
सनातन ज्योतिष परम्परा में खरमास को एक विशेष, संयम और साधना-प्रधान काल माना गया है। पंचांगानुसार खरमास की शुरुआत 16 दिसम्बर 2025, मंगलवार को प्रातः 04:26 बजे से हो रही है, जो 14 जनवरी 2026, बुधवार को अपराह्न 03:13 बजे तक प्रभावी रहेगा। यह अवधि सूर्यदेव के धनु राशि में प्रवेश (धनु संक्रांति) से आरम्भ होकर मकर संक्रांति पर समाप्त होती है।
खरमास और मलमास/अधिमास में अंतर
ज्योतिष शास्त्र में अक्सर लोग खरमास को मलमास या अधिमास समझ लेते हैं। लेकिन यह स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि – खरमास न तो मलमास है और न ही अधिमास। यह एक विशिष्ट काल है जो सूर्यदेव के धनु राशि में गोचर करने से आरम्भ होकर मकर संक्रांति तक चलता है। इस समय सूर्य का तेज कम माना जाता है, जिससे धार्मिक, आध्यात्मिक और साधना-प्रधान कार्यों का महत्व बढ़ जाता है। इस स्पष्टिकरण से खरमास की वास्तविक ज्योतिषीय पहचान स्थापित होती है और किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं रहता।
इसे अशुभ क्यों माना जाता है?
हिंदू ज्योतिष में सूर्य को ग्रहों का राजा और आत्मा का कारक माना जाता है, जबकि बृहस्पति को देवताओं का गुरु और ज्ञान का कारक माना जाता है। जब सूर्य अपने गुरु बृहस्पति के घर में प्रवेश करते हैं, तो वे गुरु के सम्मान में अपना प्रभाव कम कर देते हैं या निस्तेज हो जाते हैं। मांगलिक कार्यों (जैसे विवाह, गृह प्रवेश) की सफलता के लिए सूर्य के प्रबल और सकारात्मक प्रभाव की आवश्यकता होती है। क्योंकि इस दौरान सूर्य का तेज कम हो जाता है और गुरु का भी प्रभाव सूर्य की उपस्थिति के कारण दब जाता है, इसलिए इस अवधि में किए गए शुभ कार्यों के पूर्ण फल नहीं मिलते और बाधाएं आने की संभावना रहती है।

खरमास से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा है:
कहा जाता है कि भगवान सूर्य देव अपने सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा लगाते हैं। उन्हें कहीं भी रुकने की अनुमति नहीं है, क्योंकि अगर वे रुक गए तो संसार का संचालन थम जाएगा। लगातार चलते रहने के कारण एक बार उनके रथ के घोड़े बहुत थक गए और उन्हें प्यास लगी। घोड़ों की ऐसी हालत देखकर सूर्य देव को दया आ गई और वे एक तालाब के किनारे रथ रोककर घोड़ों को पानी पिलाने लगे। लेकिन तभी उन्हें याद आया कि उन्हें रुकना नहीं है।
उसी तालाब के किनारे दो ‘खर’ (गधे) मौजूद थे। सूर्य देव ने अपने थके हुए घोड़ों को आराम देने के लिए रथ से खोल दिया और उनकी जगह उन गधों (खर) को रथ में जोत दिया। अब चूंकि घोड़े की तुलना में गधे की गति बहुत धीमी होती है, इसलिए सूर्य का रथ पूरे एक महीने तक धीमी गति से चला। एक महीने बाद जब सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने वाले थे, तब तक उनके घोड़े आराम कर चुके थे और वे वापस रथ में लौट आए। क्योंकि एक महीने तक सूर्य का रथ ‘खर’ (गधों) द्वारा खींचा गया और उसकी गति धीमी रही, इसलिए इस महीने को ‘खरमास’ कहा जाने लगा।
खरमास का ज्योतिषीय स्वरूप
जब सूर्यदेव धनु राशि में गोचर करते हैं, तब सूर्य का तेज सांसारिक कर्मों के लिए मंद और आध्यात्मिक साधना के लिए अनुकूल माना जाता है। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि इस काल में दान, तप, ब्रह्मचर्य और साधना का विशेष महत्व होता है पौराणिक मान्यता के अनुसार इस समय सूर्यदेव अपने रथ के घोड़ों को विश्राम देते हैं, इसलिए विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं।
खरमास का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व
खरमास को आत्मशुद्धि और आत्मोन्नति का काल माना गया है। यह समय व्यक्ति को बाह्य आडंबरों से हटाकर अंतर्मुखी बनाता है।
- इस काल में किया गया दान-पुण्य अत्यंत शुभ फलदायी होता है।
- गीता-पाठ, रामायण-पाठ, विष्णु सहस्रनाम, जप-तप से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
- शास्त्रों में उल्लेख है कि इस काल में किया गया एक पुण्य सामान्य दिनों के अनेक पुण्यों के समान फल देता है।
खरमास के शुभ फल
यदि इस अवधि का सदुपयोग किया जाए, तो अनेक आध्यात्मिक एवं मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं –
- पापक्षय और कर्मशुद्धि का अवसर
- मन, बुद्धि और चित्त की स्थिरता
- ग्रहदोषों, विशेषकर सूर्य दोष की शांति
- दान, व्रत और सेवा से कुल-कल्याण
- साधकों के लिए मंत्र-सिद्धि और ध्यान में प्रगति
खरमास में हानि
ज्योतिषीय दृष्टि से इस काल में कुछ कार्य करने से बचना चाहिए –
- विवाह, सगाई, गृहप्रवेश, नामकरण, मुंडन जैसे शुभ संस्कार
- नया व्यापार आरम्भ, भूमि-भवन क्रय-विक्रय
- अत्यधिक भोग-विलास और तामसिक आहार
इन कार्यों को करने से कार्यों में विघ्न, विलंब या अपेक्षित फल की कमी देखी जाती है।

खरमास में क्या करें?
खरमास भले ही भौतिक सुखों और नए कार्यों के लिए वर्जित हो, लेकिन यह समय आध्यात्मिक कार्यों, पूजा-पाठ और दान-पुण्य के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इसे आत्म-चिंतन का महीना भी कहते हैं।
- सूर्य उपासना: प्रतिदिन सुबह सूर्य देव को जल (अर्घ्य) दें और ‘आदित्य हृदय स्तोत्र’ का पाठ करें।
- विष्णु पूजा: खरमास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व है। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
- दान-पुण्य: इस महीने में गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और विशेष रूप से गुड़ व तिल का दान करना बहुत शुभ होता है।
- पवित्र नदियों में स्नान: गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का नाश होता है।
- गुरु और बड़ों की सेवा: चूंकि यह महीना गुरु ग्रह से संबंधित है, इसलिए अपने गुरुओं, माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा करें और उनका आशीर्वाद लें।
- धार्मिक यात्राएं: तीर्थ यात्रा पर जाने के लिए यह समय अच्छा माना जाता है।
खरमास समाप्ति का संकेत
14 जनवरी 2026 को मकर संक्रांति के साथ सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसके साथ ही सूर्य का तेज पुनः कर्मप्रधान हो जाता है और समस्त मांगलिक कार्य पुनः आरम्भ हो जाते हैं। यह दिन नवसंकल्प, नवउत्साह और कर्म-सक्रियता का प्रतीक है।
खरमास 2025 कोई अशुभ काल नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण का स्वर्णिम अवसर है। जो व्यक्ति इस समय को श्रद्धा, संयम और साधना में लगाता है, उसके जीवन में स्थायी शांति, पुण्य और सकारात्मक परिवर्तन निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
खरमास हमें सिखाता है — कभी-कभी रुकना भी आगे बढ़ने का मार्ग होता है।
– आचार्य संतोष
(ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य)
(वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक)
वास्तु शुद्धि और जन्म कुंडली जागरण के लिए
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