरक्षण में परिवार की भूमिका पर बल देते हुए कहा कि यदि घरों में बच्चों को बज्जिका बोलने के लिए प्रेरित किया जाएगा, तभी भाषा और संस्कृति सुरक्षित रह सकेगी। उन्होंने “सुधरेंगे हम, सुधरेगा जग” का संदेश देते हुए मातृभाषा के अधिकाधिक प्रयोग की अपील की।
शिक्षाविद् राजाराम चौरसिया ने कहा कि मातृभाषा किसी भी समाज की संस्कृति और पहचान का मूल आधार होती है। उन्होंने नई पीढ़ी को अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। पद्मश्री सीवन पासवान, हीरालाल सहनी सहित अन्य वक्ताओं ने भी बज्जिका को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए व्यापक जनभागीदारी का आह्वान किया।

कार्यक्रम के दौरान डॉ. विशाल भारद्वाज द्वारा लिखित ‘संक्षिप्त वाल्मीकि रामायण (कथा सार)’ के डॉ. ब्रह्मदेव प्रसाद कार्यी द्वारा किए गए बज्जिका अनुवाद का लोकार्पण भी किया गया।
समारोह के अंतर्गत आयोजित कवि सम्मेलन में इंदिरा भारती, अमिताभ कुमार सिन्हा, सूबेदार नंदकिशोर साहु, आशीष अकिंचन, डॉली कुमारी, अमरजीत अमर, उदय शंकर चौधरी ‘नादान’, अतुल कुमार मिश्र, मुकेश झा, रितु प्रज्ञा, डॉ. मनीष कुमार, अशोक भगत, प्रकाशचंद्र प्रभाकर एवं सुरभि लाल दास सहित अनेक कवियों ने मातृभाषा, संस्कृति और समाज पर आधारित अपनी रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किया।
समारोह का धन्यवाद ज्ञापन हंसराज साह ने किया। कार्यक्रम में साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता, कला, संस्कृति एवं सामाजिक क्षेत्र से जुड़े बड़ी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

