
गाय और गोबर का संबंध गौरैया के संरक्षण में बेहद महत्वपूर्ण है। जहां गाय और गोबर होता है, वहां गौरैया भी दिखाई देती है। इसकी एक प्रमुख वजह यह है कि गौरैया गाय के गोबर में मौजूद अपचे भोजन के दानों को खाती है। वहीं, गोबर के सड़ने पर उसमें पनपने वाले कैटरपिलर यानी पिल्लू और अन्य छोटे कीड़े-मकोड़े उसके बच्चों के लिए प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत बनते हैं।
गौरैया के बच्चों को केवल दाना ही नहीं, बल्कि प्रोटीन के लिए बड़ी मात्रा में कीड़े-मकोड़ों की भी आवश्यकता होती है। गोबर में मक्खियां, गुबरैले, छोटे-छोटे लार्वा और अन्य जीव खूब पनपते हैं। ये गौरैया के बच्चों के लिए पौष्टिक आहार का काम करते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि गोबर नहीं होगा तो कीड़े कम होंगे और कीड़ों की कमी का असर गौरैया के बच्चों के पालन-पोषण पर भी पड़ेगा।
गाय गोबर के साथ अधपचे बीज भी छोड़ देती है। बाजरा, ज्वार और गेहूं जैसे अनाज के दाने गौरैया गोबर में से चुन-चुनकर खाती है। इस तरह गोबर उसके लिए प्राकृतिक दाना-पानी का स्रोत भी बन जाता है।

पुराने समय में लोग घरों की लिपाई-पुताई गाय के गोबर से करते थे। घोंसले भी कई बार गोबर, मिट्टी और घास की मदद से बनाए जाते थे। गोबर से बने घोंसले सर्दियों में अपेक्षाकृत गर्म और गर्मियों में ठंडे रहते हैं। साथ ही, गोबर की गंध कई छोटे जीवों को दूर रखने में भी सहायक होती है।
मंदार नेचर क्लब, भागलपुर के संयोजक एवं पक्षी विशेषज्ञ अरविंद मिश्रा के अनुसार, गाय, गोबर और गौरैया का संबंध काफी पुराना है। वे बताते हैं कि जहां गायें रहती हैं, वहां गौरैया भी पहुंचती है। गायों के रहने वाले स्थानों पर पड़े गोबर के आसपास गौरैया को भोजन तलाशते आसानी से देखा जा सकता है। गोबर से निकलने वाले कीड़े और उसमें मौजूद अपचे अनाज के दाने गौरैया अपने बच्चों को खिलाती है।
गौरैया खेत-खलिहान, बथान और खटाल से अपना भोजन तलाश लेती है। लेकिन कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से खेतों और सब्जियों से कीड़े-मकोड़े कम होते जा रहे हैं। इसका सीधा असर गौरैया के बच्चों के भोजन पर पड़ रहा है। बड़ी गौरैया धान-चावल और अन्य अनाज से अपना पेट भर लेती है, लेकिन अपने बच्चों के लिए उसे कीड़े-मकोड़े तलाशने पड़ते हैं।
जब से फसलों और साग-सब्जियों की पैदावार में कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर प्रयोग होने लगा है, खेतों में कीड़े-मकोड़ों की संख्या घट रही है। ऐसे में गौरैया को अपने बच्चों के लिए पर्याप्त प्रोटीनयुक्त आहार नहीं मिल पाता। यही कारण है कि गौरैया गोबर के आसपास भी भोजन तलाशती दिखाई देती है। विशेषकर मार्च से जून के बीच यह गतिविधि अधिक देखने को मिलती है।
जब तक गौरैया के बच्चे खुद भोजन करना नहीं सीख जाते, तब तक माता-पिता उन्हें भोजन कराते हैं। इस दौरान वे खास तौर पर पिल्लू और अन्य छोटे कीड़े लाकर बच्चों को खिलाते हैं। गांवों में गौरैया को खेत-खलिहान, बथान और खटाल से अपने बच्चों के लिए आसानी से भोजन मिल जाता है।
शहरों में स्थिति थोड़ी अलग है। फिर भी कई लोग घरों में गाय पालते हैं और अनेक स्थानों पर खटाल भी संचालित होते हैं। ऐसे स्थानों पर गौरैया आसानी से दिखाई देती है। मेरे घर के पास स्थित एक गाय के खटाल में मैं सुबह-शाम गौरैया को अपने बच्चों के लिए भोजन तलाशते देखता हूं। वह गोबर से निकलने वाले कीड़े या उसमें पड़े अनाज के दाने अपने बच्चों के लिए ले जाती है।

घरेलू गौरैया इंसानों के घरों में बसेरा बनाकर रहने के कारण वहां रखे अनाज को भी आसानी से अपना भोजन बना लेती है। घर-आंगन में गिरे अनाज के दाने चुगने के लिए गौरैया झुंड में आती है। हालांकि, बच्चों के शुरुआती विकास के दौरान वह उन्हें मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़े ही खिलाती है।
गोबर के अलावा गौरैया पेड़-पौधों पर लगे कीड़ों को भी तलाशती रहती है। वह अपने छोटे बच्चों को पिल्लू के साथ-साथ पौधों की कोमल पत्तियां भी खिलाती है। मैंने कई बार गौरैया को ऐसा करते देखा है। वह कोमल पत्ती को तोड़कर घोंसले में ले जाती है और बच्चे को खिलाती है। इसके लिए वह पेड़-पौधों का चयन भी स्वयं करती है। इस मामले में उसका अपना प्राकृतिक विज्ञान काम करता है।
धान, चावल, घास और अन्य पौधों के बीज से बड़ी गौरैया अपना पेट तो भर लेती है, लेकिन अपने बच्चों के लिए कीड़े तलाशती रहती है। बच्चे जब उड़ने लगते हैं, तब गाय और गोबर के आसपास गौरैया को अक्सर झुंड में देखा जा सकता है। अगर एक गौरैया वहां पहुंचती है तो कुछ ही देर में कई अन्य गौरैया भी वहां आ जाती हैं।
जब बच्चे घोंसले से निकलकर अपने माता-पिता के साथ उड़ने लगते हैं, तब गौरैया के माता-पिता उन्हें भोजन तलाशने वाले स्थानों पर ले जाते हैं। खासकर खटाल और बथान जैसे स्थानों पर, जहां गायें और गोबर के ढेर होते हैं, वे बच्चों को कीड़े पकड़ना और खाना सिखाते हैं।
माता-पिता गौरैया बच्चों को एक-दो बार भोजन खिलाने के बाद उन्हें खुद भोजन तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। बच्चा यदि पंख फैलाकर चीं-चीं की आवाज करते हुए भोजन मांगता रहता है, तो माता-पिता कभी उससे दूर हट जाते हैं और कभी चोंच से उसे पीछे करते हैं। जब बच्चा फिर भी नहीं मानता तो वे फुर्र से उड़ जाते हैं। यह प्रकृति की वह पाठशाला है, जहां गौरैया का बच्चा धीरे-धीरे आत्मनिर्भर होना सीखता है।
हालांकि, यह भी सच है कि जहां गाय और गोबर नहीं होता, वहां भी गौरैया का वास होता है। लेकिन गाय, गोबर और उससे जुड़े कीड़े-मकोड़े उसके प्राकृतिक आहार-चक्र और विशेषकर बच्चों के पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए गौरैया संरक्षण की चर्चा केवल दाना-पानी तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके प्राकृतिक आवास, जैव-विविधता और कीटों की उपलब्धता पर भी ध्यान देना जरूरी है।
“गोबर बचेगा, कीड़े बचेंगे; कीड़े बचेंगे, तो गौरैया के बच्चे भी चहकेंगे।”

