– आचार्य संतोष की विशेष ज्योतिषीय प्रस्तुति
उदयातिथि में अष्टमी व्रत, अपराह्ण-व्याप्ति के आधार पर 20 अक्टूबर को विजयादशमी और श्रवण नक्षत्र में विसर्जन का अकाट्य विधान
पटना, 16 अक्टूबर: शारदीय नवरात्रि 2026 में तिथियों के दुर्लभ संयोग और काल-गणना को लेकर धर्मशास्त्रों के आधार पर शास्त्रसम्मत निर्णय स्पष्ट हो गया है। पंचांगीय गणना के अनुसार इस बार महाअष्टमी और महानवमी का पर्व एक ही दिन पड़ रहा है।
उदयातिथि के मान से महाअष्टमी का मुख्य व्रत 19 अक्टूबर, सोमवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि में कन्या पूजन और हवन नवमी तिथि में करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। नवमी तिथि का संयोग बनने के कारण हवन और कन्या पूजन का अनुष्ठान भी इसी दिन संपन्न होगा। ऐसे में साधक 19 अक्टूबर को ही अष्टमी का व्रत रखेंगे और नवमी का पूजन व हवन पूर्ण करेंगे।
वहीं विजयादशमी पर्व और देवी प्रतिमा विसर्जन को लेकर धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु और डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे के ग्रंथ धर्मशास्त्र का इतिहास में दिए गए कर्मकाल-व्याप्ति के सिद्धांतों के आधार पर 20 अक्टूबर का दिन ही शास्त्रोक्त और सर्वमान्य सिद्ध हुआ है। भक्त 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाएंगे और मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन करेंगे।
पंचांग अनुसार तिथि एवं नक्षत्र की सटीक समय-सारिणी
- महाअष्टमी तिथि:
- प्रारंभ: 18 अक्टूबर को सुबह 08 बजकर 29 मिनट से
- समाप्ति: 19 अक्टूबर को रात (शाम) 10 बजकर 53 मिनट तक
- 19 अक्टूबर को सूर्योदयकालीन उदयातिथि अष्टमी होने से इसी दिन महाअष्टमी का मुख्य व्रत रखा जाएगा।
- महानवमी तिथि:
- प्रारंभ: 19 अक्टूबर को रात (शाम) 10 बजकर 53 मिनट से
- समाप्ति: 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 52 मिनट तक
- नवमी तिथि में हवन और कन्या पूजन का विशेष विधान होने से 19 अक्टूबर की रात्रि अथवा संधिकाल के नियमों के अनुसार अनुष्ठान पूर्ण किए जाएंगे।
- विजयादशमी तिथि:
- प्रारंभ: 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 52 मिनट से
- समाप्ति: 21 अक्टूबर को दोपहर 02 बजकर 13 मिनट तक
- श्रवण नक्षत्र:
- प्रारंभ: 19 अक्टूबर को दोपहर/शाम 03 बजकर 39 मिनट से
- समाप्ति: 20 अक्टूबर को शाम 06 बजकर 02 मिनट तक
विजयादशमी का मुख्य कर्मकाल: अपराह्ण-व्याप्ति का निर्णायक नियम
धर्मशास्त्रों में विजयादशमी के पूजन और उत्सव के लिए ‘अपराह्ण काल’ को ही मुख्य कर्मकाल निर्धारित किया गया है। निर्णयसिन्धु की परंपरा का विशद विश्लेषण करते हुए डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे ने ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ में स्पष्ट किया है कि विजयादशमी के निर्णय में केवल सूर्योदयकालीन तिथि (उदयातिथि) को आधार नहीं बनाया जाता, बल्कि कर्मकाल यानी अपराह्ण में तिथि की उपस्थिति सर्वोपरि होती है।
अतः 20 अक्टूबर के सूर्योदय के समय नवमी तिथि का होना 20 अक्टूबर को विजयादशमी अस्वीकार करने का कारण कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि दशमी तिथि उसी दिन दोपहर 12 बजकर 52 मिनट पर यानी अपराह्ण काल के आरंभ होते ही उपलब्ध हो जाती है।
निर्णायक बिंदु: दोनों दिनों में अपराह्ण-व्याप्ति और पूर्वविद्धा का ग्रहण
वर्ष 2026 के लिए सबसे निर्णायक नियम दोनों दिनों में अपराह्ण-व्याप्ति का है। धर्मशास्त्रीय व्यवस्था के अनुसार:
दशमी चैव सम्पूर्णा पूर्वविद्धा यदा भवेत्।
अपराह्णद्वये व्याप्ता पूर्वैव गृह्यते बुधैः॥
निर्णयसिन्धु-परंपरा का सार यह निर्देश देता है कि यदि दशमी तिथि दो दिनों तक चली जाए और दोनों दिनों के अपराह्ण में व्याप्त हो, तो पूर्व दिन (प्रथम दिन) को ही ग्रहण किया जाता है। 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 52 मिनट से दशमी प्रारंभ होकर अपराह्ण में उपस्थित है तथा 21 अक्टूबर को भी दोपहर 02 बजकर 13 मिनट तक अपराह्ण में विद्यमान है। इस शास्त्रीय सिद्धांत के अनुसार प्रथम दिन यानी 20 अक्टूबर को ही विजयादशमी का पर्व मनाना पूर्णतः शास्त्रसम्मत है।
प्रतिमा विसर्जन: श्रवण नक्षत्र का उत्तम संयोग
प्रतिमा विसर्जन के लिए दशमी तिथि और श्रवण नक्षत्र के संयोग को सर्वोत्तम माना गया है:
श्रवणेनोद्वासयेद्देवीं दशम्यां च विशेषतः।
एवं कृत्वा तु लभते सर्वकामसमृद्धिदाम्॥
20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 52 मिनट पर दशमी तिथि का प्रवेश हो रहा है और श्रवण नक्षत्र शाम 06 बजकर 02 मिनट तक व्याप्त रहेगा। अतः 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 52 मिनट से शाम 06 बजकर 02 मिनट के मध्य दशमी तिथि और श्रवण नक्षत्र का यह दुर्लभ संयोग प्राप्त हो रहा है। इसी शुभ काल में मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन और विजयादशमी का अपराजिता पूजन व शमी पूजन संपन्न करना सर्वश्रेष्ठ और कल्याणकारी होगा।

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