– आचार्य संतोष, ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य (वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक)
मनुष्य के व्यक्तित्व की पहचान केवल उसके ज्ञान, पद, धन या सफलता से नहीं होती, बल्कि उसके व्यवहार, वाणी और दूसरों के प्रति दृष्टिकोण से भी होती है। एक व्यक्ति कितना भी विद्वान या सफल क्यों न हो, यदि उसका स्वभाव हर समय चिड़चिड़ा, क्रोधी और असहिष्णु है, तो उसके आसपास के लोग उससे दूरी बनाने लगते हैं। इसके विपरीत, सीमित साधनों में रहने वाला एक प्रसन्नचित्त, धैर्यवान और मधुरभाषी व्यक्ति भी अपने आसपास प्रेम और सम्मान का वातावरण बना सकता है।
चिड़चिड़ापन देखने में एक छोटी-सी आदत लग सकता है, लेकिन धीरे-धीरे यह व्यक्ति के स्वभाव का हिस्सा बन जाता है। छोटी-सी बात पर नाराज होना, किसी की सामान्य टिप्पणी को गलत अर्थ में लेना, बार-बार दूसरों की कमियां निकालना, बिना पर्याप्त कारण शंका करना या किसी मामूली गलती पर अत्यधिक प्रतिक्रिया देना-*ये सभी ऐसे व्यवहार हैं, जो व्यक्ति के भीतर चल रहे असंतुलन की ओर संकेत कर सकते हैं।
चिड़चिड़ापन आखिर पैदा क्यों होता है?
चिड़चिड़ापन किसी एक कारण से उत्पन्न नहीं होता। इसके पीछे अनेक व्यक्तिगत और परिस्थितिजन्य कारण हो सकते हैं। लगातार तनाव, काम का दबाव, नींद की कमी, शारीरिक थकान, असंतोष, पारिवारिक तनाव, आर्थिक चिंता या किसी बात को लेकर लंबे समय से बनी बेचैनी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
कई बार अतीत की कटु स्मृतियां भी वर्तमान व्यवहार को प्रभावित करती हैं। किसी व्यक्ति को पहले कभी अपमान, धोखा या निराशा मिली हो तो वह अनजाने में भविष्य की परिस्थितियों को भी उसी अनुभव की दृष्टि से देखने लगता है। परिणामस्वरूप वह दूसरों पर जल्दी विश्वास नहीं कर पाता और छोटी-सी घटना भी उसके भीतर पुरानी पीड़ा को जागृत कर देती है।
इसलिए हर चिड़चिड़े व्यक्ति को केवल “बुरा स्वभाव वाला” कह देना उचित नहीं है। उसके व्यवहार के पीछे कोई तनाव, परेशानी या भावनात्मक कारण भी हो सकता है। समस्या को समझना उसके समाधान की पहली सीढ़ी है।
दूसरों की गलतियों पर क्रोध क्यों?
मनुष्य स्वभावतः अपनी गलतियों के लिए परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहरा देता है, लेकिन दूसरों की भूलों को उनके चरित्र का दोष मान लेता है। यही प्रवृत्ति संबंधों में तनाव पैदा करती है।
यदि परिवार का कोई सदस्य कोई काम भूल जाए, कर्मचारी से कोई छोटी गलती हो जाए या मित्र हमारी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार न करे, तो तत्काल क्रोध करने के बजाय हमें यह सोचना चाहिए कि क्या गलती वास्तव में इतनी बड़ी है कि संबंधों में कटुता पैदा कर दी जाए?
हर व्यक्ति से भूल होती है। हम स्वयं भी अनेक बार गलतियां करते हैं और चाहते हैं कि दूसरे हमारी परिस्थिति को समझें। यदि हम दूसरों के लिए भी वही दृष्टिकोण अपनाएं, तो जीवन में बहुत-सी अनावश्यक कड़वाहट समाप्त हो सकती है।
क्रोध समस्या का समाधान नहीं है
क्रोध अक्सर हमें यह भ्रम देता है कि हम अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रख रहे हैं। वास्तविकता इसके विपरीत है। क्रोध में कही गई सही बात भी गलत प्रभाव छोड़ सकती है। कठोर शब्द सामने वाले के मन में लंबे समय तक बने रह सकते हैं।
कई रिश्ते किसी बड़ी घटना के कारण नहीं, बल्कि बार-बार बोले गए छोटे-छोटे कटु शब्दों के कारण कमजोर होते हैं। पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों, भाई-बहनों, मित्रों तथा सहकर्मियों के बीच तनाव का एक बड़ा कारण संवाद की शैली भी होती है।
इसलिए जब क्रोध आए, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ क्षण रुकना चाहिए। मौन रहना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसंयम का परिचायक है।
मधुर वाणी की शक्ति
मधुर वाणी मनुष्य के व्यक्तित्व का ऐसा गुण है जो बिना किसी धन या साधन के संबंधों को मजबूत कर सकता है। मधुर बोलने का अर्थ यह नहीं कि हर गलत बात पर सहमति जताई जाए। इसका अर्थ है कि सत्य को भी सम्मान और संवेदनशीलता के साथ कहा जाए।
एक ही बात को दो तरीकों से कहा जा सकता है। कठोर शब्द सामने वाले को आहत कर सकते हैं, जबकि वही बात शांत और सम्मानजनक भाषा में कही जाए तो सामने वाला उसे स्वीकार करने के लिए अधिक तैयार हो सकता है।
वाणी में संयम व्यक्ति को केवल दूसरों की नजरों में सम्मानित नहीं बनाता, बल्कि स्वयं के भीतर भी शांति पैदा करता है।
सहनशीलता कमजोरी नहीं, शक्ति है
आज के तेज जीवन में लोगों में धैर्य की कमी दिखाई देती है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसकी बात तुरंत सुनी जाए, उसकी इच्छा तुरंत पूरी हो और दूसरे उसके अनुसार व्यवहार करें। जब ऐसा नहीं होता तो निराशा और चिड़चिड़ापन पैदा होता है।
सहनशीलता का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। इसका अर्थ है कि परिस्थितियों को समझने और प्रतिक्रिया देने के बीच थोड़ा अंतर रखा जाए। जो व्यक्ति प्रतिक्रिया देने से पहले विचार करता है, वह अक्सर ऐसी गलतियों से बच जाता है जिन्हें बाद में सुधारना कठिन होता है।
प्रसन्नता का अभ्यास भी जरूरी
प्रसन्नता केवल बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती। जीवन में समस्याएं हमेशा रहेंगी। यदि हम यह तय कर लें कि समस्याएं समाप्त होने के बाद ही प्रसन्न रहेंगे, तो शायद प्रसन्नता का अवसर कभी नहीं आएगा।
हमें कठिन परिस्थितियों के बीच भी सकारात्मक पक्ष खोजने की आदत डालनी चाहिए। सुबह का शांत समय, परिवार के साथ कुछ क्षण, प्रकृति के निकट रहना, अच्छे साहित्य का अध्ययन, प्रार्थना या ध्यान जैसी गतिविधियां मन को संतुलित करने में सहायक हो सकती हैं।
आत्मनिरीक्षण से शुरू करें बदलाव
चिड़चिड़ापन कम करने का सबसे प्रभावी उपाय है-अपने व्यवहार को पहचानना।
दिन समाप्त होने पर कुछ मिनट स्वयं से प्रश्न किया जा सकता है-
- आज मैं किन बातों पर अनावश्यक रूप से नाराज हुआ?
- क्या मेरी प्रतिक्रिया परिस्थिति से अधिक तीखी थी?
- क्या मेरी बात से किसी को अनावश्यक चोट पहुंची?
- क्या मैं दूसरे की परिस्थिति समझने का प्रयास कर सकता था?
- अगली बार ऐसी स्थिति आए तो मैं बेहतर प्रतिक्रिया कैसे दे सकता हूं?
ऐसा आत्मनिरीक्षण धीरे-धीरे व्यक्ति के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
परिवार से शुरू होती है शांति
परिवार वह स्थान है जहां हमारे वास्तविक स्वभाव की परीक्षा होती है। बाहर हम अक्सर संयमित रहते हैं, लेकिन घर में छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन दिखा देते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि परिवार के सदस्य हमारे व्यवहार से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
यदि घर का वातावरण प्रेम, सम्मान और संवाद पर आधारित हो तो बच्चों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। वे सीखते हैं कि मतभेद होने पर भी सम्मानपूर्वक बात की जा सकती है और गलती होने पर माफी मांगी जा सकती है।
समाज को भी चाहिए मधुर व्यवहार
व्यक्ति का स्वभाव केवल उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता। वही व्यक्ति समाज, कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन में भी अपने व्यवहार के माध्यम से प्रभाव डालता है। यदि लोग एक-दूसरे की छोटी गलतियों को क्षमा करने और मतभेदों को संवाद से सुलझाने की आदत विकसित करें, तो सामाजिक तनाव काफी कम हो सकता है।
आज आवश्यकता केवल अधिकारों की बात करने की नहीं, बल्कि कर्तव्यों और व्यवहार की संस्कृति विकसित करने की भी है।
एक संकल्प जरूरी है
चिड़चिड़ापन एक दिन में समाप्त नहीं होता। इसके लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। जब भी क्रोध आए, स्वयं को याद दिलाएं- “मुझे प्रतिक्रिया नहीं, समाधान चुनना है।”
दूसरों की भूल पर तुरंत निर्णय न लें। अपनी वाणी पर नियंत्रण रखें। शंका की जगह संवाद को महत्व दें। अतीत की कटु घटनाओं को वर्तमान के हर रिश्ते पर लागू न करें। जहां आवश्यक हो, क्षमा करना सीखें और जहां अपनी गलती हो, वहां बिना संकोच माफी मांगें।
अंततः सुखी जीवन का अर्थ समस्याओं से मुक्त जीवन नहीं, बल्कि समस्याओं के बीच भी शांत, संतुलित और प्रसन्न रहने की क्षमता है। मृदुता मनुष्य को कमजोर नहीं बनाती; बल्कि उसे इतना मजबूत बनाती है कि वह कठिन परिस्थितियों में भी अपने विवेक को नहीं खोता।
इसलिए आज से एक छोटा-सा संकल्प लिया जा सकता है-क्रोध से पहले विचार, प्रतिक्रिया से पहले धैर्य, शब्दों से पहले संवेदना और शिकायत से पहले आत्मनिरीक्षण।
जब व्यक्ति स्वयं बदलता है तो उसके व्यवहार से परिवार बदलता है, परिवार से समाज और समाज से व्यापक वातावरण। इसलिए मन की शांति केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक सुख-शांति का आधार भी है।
आइए, चिड़चिड़ेपन के स्थान पर धैर्य, कटुता के स्थान पर मधुरता, असहिष्णुता के स्थान पर सहनशीलता और चिंता के स्थान पर सकारात्मकता को जीवन का हिस्सा बनाएं।
सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।
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