Anjaan Jee : Editor in Chief & Publisher
दिल्ली-एनसीआर की हवा लगातार जहरीली होती जा रही है, भूजल खतरनाक स्तर तक नीचे चला गया है और तापमान हर वर्ष नए रिकॉर्ड तोड़ रहा है। सत्ता इन संकटों को वैश्विक जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करती है, लेकिन सच्चाई कहीं अधिक स्थानीय, अधिक राजनीतिक और कहीं अधिक चिंताजनक है। इस पूरे संकट के केंद्र में अरावली पर्वतमाला का वह विनाश है, जो वर्षों से योजनाबद्ध ढंग से और सत्ता की मौन स्वीकृति के साथ होता रहा है।
अरावली केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तर भारत की पर्यावरणीय रीढ़ है। लगभग 1500 किलोमीटर में फैली यह पर्वतमाला गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है और भूवैज्ञानिक दृष्टि से विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में गिनी जाती है। यही अरावली थार मरुस्थल को पूर्वी भारत की उपजाऊ भूमि तक फैलने से रोकती रही, वर्षा के वितरण को संतुलित करती रही और भूजल व जैव-विविधता के संरक्षण में निर्णायक भूमिका निभाती रही। इसके जंगलों से बनास, लूणी और साहिबी जैसी नदियों को जीवन मिला।
आज यही अरावली सत्ता की चुप्पी के कारण सिमटती जा रही है। कागज़ों में यह संरक्षित क्षेत्र है, लेकिन ज़मीन पर यह सौदेबाज़ी और दोहन के लिए खुली पड़ी है। अनियंत्रित खनन, वनों की कटाई और अंधाधुंध शहरी विस्तार ने इसकी प्राकृतिक संरचना को गहरी चोट पहुँचाई है। पहाड़ों को समतल किया जा रहा है और हरियाली को कंक्रीट में बदला जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि अरावली क्यों कट रही है, असली सवाल यह है कि यह सब किसकी सहमति और संरक्षण में हो रहा है।
अरावली का संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक चरित्र का है। समय-समय पर न्यायालयों ने खनन पर रोक लगाई, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नियमों को कागज़ी जाल में उलझाकर या राजनीतिक संरक्षण के सहारे उनका उल्लंघन लगातार जारी है। विकास का नारा यहाँ एक सुविधाजनक आवरण बन चुका है, जिसके पीछे खनन, रियल एस्टेट और ठेकेदारी का संगठित तंत्र सक्रिय है। जनता को विकास का सपना दिखाया जाता है, जबकि असली लाभ उन लोगों को मिलता है जिनके नाम कभी फ़ाइलों में दर्ज नहीं होते।
दिल्ली-एनसीआर में बढ़ता प्रदूषण, गिरता भूजल स्तर और बढ़ती गर्मी सीधे तौर पर अरावली के क्षरण से जुड़े हुए हैं। जब राजधानी की हवा ज़हर बन जाती है, तब सत्ता आपात बैठकें और औपचारिक घोषणाएँ करती है, लेकिन अरावली पर वास्तविक कार्रवाई से बचती रहती है। क्योंकि अरावली पर सवाल उठाना उन हितों को चुनौती देना है, जिनसे सत्ता का आराम और राजनीतिक समीकरण जुड़े हुए हैं। जनता मास्क पहनकर जीने को मजबूर है, जबकि सत्ता मौन साधे हुए है।

अरावली के आसपास बसे स्थानीय समुदाय इस विनाश की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। जलस्रोत सूख रहे हैं, आजीविका खत्म हो रही है और लोगों को विस्थापन झेलना पड़ रहा है। जनसुनवाइयाँ केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं, क्योंकि निर्णय पहले ही बंद कमरों में तय हो चुके होते हैं। यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि प्रबंधित सहमति की व्यवस्था है, जहाँ जनता की आवाज़ कमजोर और लाभार्थियों की पकड़ मजबूत है।
अब यह बहस पर्यावरण बनाम विकास की नहीं रही। यह स्पष्ट रूप से सत्ता बनाम जनता का प्रश्न बन चुकी है। या तो अरावली बचेगी, या सत्ता का यह मौन और सौदेबाज़ मॉडल चलता रहेगा। दोनों एक साथ संभव नहीं हैं। अरावली का गिरना केवल पहाड़ों का गिरना नहीं होगा, बल्कि दिल्ली-एनसीआर के भविष्य का झुक जाना होगा।
अरावली को बचाना कोई भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि जनता का अधिकार और सत्ता की परीक्षा है। इतिहास गवाह है कि जो सत्ता भूगोल की चेतावनियों को अनदेखा करती है, वह अंततः जनता के सामने टिक नहीं पाती। अरावली को बचाना पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि भारत के भविष्य को सुरक्षित करने की अनिवार्य शर्त है।
