रिश्वत मामले में तत्कालीन अवर निरीक्षक दोषी करार

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Santosh K Srivastav : Editor in Chief & Publisher

विशेष निगरानी न्यायालय ने सुनाई दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा, निगरानी ब्यूरो ने भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई को बताया बड़ी सफलता

पटना, 29 जुलाई 2026। भ्रष्टाचार के विरुद्ध निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। विशेष निगरानी न्यायालय, पटना ने वर्ष 2011 के एक रिश्वतखोरी मामले में उदवंतनगर थाना (भोजपुर) के तत्कालीन अवर निरीक्षक रामाशंकर सिंह को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी करार देते हुए दो वर्ष के सश्रम कारावास एवं अर्थदंड की सजा सुनाई है।

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के अनुसार, विशेष न्यायालय निगरानी, पटना के न्यायाधीश अतुल कुमार सिंह ने निगरानी थाना कांड संख्या-23/2011 (विशेष वाद संख्या-21/2011) में निर्णय सुनाते हुए अभियुक्त को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 तथा धारा 13(2) सहपठित धारा 13(1)(डी) के तहत दोषी ठहराया।

मामला परिवादी अजीत कुमार सिंह की शिकायत पर दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उदवंतनगर थाना कांड संख्या-74/2011 में धाराओं को यथावत रखने तथा केस डायरी को अनुकूल रूप से लिखने के एवज में तत्कालीन अवर निरीक्षक ने ₹10,000 की रिश्वत की मांग की थी। शिकायत के सत्यापन के बाद निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की टीम ने 15 अप्रैल 2011 को आरोपी को ₹10,000 रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया था।

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मामले की जांच तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक गंगा राम ने की और समय पर न्यायालय में आरोप-पत्र दाखिल किया। अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक किशोर कुमार सिंह ने प्रभावी पैरवी की। सुनवाई के दौरान अभियोजन ने कुल आठ साक्षियों की गवाही कराई, जिसके आधार पर न्यायालय ने अभियुक्त को दोषी ठहराया।

न्यायालय ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत दो वर्ष के सश्रम कारावास एवं ₹10,000 के अर्थदंड तथा धारा 13(2) सहपठित धारा 13(1)(डी) के तहत भी दो वर्ष के सश्रम कारावास एवं ₹10,000 के अर्थदंड की सजा सुनाई है। अर्थदंड जमा नहीं करने की स्थिति में तीन माह का साधारण कारावास भुगतना होगा। न्यायालय के आदेश के अनुसार दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने बताया कि वर्ष 2026 में अब तक भ्रष्टाचार के 12 मामलों में न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि एवं सजा सुनाई जा चुकी है। ब्यूरो के अनुसार, पिछले 25 वर्षों (वर्ष 2000 से 2024) के दौरान औसतन प्रतिवर्ष 5.6 मामलों में ही सजा हो पाती थी, जबकि वर्ष 2026 में अब तक यह संख्या उल्लेखनीय रूप से अधिक रही है। ब्यूरो ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में प्रभावी अभियोजन की कार्रवाई आगे भी निरंतर जारी रहेगी।