शेयर बाजार में 25 साल की सबसे बड़ी गिरावट: 8 हफ्तों में निवेशकों के ₹26 लाख करोड़ स्वाहा

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–लाइव ख़बर नेशन || संतोष श्रीवास्तव

सेंसेक्स-निफ्टी लगातार 8वें हफ्ते टूटे, विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली और बॉन्ड यील्ड ने बिगाड़ा खेल

मुंबई, 03 अक्टूबर 2026: भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट का दौर जारी है। सेंसेक्स और निफ्टी में लगातार आठवें हफ्ते कमजोरी दर्ज की गई है, जो बीते 25 वर्षों में गिरावट का सबसे लंबा सिलसिला बन गया है। इस तेज मंदी के चलते केवल दो महीनों (8 सप्ताह) में निवेशकों की पूंजी से 26 लाख करोड़ रुपये से अधिक साफ हो चुके हैं। यह मंदी 2020 के कोरोना संकट और 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी के दौर से भी ज्यादा लंबी खिंच गई है। पिछले आठ हफ्तों में निफ्टी 8.7 फीसदी (2,149 अंक) और सेंसेक्स 8.4 फीसदी (6,590 अंक) गिर चुका है, जिससे बीएसई का कुल मार्केट कैप घटकर 467 लाख करोड़ रुपये से नीचे आ गया।

बाजार पर सबसे बड़ा दबाव विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की अंधाधुंध बिकवाली का देखा जा रहा है। विदेशी निवेशकों ने सिर्फ चार कारोबारी सत्रों में लगभग 35 हजार करोड़ रुपये के शेयर बेच डाले, जबकि सितंबर महीने में यह बिकवाली करीब 46 हजार करोड़ रुपये रही थी। इस दबाव को थामने के लिए घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने भारी खरीदारी कर सहारा देने की कोशिश जरूर की, लेकिन वैश्विक दबाव के आगे बाजार टिक नहीं सका।

भारतीय शेयर बाजार में 8 हफ्तों से जारी तेज बिकवाली के पीछे 4 प्रमुख वैश्विक कारण सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं:

1. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में रिकॉर्ड उछाल (US Treasury Yields)

  • मौजूदा स्तर: 10 वर्षीय बॉन्ड यील्ड 5.34% (साल 2002 के बाद का उच्चतम स्तर) तथा 30 वर्षीय यील्ड 5.68% तक पहुंच चुकी है।
  • बाजार पर असर: अमेरिकी सरकारी बॉन्ड जोखिम-मुक्त (Risk-Free) निवेश माने जाते हैं। जब सुरक्षित बॉन्ड पर 5% से अधिक रिटर्न मिलने लगता है, तो विदेशी निवेशक (FIIs) भारत जैसे उभरते बाजारों के जोखिम भरे इक्विटी मार्केट से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड में लगाना शुरू कर देते हैं।

2. कच्चे तेल (Brent Crude) में तेजी

  • मौजूदा स्तर: ब्रेंट क्रूड अंतरराष्ट्रीय बाजार में 100 डॉलर प्रति बैरल के पार।
  • बाजार पर असर: भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। महंगे तेल से देश का आयात बिल बढ़ता है, राजकोषीय घाटा चौड़ा होता है और पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने से घरेलू महंगाई पर दबाव बनता है, जिससे कंपनियों के मुनाफे (Corporate Margins) घटते हैं।

3. डॉलर के मुकाबले रुपये का टूटना (Rupee Depreciation)

  • मौजूदा स्तर: 96.31 रुपये प्रति डॉलर (दो महीने का निचला स्तर)।
  • बाजार पर असर: रुपया कमजोर होने से विदेशी निवेशकों का डॉलर-आधारित रिटर्न घट जाता है। अगर भारतीय शेयर बाजार 5% का रिटर्न दे भी, लेकिन रुपया 5% टूट जाए, तो विदेशी निवेशक का शुद्ध रिटर्न शून्य हो जाता है। इसलिए वे बिकवाली तेज कर देते हैं।

4. पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Conflict)

  • मौजूदा स्थिति: पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ता सैन्य तनाव और सप्लाई चेन में व्यवधान।
  • बाजार पर असर: अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों (जैसे स्वेज नहर और लाल सागर) पर जोखिम बढ़ता है, जिससे लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ जाती है। अनिश्चितता के माहौल में वैश्विक पूंजी ‘Safe Haven’ संपत्तियों जैसे सोना और अमेरिकी डॉलर की तरफ भागती है।
कारकमौजूदा स्थितितात्कालिक प्रभावभारतीय बाजार पर संवेदनशीलता (Sensitivity)
अमेरिकी 10-Yr यील्ड5.34% (24 साल का उच्च स्तर)FIIs द्वारा भारी शुद्ध बिकवालीअत्यधिक उच्च (Critical)
ब्रेंट क्रूड ऑयल$100+ प्रति बैरलआयात बिल वृद्धि और महंगाईउच्च (High)
डॉलर/रुपया विनिमय दर₹96.31 प्रति डॉलरविदेशी पोर्टफोलियो रिटर्न में गिरावटमध्यम-उच्च (Moderate-High)
पश्चिम एशिया तनावसैन्य टकराव / सप्लाई संकटवैश्विक अनिश्चितता और सुरक्षित संपत्तियों में निवेशउच्च (High)

इस गिरावट के पीछे चार प्रमुख अंतरराष्ट्रीय कारण काम कर रहे हैं। पहला, अमेरिकी 10 वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड उछलकर 5.34 फीसदी पर पहुंच गई है, जो साल 2002 के बाद का उच्चतम स्तर है। यील्ड बढ़ने से सुरक्षित डेट मार्केट आकर्षक हो जाता है और इक्विटी से पूंजी बाहर निकलने लगती है। दूसरा कारण, मध्य पूर्व के तनाव के चलते कच्चे तेल का 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचना है, जिससे भारत का आयात बिल और महंगाई बढ़ने का जोखिम है। तीसरा, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये का टूटकर 96.31 के स्तर पर आना है, जिससे विदेशी निवेशकों का रिटर्न घट रहा है। आने वाले दिनों में बाजार की चाल बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमतों, रुपये की सेहत और विदेशी निवेशकों की वापसी पर निर्भर करेगी।

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