– Santosh K Srivastav : Editor in Chief & Publisher
सद्गुरुदेव श्रीमाली बोले- सनातन धर्म की एकता का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप है गुरु परंपरा, गुरु जीवन को देता है सही दिशा
अयोध्या, 28 जुलाई 2026। रामलला की पावन नगरी अयोध्या में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अंतरराष्ट्रीय सिद्धाश्रम साधक परिवार (निखिल मंत्र विज्ञान) के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय ‘पारमेष्ठि गुरु शक्ति पूर्णिमा महोत्सव’ का मंगलवार को भव्य शुभारंभ हुआ। कारसेवकपुरम स्थित जानकीघाट के समीप आयोजित इस महोत्सव में देश-विदेश से पहुंचे हजारों निखिल शिष्यों ने भाग लिया। पूरे आयोजन स्थल पर भक्ति, श्रद्धा और गुरु चेतना का आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिला।
कार्यक्रम का शुभारंभ परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी महाराज (डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली) एवं वंदनीया माता भगवती की दिव्य छत्रछाया में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गणेश पूजन और गुरु पूजन के साथ हुआ। इसके बाद शिष्यों ने सद्गुरुदेव का माल्यार्पण कर उनका भव्य स्वागत किया।
साधकों को संबोधित करते हुए सद्गुरुदेव नंदकिशोर श्रीमाली ने कहा कि देश के विभिन्न प्रांतों से शिष्यों का एक स्थान पर एकत्र होना सनातन धर्म की एकता और गुरु परंपरा की जीवंत अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि जब अलग-अलग क्षेत्रों के लोग एक ही भाव और उद्देश्य के साथ एकत्र होते हैं, तो यह गुरु के लिए परम संतोष का विषय होता है।
गुरुदेव ने मानव जीवन में गुरु की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जो श्रीराम की शरण में आता है, वह भवसागर से पार हो जाता है। गुरु शिष्य को केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन में आश्रय, साहस और सही दिशा भी प्रदान करते हैं। उन्होंने द्रौपदी स्वयंवर का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि शिष्य का दायित्व अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहना है, जबकि परिस्थितियों को अनुकूल बनाना गुरु का कार्य होता है। उन्होंने कहा कि शिष्य की हार वास्तव में गुरु की हार होती है, इसलिए गुरु सदैव अपने शिष्य को सफलता के मार्ग पर ले जाने का प्रयास करते हैं।
मौन को बताया सर्वोच्च ज्ञान
अपने प्रवचन में सद्गुरुदेव ने भगवान शिव के दक्षिणामूर्ति स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि मौन की विद्या संसार की सबसे महान विद्या है। उन्होंने कहा कि सच्चे सद्गुरु की उपस्थिति मात्र से शिष्य के मन के संशय समाप्त हो जाते हैं। गुरु गीता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि स्वयं माता पार्वती ने भी भगवान शिव से शिष्य भाव में ज्ञान प्राप्त किया था। उन्होंने कहा कि जीवन की प्रत्येक उलझन का समाधान श्रीमद्भगवद्गीता में निहित है और गुरु का वास्तविक कार्य मनुष्य को जीवन के सभी बंधनों से मुक्त कर उसका उद्धार करना है।
छोटे-छोटे पलों में छिपा है जीवन का आनंद
सद्गुरुदेव ने साधकों से जीवन के प्रत्येक क्षण का आनंद लेने का आह्वान करते हुए कहा कि मनुष्य बड़े विचारों और चिंताओं में उलझकर छोटे-छोटे सुखद पलों को भूल जाता है। उन्होंने कहा कि ध्यान का वास्तविक अर्थ केवल मंत्र जाप नहीं, बल्कि अंतर्मन की शुद्धि है। जब मन निर्मल होता है, तभी ‘सोऽहम्’ का भाव जागृत होता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु शक्ति, प्रेरणा और दिशा दे सकते हैं, लेकिन जीवन की नैया प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं ही चलानी होती है।
शोभायात्रा और भजनों से भक्तिमय हुआ वातावरण
महोत्सव के प्रथम दिवस की संध्या में निखिल शिष्यों ने भव्य शोभायात्रा निकाली। गाजे-बाजे और सुसज्जित रथ के साथ निकली यात्रा में श्रद्धालु गुरु भजनों पर झूमते हुए शामिल हुए। इस दौरान महेंद्र सिंह मानकर एवं उनकी भजन मंडली ने गुरु भजनों की मनमोहक प्रस्तुति देकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। कार्यक्रम का संचालन मनोज भारद्वाज ने किया।
महोत्सव के दूसरे दिन गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सद्गुरुदेव द्वारा विशेष साधना, गुरुदीक्षा, शक्तिपात दीक्षा एवं अन्य आध्यात्मिक दीक्षाएं प्रदान की जाएंगी।

