हिमालय की चीख: जलवायु संकट में नेपाल की अंतहीन त्रासदी

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 – संतोष श्रीवास्तव, मुख्य संपादक सह प्रकाशक

सुनामी या ग्लोबल वार्मिंग-प्रकृति का प्रकोप या हमारी नीतियों की विफलता?

सम्पादकीय : नेपाल-हिमालय की गोद में बसा वह देश, जिसकी पहचान उसकी प्राकृतिक सुंदरता, शांत पर्वतों और सांस्कृतिक समृद्धि से होती है। लेकिन यही हिमालय आज बार-बार ऐसी त्रासदियों का गवाह बन रहा है, जिनमें इंसानी जिंदगी, घर, खेत, सड़कें और सपने सब बह जाते हैं। सवाल यह है कि नेपाल की यह अंतहीन दर्द-कथा आखिर कब तक जारी रहेगी?

नेपाल में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं को केवल प्रकृति का प्रकोप कहकर अपनी जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। भूकंप, भूस्खलन, अचानक आने वाली बाढ़ और हिमनद झीलों के फटने जैसी घटनाओं के पीछे प्राकृतिक कारण जरूर हैं, लेकिन बदलती जलवायु ने इनके खतरे और विनाशकारी क्षमता को कहीं अधिक बढ़ा दिया है।

आज हिमालय तेजी से बदल रहा है। तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, हिमनद झीलों का आकार बढ़ रहा है और अचानक बाढ़ का खतरा लगातार गहरा रहा है। दूसरी ओर, अनियोजित निर्माण, जंगलों की कटाई, नदी के प्राकृतिक रास्तों में अतिक्रमण और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी आपदा को त्रासदी में बदल देती है।

सुनामी शब्द से आगे बढ़ना होगा

नेपाल के संदर्भ में सुनामी शब्द का इस्तेमाल भावनात्मक रूप से किया जा सकता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से सुनामी मुख्यतः समुद्र के भीतर होने वाली भूकंपीय या अन्य बड़ी हलचल से पैदा होने वाली समुद्री लहर है। नेपाल की अधिकांश विनाशकारी बाढ़ों और जल-आपदाओं को सुनामी कहना सही नहीं होगा।

लेकिन यदि ‘सुनामी’ को हम लगातार बढ़ती आपदाओं की प्रतीकात्मक लहर मानें, तो यह शब्द एक गंभीर चेतावनी जरूर देता है-एक ऐसी लहर, जो हर बार पहले से अधिक नुकसान छोड़ जाती है।

असल सवाल ग्लोबल वार्मिंग का है।

जलवायु परिवर्तन केवल तापमान बढ़ने की कहानी नहीं है। यह बारिश के चरित्र को बदल रहा है। कहीं लंबे समय तक सूखा, तो कहीं कम समय में अत्यधिक बारिश। कहीं ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं, तो कहीं पिघले पानी से बनी झीलें खतरे का नया स्रोत बन रही हैं।

हिमालय की पीड़ा सिर्फ नेपाल की नहीं

नेपाल की त्रासदी को नेपाल की सीमा तक सीमित करके देखना भी भूल होगी। हिमालय भारत, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और चीन सहित पूरे क्षेत्र की जल सुरक्षा और पारिस्थितिकी से जुड़ा है।

हिमालय में होने वाला परिवर्तन नदियों के प्रवाह, कृषि, पेयजल, ऊर्जा और करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए नेपाल की आपदा वास्तव में पूरे दक्षिण एशिया के लिए चेतावनी है।

प्रश्न यह भी है कि विकास का हमारा मॉडल कैसा हो?

  • क्या पहाड़ों को काटकर सड़क बनाना ही विकास है?
  • क्या नदी के किनारे निर्माण करना प्रगति है?
  • क्या पर्यावरणीय चेतावनियों को नजरअंदाज कर पर्यटन परियोजनाएं खड़ी करना समझदारी है?

यदि इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ है, तो हमें विकास की परिभाषा बदलनी होगी।

दर्द से सबक कब मिलेगा?

हर आपदा के बाद राहत सामग्री पहुंचती है, मुआवजे की घोषणा होती है, कुछ जांच समितियां बनती हैं और कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य मान लिया जाता है। लेकिन प्रकृति अपनी चेतावनी बार-बार दोहरा रही है।

जरूरत आपदा के बाद राहत से ज्यादा आपदा से पहले तैयारी की है।

नेपाल को मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, ग्लेशियर और हिमनद झीलों की लगातार निगरानी, सुरक्षित निर्माण मानक, वैज्ञानिक भू-उपयोग नीति और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर देना होगा। पड़ोसी देशों को भी हिमालयी क्षेत्र में साझा जलवायु और आपदा-प्रबंधन तंत्र विकसित करना चाहिए।

प्रकृति को दोष देकर हम कब तक बचेंगे?

नेपाल की अंतहीन दर्द-कथा में प्रकृति की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन हर त्रासदी में मानव की भूमिका भी तलाशनी होगी।

ग्लोबल वार्मिंग प्रकृति की चेतावनी है, जबकि अनियोजित विकास उस चेतावनी को विनाश में बदल सकता है।

नेपाल आज जिस पीड़ा से गुजर रहा है, वह आने वाले कल की संभावित तस्वीर भी हो सकती है। हिमालय हमें लगातार संकेत दे रहा है कि उसके साथ संघर्ष नहीं, संतुलन और सह-अस्तित्व की जरूरत है।

अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अगली आपदा कब आएगी।

सवाल यह होना चाहिए-जब अगली आपदा आएगी, तब क्या हम तैयार होंगे?

क्योंकि प्रकृति को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसकी चेतावनी को समझकर विनाश की कीमत जरूर कम की जा सकती है।

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