-संतोष श्रीवास्तव, मुख्य संपादक सह प्रकाशक
धरना-प्रदर्शन, आंदोलन और जन-आक्रोश किसी भी जीवंत लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में ज़मीनी हकीकत को जनता तक पहुँचाना मीडिया का प्राथमिक दायित्व है, लेकिन हाल के वर्षों में यह काम असाधारण रूप से जोखिम भरा हो गया है। भीड़ का बढ़ता आक्रोश, पुलिस की सख्त कार्रवाई और तात्कालिक तनाव के बीच रिपोर्टर अक्सर दोहरी मार झेलते रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में भारतीय प्रेस परिषद द्वारा विरोध प्रदर्शनों की कवरेज को लेकर जारी छह सूत्री दिशानिर्देश अत्यंत सामयिक और व्यावहारिक कदम हैं। यह पहल केवल पत्रकारों की शारीरिक सुरक्षा से नहीं जुड़ी है, बल्कि पत्रकारिता की गिरती साख और विश्वसनीयता को बहाल करने की दिशा में भी एक गंभीर प्रयास है।
अक्सर देखा गया है कि टकराव वाले स्थलों पर पत्रकारिता की तटस्थता धुंधली पड़ने लगती है। पीसीआई ने स्पष्ट किया है कि पत्रकार दर्शक और विश्लेषक हैं, किसी आंदोलन के सहभागी या उत्प्रेरक नहीं। पहचान पत्र को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने, प्रशासनिक निर्देशों का सम्मान करने और टकराव बिंदुओं से सुरक्षित दूरी बनाए रखने की हिदायत ज़मीनी यथार्थ को ध्यान में रखकर दी गई है। कई बार कवरेज के उत्साह में सुरक्षा घेरे या पुलिस वाहनों के पास अनावश्यक जमावड़ा प्रशासनिक अभियानों में बाधा बनता है, जिसे टालना हर हाल में ज़रूरी है।
व्यक्तिगत सुरक्षा को लेकर दिए गए सुझाव यह रेखांकित करते हैं कि कोई भी ख़बर किसी पत्रकार की जान से बढ़कर नहीं हो सकती। आंसू गैस के गोलों या विस्फोटक सामग्रियों से दूर रहना, बुनियादी चिकित्सा किट रखना और न्यूज़रूम से निरंतर संपर्क में रहना ऐसी बुनियादी बातें हैं जिनकी फील्ड में अक्सर अनदेखी होती है। विशेष रूप से स्वतंत्र पत्रकारों के लिए अपनी लोकेशन साझा करने की अनिवार्यता एक स्वागतयोग्य सुरक्षा कवच है, क्योंकि संस्थागत संरक्षण के अभाव में वे सबसे अधिक असुरक्षित होते हैं।
हालाँकि, इन दिशानिर्देशों का सबसे अहम पहलू नैतिक रिपोर्टिंग से जुड़ा है। डिजिटल युग में ‘सबसे पहले’ दिखाने की अंधी होड़ ने कई बार बुनियादी पत्रकारिता मूल्यों को नुकसान पहुँचाया है। लाइव प्रसारण के दौरान पुलिस की रणनीति को उजागर न करना, नाबालिगों व पीड़ितों की निजता का आदर करना और तथ्यों की बहुस्तरीय पुष्टि करना ऐसे मानक हैं जो किसी भी ज़िम्मेदार पत्रकारिता की रीढ़ हैं।
पीसीआई की यह गाइडलाइन तभी सार्थक होगी जब इसे पुलिस प्रशासन और मीडिया संस्थान, दोनों पूरी ईमानदारी से लागू करें। पुलिस को पत्रकारों को बाधा या विरोधी समझने की मानसिकता छोड़नी होगी, वहीं मीडिया घरानों को टीआरपी और एक्सक्लूसिव फुटेज के दबाव से परे हटकर अपने कर्मियों की सुरक्षा और निष्पक्षता को प्राथमिकता देनी होगी। लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ तभी मजबूत रह सकता है जब वह सुरक्षित भी हो और अपनी पेशेवर सीमाओं के प्रति सचेत भी।

