श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: धर्म, दर्शन और ज्योतिष का अद्भुत संगम

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– आचार्य संतोष, ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य
(वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक)

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी सनातन धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो 4 सितम्बर की मध्य रात्रि को भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य उत्सव मनाया जायेगा। यह केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना, अधर्म के विनाश, कर्मयोग, भक्ति, प्रेम और जीवन में संतुलन का संदेश देने वाला पर्व है।

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी की रात्रि में श्रद्धालु उपवास, भगवान का पूजन, श्रीमद्भागवत कथा, भजन-कीर्तन और मध्यरात्रि में कृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं।

शास्त्रों में श्रीकृष्ण जन्म का उल्लेख

भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का मूल उद्देश्य स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में बताते हैं-

अर्थात जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब भगवान धर्म की स्थापना के लिए स्वयं प्रकट होते हैं।

भगवान आगे कहते हैं-

अर्थात साधुजनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए भगवान युग-युग में अवतार लेते हैं।

भगवद्गीता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश कर्म के विषय में है-

अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल अपने कर्म पर है, उसके फल पर नहीं। जन्माष्टमी का आध्यात्मिक संदेश भी यही है कि जीवन में कर्तव्य, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते हुए फल की अत्यधिक चिंता नहीं करनी चाहिए।

श्रीकृष्ण का जन्म सामान्य अर्थों में जन्म नहीं, बल्कि भगवान का प्राकट्य माना जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में कृष्ण के प्राकट्य का वर्णन अत्यंत दिव्य रूप में मिलता है।

कारागार में बंद देवकी और वसुदेव के यहां श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ। कंस के अत्याचार से पीड़ित समाज को भगवान ने आश्वासन दिया कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, अंततः विजय धर्म की ही होती है।

कृष्ण का बाल रूप हमें निष्कपट प्रेम और आनंद का संदेश देता है। गोपियों के साथ उनकी लीलाएं भक्ति और आत्मसमर्पण का प्रतीक मानी जाती हैं। कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया गीता का उपदेश कर्म, ज्ञान और योग का मार्ग दिखाता है।

इस प्रकार श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बाललीला से लेकर महाभारत तक जीवन के लगभग हर पक्ष को स्पर्श करता है।

जन्माष्टमी का ज्योतिषीय महत्व

ज्योतिष की दृष्टि से जन्माष्टमी अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि के समय माना जाता है। हालांकि विभिन्न पंचांग परंपराओं में जन्माष्टमी के निर्धारण में स्थानीय समय, तिथि और नक्षत्र के आधार पर अंतर हो सकता है।

अष्टमी तिथि मन और अंतर्मुखी साधना से जुड़ी मानी जाती है। कृष्ण पक्ष का समय भीतर की ओर जाने, आत्मचिंतन और साधना का प्रतीक माना जाता है। मध्यरात्रि का समय भी बाहरी अंधकार के बीच आंतरिक प्रकाश के उदय का आध्यात्मिक संकेत माना जाता है।

रोहिणी नक्षत्र का संबंध चंद्रमा से है और ज्योतिष में इसे आकर्षण, सौंदर्य, सृजनशीलता तथा संवेदनशीलता से जोड़ा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में प्रेम, माधुर्य, आकर्षण और करुणा के गुणों को इसी प्रतीकात्मक दृष्टि से भी देखा जाता है।

चंद्रमा और श्रीकृष्ण

कृष्ण जन्माष्टमी का संबंध चंद्र तिथि से होने के कारण चंद्रमा का विशेष महत्व है। भारतीय ज्योतिष में चंद्रमा मन, भावनाओं, संवेदनाओं और मानसिक स्थिरता का कारक माना जाता है।

जन्माष्टमी का व्रत और रात्रि जागरण मन को एकाग्र करने, इंद्रियों पर संयम रखने तथा भगवान के ध्यान में मन लगाने की साधना के रूप में देखा जा सकता है।

इसीलिए जन्माष्टमी केवल बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि मन को नियंत्रित कर भीतर के कृष्ण तत्व को जागृत करने का अवसर भी है।

व्रत और पूजन का महत्व एवं मुहूर्त

जन्माष्टमी पर श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपवास रखते हैं। दिनभर भगवान का स्मरण, भजन, कथा और पूजन किया जाता है तथा मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण के प्राकट्य के समय विशेष पूजा की जाती है।

  • रोहिणी नक्षत्र रात्रि 11:04 बजे तक ही है अतः पूजन की तैयारी और प्रारंभिक अनुष्ठान जैसे मंत्र जाप, पाठ और ध्यान करें और निशीथ काल में लड्डू गोपाल का अभिषेक और आरती करें।
  • पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण का वास्तविक जन्म अर्द्धरात्रि (मध्यरात्रि) में हुआ था।

उनका जन्म कारागार के अंधकार में हुआ था। रात 12 बजे का समय पूर्ण अंधकार का प्रतीक है,  जिसे दूर करने के लिए भगवान अवतरित हुए थे।

पूजन में सामान्यतः-

  • भगवान श्रीकृष्ण का पंचामृत अभिषेक
  • पीतांबर और आभूषण अर्पण
  • माखन-मिश्री का भोग
  • तुलसी दल अर्पित करना
  • धूप-दीप एवं नैवेद्य
  • कृष्ण मंत्र एवं नाम-स्मरण
  • गीता एवं भागवत का पाठ का विशेष महत्व माना जाता है।

श्रीकृष्ण का जीवन हमें बताता है कि धर्म केवल पूजा-पद्धति का विषय नहीं, बल्कि कर्तव्य और आचरण का भी विषय है।

उन्होंने अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया, मित्रता निभाई, समाज को संगठित किया और अर्जुन को कर्म का मार्ग दिखाया। इसलिए जन्माष्टमी का वास्तविक संदेश है-

अन्याय के सामने मौन न रहें, कर्तव्य से विमुख न हों और जीवन में प्रेम, करुणा तथा विवेक को स्थान दें।

कृष्ण की बांसुरी प्रेम का प्रतीक है तो सुदर्शन चक्र धर्म की रक्षा का। उनका जीवन हमें सिखाता है कि आवश्यकता पड़ने पर प्रेम और करुणा के साथ-साथ धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ता भी आवश्यक है।

आज तनाव, प्रतिस्पर्धा, असंतोष और मानसिक अशांति से घिरे जीवन में श्रीकृष्ण का गीता दर्शन पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है।

कर्म करते रहना, परिणाम के प्रति अनावश्यक आसक्ति छोड़ना, कठिन परिस्थितियों में विवेक बनाए रखना और धर्म के पक्ष में खड़े होना-ये श्रीकृष्ण के ऐसे संदेश हैं जो हर युग में मानव जीवन का मार्गदर्शन कर सकते हैं।

जन्माष्टमी इसलिए केवल मंदिरों में मनाया जाने वाला पर्व नहीं है। यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने और यह प्रश्न पूछने का अवसर देता है कि क्या हमारे जीवन में सत्य, प्रेम, कर्तव्य और धर्म का पर्याप्त स्थान है?

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अंधकार में प्रकाश, अधर्म पर धर्म, अहंकार पर विवेक और निराशा पर आशा की विजय का पर्व है। श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, धर्म और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।

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