-लाइव ख़बर नेशन || राजेश मोहन सहाय
विदेशी ताकतों और सुनियोजित एजेंडे के दम पर देश को अस्थिर करने की कोशिशें
देश में मौजूदा समय में जो राजनीतिक माहौल दिखाई दे रहा है, उसे केवल विपक्ष की सामान्य राजनीति समझना भारी भूल होगी। हकीकत में यह भारत की स्थिरता को चोट पहुँचाने और बाहर से सरकार बदलने की एक सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है, जिसके सूत्रधार देश से बाहर बैठे हैं।
पिछले दो वर्षों के घटनाक्रम पर गौर करें तो एक तय ढांचा साफ दिखाई देता है। जब भी संसद का महत्वपूर्ण सत्र शुरू होने वाला होता है, उससे ठीक पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई विवादित रिपोर्ट या नैरेटिव सामने आ जाता है। कभी किसी आर्थिक समूह को निशाना बनाया जाता है, कभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में नकारात्मक प्रचार शुरू होता है, तो कभी समाज को जातियों और वर्गों में बांटने की मुहिम तेज हो जाती है। यह महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि जनता के मन में भ्रम और अविश्वास पैदा करके व्यवस्था को कमजोर करने का वही तरीका है, जो कई अन्य देशों में आजमाया जा चुका है।
आज विरोध की परिभाषा बदल चुकी है। जब पूरी दुनिया में देश का प्रभाव और सम्मान बढ़ रहा है, तब कुछ लोग विदेशी मंचों पर जाकर अपनी ही लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं। संसद में बहस करने के बजाय हंगामा करना, हर सुधारवादी कदम पर युवाओं और किसानों को भ्रमित करना और विकास के बड़े फैसलों का विरोध करना एक आदत बन चुका है। सेमीकंडक्टर निर्माण, हाई-स्पीड रेल नेटवर्क और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जैसे बड़े कदमों से उन ताकतों को असहजता हो रही है जो भारत को एक कमजोर और दबाव में काम करने वाले देश के रूप में देखना चाहती हैं।
झारखंड जैसे संसाधनों से भरे राज्य में भी ऐसी अस्थिरता की झलक आसानी से देखी जा सकती है, जहाँ बुनियादी समस्याओं को पीछे छोड़कर समाज को बांटने की राजनीति की जा रही है ताकि राष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाया जा सके। लेकिन देश की जागरूक जनता अब इन चालों को भली-भांति समझती है। यह नया भारत किसी बाहरी दबाव या विभाजनकारी एजेंडे के आगे झुकने वाला नहीं है। देश के करोड़ों नागरिक हर उस कोशिश को विफल करेंगे जो राष्ट्र के विकास और एकता के आड़े आएगी।

