हरतालिका तीज : तप, प्रेम और अखंड सौभाग्य का ज्योतिषीय पर्व

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 – आचार्य संतोष, ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य (वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक)

हरतालिका तीज भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला अत्यंत पवित्र व्रत है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन, नारी के संकल्प, तपस्या और अखंड दांपत्य-सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक परंपरा में सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु, आरोग्य और सुखी दांपत्य जीवन के लिए तथा अविवाहित कन्याएं मनोनुकूल एवं योग्य जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं।

हरतालिका तीज सोमवार, 14 सितंबर को मनाई जाएगी। पंचांग गणना के अनुसार भाद्रपद शुक्ल तृतीया 13 सितंबर को प्रातः लगभग 7:09 बजे आरंभ होकर 14 सितंबर को प्रातः लगभग 7:08 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर 14 सितंबर को व्रत रखना प्रमुख मत है।

अलग-अलग पंचांगों और स्थान के अनुसार समय में कुछ मिनट का अंतर संभव है, इसलिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना उचित रहेगा।

हरतालिका नाम की सार्थकता

‘हरतालिका’ शब्द को परंपरागत रूप से ‘हर’ और ‘आलिका’ से जोड़ा जाता है। कथा के अनुसार माता पार्वती की सखियां उन्हें वन में ले गईं, ताकि वे भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के अपने संकल्प के लिए कठोर तपस्या कर सकें। इसी कारण इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा।

यह कथा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास और साधना का भी प्रतीक है।

शास्त्रीय भाव और प्रमुख श्लोक

हरतालिका व्रत की पूजा में शिव-पार्वती की आराधना के साथ पारंपरिक संस्कृत स्तुति एवं मंत्रों का पाठ किया जाता है। प्रचलित हरतालिका व्रत-पाठ में यह मंगलाचरण मिलता है-

इसका भाव है- मन्दार पुष्पों से सुशोभित माता पार्वती और कपालमाला धारण करने वाले भगवान शिव को प्रणाम। यह श्लोक शिव और शक्ति के अद्वैत स्वरूप तथा उनके दिव्य मिलन का स्मरण कराता है।

पूजन के दौरान “ॐ नमः शिवाय” तथा माता पार्वती के नाम-स्मरण का जाप भी किया जाता है।

ज्योतिषीय दृष्टि से हरतालिका तीज

हरतालिका तीज का मूल आधार भाद्रपद शुक्ल तृतीया है। ज्योतिष में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और ग्रहों की स्थिति को धार्मिक अनुष्ठानों के साथ देखा जाता है।

1. तृतीया तिथि का महत्व

तृतीया को परंपरागत रूप से सृजन, सौंदर्य, शक्ति और शुभ आरंभ से जोड़ा जाता है। हरतालिका तीज में यही तिथि शिव-पार्वती के दांपत्य स्वरूप की उपासना के लिए विशेष मानी जाती है।

2. सोमवार का विशेष संयोग

2026 में हरतालिका तीज सोमवार को पड़ रही है। सोमवार भगवान शिव को समर्पित दिन है। इसलिए इस वर्ष तीज पर शिवोपासना का भाव विशेष रूप से प्रबल माना जा सकता है।

3. चंद्रमा और दांपत्य जीवन

ज्योतिष में चंद्रमा को मन, भावनाओं, मानसिक शांति और पारिवारिक संवेदनाओं का कारक माना जाता है। इसलिए शिव-पार्वती की पूजा के साथ मन की स्थिरता और दांपत्य जीवन में प्रेम एवं सामंजस्य की प्रार्थना करना इस व्रत की ज्योतिषीय भावना से जुड़ता है।

4. शुक्र और वैवाहिक सुख

शुक्र ग्रह को प्रेम, आकर्षण, सौंदर्य, दांपत्य सुख और भौतिक समृद्धि का कारक माना जाता है। इसलिए हरतालिका तीज को दांपत्य जीवन के संदर्भ में देखते समय चंद्रमा और शुक्र की स्थिति को कुंडली में विशेष रूप से देखा जा सकता है।

हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल तीज का व्रत करने से किसी व्यक्ति की कुंडली में ग्रहों के सभी दोष स्वतः समाप्त हो जाते हैं। ज्योतिषीय फलादेश हमेशा व्यक्तिगत जन्मकुंडली और दशा-गोचर के आधार पर किया जाना चाहिए।

शुभ मुहूर्त

तृतीया तिथि 14 सितंबर की सुबह लगभग 7:07 बजे तक है। उपलब्ध पंचांग गणना में हरतालिका पूजा का प्रमुख प्रातःकालीन समय लगभग 5:34 बजे से 7:07 बजे तक करना उचित होगा। इसलिए इस वर्ष विशेष बात यह है कि पूजा तृतीया तिथि समाप्त होने से पहले करना महत्वपूर्ण रहेगा।

  • हरतालिका तीज – सोमवार, 14 सितंबर 2026
  • प्रातःकालीन पूजा मुहूर्त – सुबह 5:34 बजे से सुबह 7:07 बजे तक
  • तृतीया समाप्त – सुबह 7:07 बजे

हरतालिका तीज की पूजा विधि

पूजा को सरल लेकिन श्रद्धापूर्वक इस क्रम में किया जा सकता है-

ब्रह्ममुहूर्त अथवा प्रातःकाल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करके व्रत का संकल्प लें। चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं। परंपरा के अनुसार मिट्टी या बालू से भगवान शिव और माता पार्वती की पार्थिव प्रतिमा बनाई अथवा स्थापित की जाती है। सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन करें। इसके बाद कलश स्थापित कर उसका पूजन करें। भगवान शिव और माता पार्वती को जल, पंचामृत, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें। माता पार्वती को साड़ी, सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, आभूषण तथा अन्य सुहाग सामग्री अर्पित करें। हरतालिका पूजा में सोलह श्रृंगार का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। फल, मिष्ठान, ऋतु के अनुसार प्रसाद तथा अन्य सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें। “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें और हरतालिका व्रत की कथा का श्रवण अथवा पाठ करें। शिव-पार्वती की आरती करके परिवार की सुख-शांति, आरोग्य, सौभाग्य और दांपत्य जीवन में प्रेम एवं सामंजस्य की प्रार्थना करें। पारंपरिक विधि में पूजा के बाद दान-दक्षिणा और विसर्जन की परंपरा भी मिलती है।

हरतालिका तीज की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठोर तपस्या की थी। उनका संकल्प भगवान शिव को ही जीवनसाथी के रूप में पाने का था।

माता पार्वती के पिता हिमवान उनकी इच्छा के अनुरूप विवाह कराने के बजाय उनका विवाह भगवान विष्णु से करने की इच्छा रखते थे। यह जानकर माता पार्वती अत्यंत दुखी हुईं। उनकी सखियां उन्हें वन में ले गईं, जहां उन्होंने संसार से दूर रहकर भगवान शिव की आराधना और कठोर तपस्या की।

भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन उनकी साधना अपने चरम पर पहुंची। माता पार्वती के दृढ़ संकल्प और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

इसी तप, त्याग और शिव को प्राप्त करने के संकल्प की स्मृति में हरतालिका तीज का व्रत मनाने की परंपरा मानी जाती है।

व्रत का आध्यात्मिक संदेश

हरतालिका तीज को केवल पति की दीर्घायु या मनोकामना प्राप्ति के व्रत के रूप में देखना इसके व्यापक संदेश को सीमित कर देता है। शिव और पार्वती का संबंध प्रेम, विश्वास, तप, समानता, समर्पण और पारस्परिक सम्मान का प्रतीक है।

ज्योतिषीय दृष्टि से यह पर्व मन और दांपत्य के संतुलन की साधना है, जबकि आध्यात्मिक दृष्टि से यह इच्छा को संकल्प में और संकल्प को साधना में बदलने की प्रेरणा देता है।

व्रत के संबंध में एक आवश्यक बात

हरतालिका तीज का निर्जला व्रत परंपरा में अत्यंत कठिन माना जाता है। धार्मिक आस्था अपनी जगह है, लेकिन व्रत की कठोरता व्यक्ति की शारीरिक क्षमता के अनुरूप होनी चाहिए। अस्वस्थ, गर्भवती, बुजुर्ग अथवा चिकित्सकीय कारणों से उपवास न कर सकने वाले लोग अपनी स्थिति के अनुसार सरल पूजा-विधि अपना सकते हैं।

हरतालिका तीज शिव और शक्ति के मिलन का ऐसा पर्व है जिसमें धर्म, ज्योतिष, तपस्या और दांपत्य जीवन एक साथ दिखाई देते हैं। 2026 में सोमवार और तृतीया का यह संयोग पर्व की शिवोपासना को विशेष भाव प्रदान करता है। श्रद्धा, संयम और शुद्ध मन से की गई पूजा ही इस पर्व का वास्तविक सौंदर्य है।

संपर्क सूत्र :

ज्योतिर्विज्ञान अनुसंधान संस्थान
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