गणेश चतुर्थी : विघ्नों के विनाश और बुद्धि-विवेक के जागरण का पर्व

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– आचार्य संतोष, ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य (वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक)

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित है। सनातन परंपरा में गणेश जी को विघ्नहर्ता, बुद्धि के देवता, सिद्धि-विनायक और मंगलकर्ता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ से पहले गणेश पूजन की परंपरा इस विश्वास को प्रकट करती है कि विवेक, संयम और शुभ संकल्प के साथ किया गया कार्य बाधाओं को पार करने में समर्थ होता है।

वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। चतुर्थी तिथि 14 सितंबर को सुबह लगभग 7:06 बजे आरंभ होकर 15 सितंबर को सुबह लगभग 7:44 बजे समाप्त होगी। चतुर्थी के दिन मध्याह्न काल में गणेश पूजन को विशेष महत्व दिया गया है।

गणेश चतुर्थी का आध्यात्मिक महात्म्य

गणेश जी का स्वरूप अपने भीतर गहरा आध्यात्मिक संदेश समेटे हुए है। उनका विशाल मस्तक विवेक और व्यापक चिंतन का प्रतीक माना जाता है, बड़े कान अधिक सुनने की सीख देते हैं, छोटी आंखें एकाग्रता का संदेश देती हैं और लंबी सूंड परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता का प्रतीक मानी जाती है।

उनका एकदंत दृढ़ संकल्प और सार ग्रहण करने की भावना का प्रतीक है। वाहन मूषक मन की चंचलता और इच्छाओं पर नियंत्रण का संकेत देता है।

इसलिए गणेश पूजन केवल बाहरी विघ्नों को दूर करने की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के भय, भ्रम, अहंकार, आलस्य और अविवेक पर विजय प्राप्त करने का आध्यात्मिक संकल्प भी है।

शास्त्रों में गणेश मंत्र और स्तुति

गणपति अथर्वशीर्ष में गणेश को परम तत्व के रूप में संबोधित किया गया है। इसमें प्रसिद्ध मंत्र है-

ॐ गं गणपतये नमः।

यह गणेश उपासना का अत्यंत प्रचलित बीज-मंत्र है। गणपति अथर्वशीर्ष में गणेश विद्या और गणेश गायत्री का भी उल्लेख मिलता है।

गणेश गायत्री मंत्र

ॐ एकदन्ताय विद्महे
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥

अर्थात हम एकदंत भगवान को जानते हैं, वक्रतुण्ड का ध्यान करते हैं। वे भगवान गणेश हमारी बुद्धि को सद्मार्ग की ओर प्रेरित करें।

गणेश स्तुति

वक्रतुण्ड महाकाय
सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव
शुभकार्येषु सर्वदा॥

इस प्रार्थना में साधक भगवान गणेश से अपने सभी शुभ कार्यों को विघ्नरहित बनाने की कामना करता है।

गणपति अथर्वशीर्ष में भगवान गणेश के स्वरूप को ब्रह्मतत्व से जोड़ा गया है और गणेश उपासना को ज्ञान तथा आध्यात्मिक उन्नति से संबद्ध किया गया है।

ज्योतिषीय दृष्टि से गणेश चतुर्थी

ज्योतिष में चतुर्थी तिथि को रिक्ता तिथि माना जाता है। सामान्यतः रिक्ता तिथियों को भौतिक कार्यों के लिए विशेष शुभ नहीं माना जाता, लेकिन भगवान गणेश की उपासना के संदर्भ में यही चतुर्थी अत्यंत पवित्र हो जाती है।

यही इस पर्व की विशेषता है-जिस तिथि का सामान्य ज्योतिषीय स्वभाव रिक्तता से जुड़ा है, उसी तिथि पर गणेश आराधना के माध्यम से विघ्नों की निवृत्ति और कार्यसिद्धि की कामना की जाती है।

ज्योतिषीय परंपराओं में गणेश जी का संबंध बुद्धि, विवेक, गणना, लेखन और आरंभ से जोड़ा जाता है। बुध ग्रह की बौद्धिक एवं तार्किक प्रकृति तथा गणेश जी के ज्ञान-विवेक स्वरूप में साम्य देखा जाता है। इसलिए विद्यार्थी, लेखक, व्यापारी, गणित एवं लेखा से जुड़े लोग तथा नए कार्य का शुभारंभ करने वाले लोग गणेश उपासना को विशेष फलदायी मानते हैं।

गणेश साधना का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष केतु से भी जोड़ा जाता है। केतु वैराग्य, सूक्ष्म चिंतन, आध्यात्मिकता और बाधाओं के अप्रत्याशित स्वरूप का संकेतक माना जाता है। इसलिए ज्योतिषीय परंपरा में गणेश उपासना को केतु संबंधी बाधाओं और मानसिक भ्रम को शांत करने वाली साधना के रूप में भी देखा जाता है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि ये ज्योतिषीय संबंध परंपरागत व्याख्याओं पर आधारित हैं; किसी व्यक्ति की कुंडली में वास्तविक फलादेश के लिए संपूर्ण जन्मकुंडली का विचार आवश्यक होता है।

गणेश चतुर्थी का शुभ मुहूर्त

दिन : सोमवार, 14 सितंबर 2026

चतुर्थी तिथि : 14 सितंबर सुबह 7:08 बजे से 15 सितंबर सुबह 7:46 बजे तक

गणेश पूजन का मध्याह्न मुहूर्त : सुबह 10:31 बजे से दोपहर 12:59 बजे तक।

गणेश जी का जन्म मध्याह्न काल में हुआ माना जाता है, इसलिए गणेश चतुर्थी पर मध्याह्न पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।

अनंत चतुर्दशी : 25 सितंबर 2026, शुक्रवार को गणेश विसर्जन का प्रमुख दिन रहेगा।

गणेश स्थापना एवं पूजन विधि

गणेश चतुर्थी के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को साफ करके भगवान गणेश की स्थापना के लिए चौरंग या चौकी तैयार करें।

पूजन में सामान्यतः निम्न सामग्री रखी जा सकती है-

  • गणेश जी की प्रतिमा
  • लाल या पीले वस्त्र
  • अक्षत
  • रोली एवं चंदन
  • दूर्वा
  • लाल पुष्प
  • धूप एवं दीप
  • फल
  • नारियल
  • पंचामृत
  • मोदक या अन्य नैवेद्य
  • कलश एवं पूजन सामग्री

सरल पूजन क्रम

1. संकल्प
अपने नाम, गोत्र और पूजा के उद्देश्य का स्मरण करते हुए संकल्प लें।

2. गणेश स्थापना
भगवान गणेश की प्रतिमा को चौकी पर स्थापित करें।

3. आवाहन एवं ध्यान
गणेश जी का ध्यान करते हुए कहें – ॐ गं गणपतये नमः।

4. पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन
चंदन, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें।

5. दूर्वा अर्पण
गणेश जी को दूर्वा अत्यंत प्रिय मानी जाती है। श्रद्धापूर्वक दूर्वा अर्पित करें।

6. मोदक का भोग
मोदक को गणेश जी का प्रिय नैवेद्य माना जाता है। सामर्थ्य के अनुसार मोदक या अन्य सात्त्विक मिठाई का भोग लगाएं।

7. मंत्र जाप
कम से कम 21, 51 या 108 बार ॐ गं गणपतये नमः का जाप करें।

8. आरती और प्रार्थना
अंत में गणेश आरती करके परिवार के सुख, शांति, आरोग्य, बुद्धि और कार्यसिद्धि की प्रार्थना करें।

गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसे अपना द्वारपाल बनाया। उन्होंने उसे आदेश दिया कि उनकी अनुमति के बिना किसी को भीतर प्रवेश न करने दिया जाए।

उसी समय भगवान शिव वहां पहुंचे। बालक गणेश ने उन्हें भी भीतर जाने से रोक दिया। इससे भगवान शिव और गणेश के बीच संघर्ष हुआ और भगवान शिव ने क्रोध में गणेश का मस्तक अलग कर दिया।

माता पार्वती को जब यह ज्ञात हुआ तो वे अत्यंत क्रोधित हुईं। उन्होंने अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की मांग की। तब भगवान शिव ने हाथी के मस्तक को गणेश के धड़ पर स्थापित करके उन्हें पुनर्जीवन प्रदान किया।

भगवान शिव ने गणेश को वरदान दिया कि देवताओं और मनुष्यों के बीच किसी भी शुभ कार्य से पहले उनका पूजन किया जाएगा। इसी कारण गणेश जी प्रथम पूज्य कहलाए।

यह कथा हमें यह संदेश देती है कि गणेश केवल विघ्नहर्ता ही नहीं, बल्कि कर्तव्य, आज्ञापालन, विवेक और पुनर्जागरण के प्रतीक भी हैं।

चंद्र दर्शन से क्यों बचते हैं?

गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक प्रसिद्ध मान्यता भगवान श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि की कथा से संबंधित है। मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखने से झूठे कलंक का सामना करना पड़ सकता है।

इसी कारण इस दिन चंद्र दर्शन से बचने की परंपरा है। 2026 में पटना के लिए चंद्र दर्शन से बचने का समय लगभग सुबह 8:28 बजे से शाम 7:37 बजे तक बताया गया है।

यदि भूलवश चंद्र दर्शन हो जाए तो परंपरा के अनुसार गणेश जी की पूजा और संबंधित प्रार्थना करने की मान्यता है।

गणेश चतुर्थी और जीवन का ज्योतिषीय संदेश

गणेश चतुर्थी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जीवन में आने वाली हर बाधा केवल बाहरी परिस्थिति नहीं होती। कई बार अज्ञान, जल्दबाजी, गलत निर्णय, अहंकार और अस्थिर मन ही सबसे बड़े विघ्न बन जाते हैं।

गणेश जी का ध्यान हमें सिखाता है – बड़ा सोचें, ध्यान से सुनें, सही निर्णय लें और अपने लक्ष्य पर एकाग्र रहें।

ज्योतिषीय दृष्टि से भी यह पर्व बुद्धि और विवेक को मजबूत करने, नए कार्यों के लिए शुभ संकल्प लेने तथा बाधाओं के प्रति मानसिक शक्ति विकसित करने का अवसर माना जा सकता है।

इस गणेश चतुर्थी पर केवल यह प्रार्थना न करें कि हमारे रास्ते की बाधाएं दूर हों, बल्कि यह भी प्रार्थना करें कि – “हे गणपति! हमें इतनी बुद्धि और विवेक दें कि हम स्वयं अपने जीवन में बाधाएं उत्पन्न न करें।”

यही गणेश आराधना का सबसे सुंदर और सार्थक संदेश है।

गणपति बप्पा मोरया। मंगलमूर्ति मोरया।

सपर्क सूत्र :

ज्योतिर्विज्ञान अनुसंधान संस्थान
मोबाइल : +91 9288159319

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