आरक्षण के नाम पर महाभारत क्यों?

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– संतोष श्रीवास्तव : मुख्य संपादक सह प्रकाशक

जब समाधान खोजने के बजाय समाज जाति की तलवार से अपनी ही परछाईं काटने लगे

आरक्षण भारतीय राजनीति का वह विषय है, जिस पर बहस शुरू होते ही संविधान जेब में चला जाता है, आंकड़े घर पर रह जाते हैं और भावनाएं माइक्रोफोन पकड़ लेती हैं। कोई कहता है-“आरक्षण खत्म करो”, कोई कहता है-“आरक्षण बचाओ”, और बीच में आम नागरिक सोचता रहता है कि आखिर शिक्षा, रोजगार और अवसर की असली लड़ाई कब शुरू होगी?

मजेदार बात यह है कि आरक्षण पर बहस करने वाले कई लोग समस्या का समाधान खोजने के बजाय नई-नई दीवारें खड़ी करने में जुट जाते हैं। कोई जाति के नाम पर राजनीति चाहता है तो कोई जाति के नाम पर संगठन। जैसे देश नहीं, मोहल्ले की कबड्डी प्रतियोगिता हो-“हमारी टीम अलग, तुम्हारी टीम अलग।”

मान लीजिए किसी व्यक्ति के पास प्रतिभा है, मेहनत है, संसाधन हैं और अवसर भी उपलब्ध हैं। तब निश्चित रूप से उसकी योग्यता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लेकिन सवाल यह भी है कि जिन लोगों को सदियों से शिक्षा, संपत्ति और संस्थागत अवसरों से वंचित रखा गया, क्या उनके लिए शुरुआती रेखा वही थी जो दूसरों की थी?

यहीं से असली बहस शुरू होती है।

लेकिन हमारे यहां असली बहस अक्सर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती है। उसके बाद शुरू होता है-“तुम्हारी जाति क्या है?”

मानो नौकरी का इंटरव्यू नहीं, बारात में रिश्ता तय हो रहा हो।

आरक्षण की राजनीति और राजनीति का आरक्षण

यह भी कम दिलचस्प दृश्य नहीं है कि राजनीतिक दल आरक्षण के सवाल को चुनावी मौसम में ऐसे संभालते हैं जैसे दुकानदार त्योहार के समय अपनी सबसे लोकप्रिय मिठाई संभालता है।

किसी को डर है कि आरक्षण कम हुआ तो वोट कम होंगे। किसी को डर है कि आरक्षण बढ़ा तो वोट दूसरी तरफ चले जाएंगे। जनता पूछती है-“साहब, शिक्षा कैसी होगी?” जवाब आता है-“पहले हमारी जाति की चिंता करो।”

इस मानसिकता से बाहर निकलना जरूरी है।

आरक्षण पर बहस केवल “किसे कितना मिला” तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी पूछा जाना चाहिए कि सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता कैसी है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अवसर कितने समान हैं, ग्रामीण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा क्यों नहीं मिलती, निजी शिक्षा इतनी महंगी क्यों है और रोजगार के अवसर इतने सीमित क्यों हैं?

अगर शुरुआत की दौड़ में कुछ बच्चों के जूते ही नहीं हैं और कुछ बच्चों के पास स्पोर्ट्स शूज, कोच और ट्रैक-तो केवल अंतिम परिणाम देखकर यह कहना कि “सब बराबर दौड़े थे”, गणित नहीं, व्यंग्य है।

जाति देखकर डॉक्टर?

समाज में जातिगत विभाजन के नाम पर ऐसे सुझाव भी सुनने को मिलते हैं कि डॉक्टर की जाति देखकर इलाज कराया जाए। यह विचार सुनते ही चिकित्सा विज्ञान शायद अपना स्टेथोस्कोप उतारकर पूछे- “भाई, मेरी डिग्री देखोगे या मेरी जाति?”

डॉक्टर की योग्यता का मूल्यांकन उसकी जाति से नहीं, शिक्षा, प्रशिक्षण, पंजीकरण, विशेषज्ञता, अनुभव और चिकित्सा मानकों से होना चाहिए।

इसी तरह यह कहना कि किसी डॉक्टर ने कम प्रतिशत अंक पाकर प्रवेश लिया, इसलिए वह अनिवार्य रूप से अयोग्य होगा—यह भी खतरनाक सरलीकरण है। किसी चिकित्सक की क्षमता का फैसला उसके पूरे प्रशिक्षण और पेशेवर प्रदर्शन से होना चाहिए, केवल एक परीक्षा के अंक से नहीं।

और यदि किसी डॉक्टर के इलाज पर संदेह है तो दूसरी चिकित्सकीय राय लीजिए। लेकिन जाति पूछकर ऑपरेशन करवाना शुरू कर दिया गया तो अगला सवाल शायद यह होगा कि एक्स-रे मशीन किस जाति की है!

अपने स्कूल, अपनी दुकान और अपनी दीवार?

समाज के भीतर शिक्षा के लिए विद्यालय खोलना, छात्रवृत्ति देना, कोचिंग की व्यवस्था करना, पुस्तकालय बनाना और व्यवसाय को बढ़ावा देना- ये सभी अच्छे कदम हो सकते हैं।

लेकिन “हमारे बच्चों को केवल हमारे ही लोग पढ़ाएं” जैसी सोच समस्या का समाधान नहीं, सामाजिक दूरी को संस्थागत रूप देने का रास्ता बन सकती है।

शिक्षा का उद्देश्य दीवार बनाना नहीं, दरवाजा खोलना है।

अगर किसी समुदाय के पास संसाधन हैं तो वह स्कूल खोले, पुस्तकालय बनाए, गरीब विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दे, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाए और उद्यमिता को बढ़ावा दे। यह कहीं अधिक प्रभावी सामाजिक उत्तर होगा।

क्योंकि नौकरी के लिए केवल जातीय पहचान नहीं, कौशल चाहिए। और कौशल के लिए शिक्षा चाहिए।

राजनीति में भी “अपना ही आदमी”?

मताधिकार का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की जाति देखकर करने की सलाह लोकतंत्र को बहुत छोटा कर देती है।

मतदाता को उम्मीदवार की जाति नहीं, उसका काम, ईमानदारी, नीति, शिक्षा, प्रशासनिक क्षमता और जनता के प्रति जवाबदेही देखनी चाहिए।

वरना लोकतंत्र धीरे-धीरे चुनाव से बदलकर जातीय जनगणना की प्रतियोगिता बन जाएगा- “हमारे इतने वोट, तुम्हारे इतने वोट।”

लोकतंत्र का असली मजाक तब होगा जब जनता पांच साल तक विकास पूछने के बजाय केवल यह गिने कि विधानसभा में किस जाति के कितने लोग बैठे हैं।

अधिकारी कौन, कर्मचारी कौन?

यह दावा कि देश में “करीब 90 प्रतिशत अधिकारी दलित हैं और उनके अधीनस्थ कर्मचारी सवर्ण हैं”, एक गंभीर सांख्यिकीय दावा है, जिसके लिए विश्वसनीय सरकारी या आधिकारिक आंकड़े आवश्यक हैं। बिना प्रमाण ऐसे आंकड़े को तथ्य मान लेना उचित नहीं।

और मान लीजिए किसी कार्यालय में अधिकारी किसी विशेष सामाजिक वर्ग से है- तो कर्मचारी का काम उसकी जाति की सेवा करना नहीं, बल्कि अपने पद के दायित्व का निर्वहन करना है। अधिकारी भी संविधान और सेवा नियमों के अधीन है।

यही व्यवस्था किसी भी लोकतांत्रिक संस्थान को मजबूत बनाती है।

असली लड़ाई किससे है?

असली लड़ाई सवर्ण बनाम दलित की नहीं होनी चाहिए।

असली लड़ाई गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, अवसरों की असमानता, भ्रष्टाचार, कमजोर सरकारी स्कूलों और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से होनी चाहिए।

जो सक्षम है, उसे आगे बढ़ने का अवसर मिले। जो पीछे है, उसे आगे आने का वास्तविक रास्ता मिले। सामाजिक न्याय और योग्यता को दुश्मन मानने की जरूरत नहीं है।

एक तरफ अवसर की समानता हो और दूसरी तरफ ऐतिहासिक तथा सामाजिक वंचना को समझने वाली नीतियां—इन दोनों के बीच संतुलन की गंभीर बहस होनी चाहिए।

लेकिन हम क्या कर रहे हैं?

हम सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख रहे हैं- “तुम्हारी जाति क्या है?”

फिर दूसरा जवाब देता है- “पहले तुम बताओ!”

और तीसरा व्यक्ति चुपचाप दोनों की पोस्ट पढ़कर सोचता है- “भाई, मुझे नौकरी चाहिए, जातीय युद्ध नहीं।”

शायद यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा व्यंग्य है।

हमारे पास संविधान है, लोकतंत्र है, विशाल युवा आबादी है, प्रतिभा है और आगे बढ़ने की क्षमता है। जरूरत केवल इतनी है कि जाति को पहचान के रूप में समझें, हथियार के रूप में नहीं।

आरक्षण पर बहस हो- खूब हो। आंकड़ों के साथ हो, संविधान के साथ हो, सामाजिक वास्तविकताओं के साथ हो और भविष्य की पीढ़ियों को ध्यान में रखकर हो।

लेकिन अगर हर समस्या का समाधान जातीय खांचे में ही खोजेंगे, तो एक दिन देश में इतने खांचे बन जाएंगे कि विकास बेचारा पूछता घूमेगा- “मेरा वाला खांचा कौन सा है?”

समाज को दीवारें नहीं, सीढ़ियां चाहिए।

और सीढ़ी ऐसी हो, जिस पर चढ़कर कोई भी सक्षम व्यक्ति आगे जा सके- चाहे उसका नाम कुछ भी हो, उसकी जाति कुछ भी हो और उसका जन्म किसी भी घर में हुआ हो।