-आचार्य संतोष, वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक
संकटों से मुक्ति दिलाएगा 14 गांठों वाला अनंत सूत्र, कालसर्प व गुरु दोष निवारण का महायोग
पटना, 24 सितंबर 2026। सनातन काल-गणना और मुहूर्त शास्त्र में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अत्यंत कल्याणकारी, संकट-मोचक एवं ऐश्वर्य प्रदायक माना गया है। धर्मशास्त्रों में इसे ‘अनंत चतुर्दशी’ कहा जाता है। इस पावन तिथि पर क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर योगनिद्रा में लीन जगन्नियंता भगवान श्रीहरि विष्णु के ‘अनंत’ स्वरूप की विधिवत आराधना की जाती है। इसके साथ ही, दस दिवसीय गणेशोत्सव की पूर्णाहुति स्वरूप इसी दिन विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश का विसर्जन अनुष्ठान भी संपन्न होता है।
पौराणिक महात्म्य: श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को दिया था व्रत का आदेश
महाभारत के प्रसंग के अनुसार, जब पांडव द्यूतक्रीड़ा में अपना समस्त राजपाट गंवाकर वनवास के असहनीय कष्ट झेल रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को दारिद्र्य और संकटों के शमन हेतु अनंत व्रत धारण करने का परामर्श दिया था। शास्त्रों में अनंत स्वरूप का अर्थ देश, काल और वस्तु की सीमाओं से परे अविनाशी परब्रह्म से है।
इस दिन सूत अथवा रेशम के धागे को कुंकुम या हल्दी से रंगकर उसमें 14 ग्रंथियां (गांठें) लगाई जाती हैं। ये 14 गांठें ब्रह्मांड के 14 लोकों—भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् (ऊर्ध्व लोक) तथा अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल (अधोलोक) का प्रतीक मानी जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार, पुरुष इसे अपने दाहिने हाथ में और महिलाएं बाएं हाथ में रक्षा-कवच के रूप में धारण करती हैं।
शास्त्रीय श्लोक एवं मंत्र
पूजन के उपरांत अनंत सूत्र धारण करते समय इस शास्त्रोक्त मंत्र का उच्चारण अनिवार्य माना गया है:
“अनन्तसंसार महासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनन्तरूपे विनियोजयस्व ह्यनन्तसूत्राय नमो नमस्ते॥”अर्थ: हे वासुदेव! मैं इस असीम और अथाह भवसागर में निमग्न हूं, आप मेरा उद्धार करें। अपने अनंत रूप में मुझे स्थान प्रदान करें। इस अनंत सूत्र स्वरूप भगवान को मेरा बारंबार नमस्कार है।
वहीं, पूजन के समय ध्यान हेतु इस श्लोक का विधान है:
“नमस्ते देवदेवेश नमस्ते धरणीधर।
नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते विष्णुरूपिणे॥
त्राही मां देवदेवेश संसारे दुःखसागरे।
अनन्तरूपी सर्वेश अनन्ताय नमो नमः॥”
ज्योतिषीय विवेचना: कालसर्प, राहु-केतु एवं गुरु दोष का शमन
ज्योतिष शास्त्र में चतुर्दशी तिथि ‘रिक्ता’ संज्ञक मानी जाती है, जिसके अधिपति भगवान शिव (रुद्र) हैं। सामान्यतः शुभ कार्यों के लिए रिक्ता तिथियां त्याज्य होती हैं, परंतु भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी पर भगवान अनंत का अधिष्ठान होने से यह तिथि स्वतः दोषमुक्त और अमृततुल्य बन जाती है।
- कालसर्प एवं राहु-केतु शांति: भगवान विष्णु स्वयं शेषनाग की शैय्या पर विराजते हैं, जो समस्त नागकुल के अधिपति हैं। कुंडली में राहु-केतु जनित पीड़ा, कालसर्प योग अथवा नागदोष के निवारण के लिए अनंत चतुर्दशी का व्रत व पूजन अचूक उपाय है।
- बृहस्पति (गुरु) का बलवर्धन: अनंत सूत्र को हल्दी व केसर से रंगा जाता है और पीतांबरधारी श्रीहरि की अर्चना होती है। इससे कुंडली में पीड़ित या नीचस्थ देवगुरु बृहस्पति को प्रबल बल मिलता है, जिससे ज्ञान, संतान और आर्थिक समृद्धि के मार्ग खुलते हैं।
- ऊर्जा चक्रों का संतुलन: 14 गांठों वाला अनंत सूत्र शरीर के चक्रों और सूक्ष्म नाड़ियों को नवग्रहों की नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षित रखने वाला दिव्य सुरक्षा कवच बन जाता है।
मुख्य तिथियां और मुहूर्त
- चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 24 सितंबर 2026 को रात 11:18 बजे
- चतुर्दशी तिथि समाप्त: 25 सितंबर 2026 को रात 11:06 बजे
- पूजा का शुभ मुहूर्त: सुबह 06:12 बजे से दोपहर 12:36 बजे तक
शास्त्र सम्मत मुहूर्त एवं काल निर्णय
‘धर्मसिंधु’ और ‘निर्णयसिंधु’ के अनुसार, अनंत चतुर्दशी का व्रत उदयाव्यापिनी पूर्वाह्न अथवा मध्याह्न व्यापिनी तिथि में ही ग्राह्य होता है।
| काल निर्णय घटक | शास्त्र सम्मत नियम / मान |
| प्रधान पूजन काल | भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (पूर्वाह्न एवं मध्याह्न काल) |
| ग्राह्य लग्न | स्थिर लग्न (वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ) अथवा शुभ द्विस्वभाव लग्न |
| चौघड़िया चयन | शुभ, लाभ, अमृत या चर की चौघड़िया |
| वर्जित काल | राहुकाल और भद्रा (विष्टि करण) की व्याप्ति के समय पूजन पूर्णतः वर्जित |
मुहूर्त सिद्धांत: यदि चतुर्दशी तिथि सूर्योदय के उपरांत दो मुहूर्त (लगभग 4 घटी) तक व्याप्त हो, तो उसी दिन व्रत और पूजन श्रेष्ठ माना जाता है। मध्याह्न व्यापिनी तिथि में पूजन करने से जातक को अनंत पुण्य और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

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