E20 पेट्रोल-ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा या उपभोक्ताओं की नई चुनौती?

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– Santosh K Srivastav : Editor in Chief & Publisher

देशभर के पेट्रोल पंपों पर 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित E20 पेट्रोल की अनिवार्य उपलब्धता ने एक नई बहस को जन्म दिया है। सरकार इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता, कच्चे तेल के आयात में कमी, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बता रही है। दूसरी ओर विपक्ष और उपभोक्ताओं का एक वर्ग इसे पुरानी गाड़ियों के लिए जोखिमपूर्ण बताते हुए सरकार की तैयारियों और पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है। इन दावों और प्रतिदावों के बीच सबसे बड़ी आवश्यकता तथ्यों पर आधारित संवाद की है, ताकि नीति का मूल्यांकन राजनीति के बजाय व्यवहारिकता के आधार पर हो सके।

भारत विश्व के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने का उद्देश्य आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने, कार्बन उत्सर्जन कम करने और गन्ना सहित अन्य कृषि उत्पादों से जुड़े किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराने की संभावना है। दीर्घकालिक दृष्टि से यह ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक रणनीतिक पहल है।

लेकिन किसी भी नीति की सफलता केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन से तय होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता शुद्ध पेट्रोल की तुलना में कम होती है। इसी कारण E20 ईंधन के उपयोग से कुछ वाहनों में लगभग 5 से 7 प्रतिशत तक माइलेज प्रभावित हो सकता है। यह गिरावट वाहन के मॉडल, इंजन तकनीक और उपयोग की परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है। इसलिए यह कहना कि सभी गाड़ियों का माइलेज भारी मात्रा में घट जाएगा, वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। वहीं यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि यदि ईंधन की दक्षता कम होती है, तो उपभोक्ताओं को आर्थिक राहत के विकल्पों पर भी विचार किया जाए।

पुरानी गाड़ियों को लेकर उठ रही चिंताएं भी पूरी तरह निराधार नहीं हैं। वर्ष 2023 से पहले निर्मित अनेक वाहनों को E20 के अनुरूप डिजाइन नहीं किया गया था। ऐसे वाहनों में ईंधन प्रणाली के कुछ रबर एवं प्लास्टिक पुर्जों पर लंबे समय में प्रभाव पड़ने की आशंका विशेषज्ञों और विभिन्न तकनीकी रिपोर्टों में व्यक्त की गई है। हालांकि सभी पुराने वाहनों में तत्काल नुकसान होगा, ऐसा निष्कर्ष भी उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों से सिद्ध नहीं होता। इसलिए आवश्यकता भय या भ्रम फैलाने की नहीं, बल्कि वाहन निर्माताओं और सरकार द्वारा स्पष्ट तकनीकी दिशा-निर्देश जारी करने की है।

इस पूरे विवाद ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी लंबे समय से जैव-ईंधन और फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक के समर्थक रहे हैं, जबकि ईंधन नीति का प्रत्यक्ष दायित्व पेट्रोलियम मंत्रालय के पास है। हाल के सार्वजनिक बयानों में जब माइलेज पर प्रभाव को लेकर अलग-अलग स्वर सुनाई दिए, तो विपक्ष को सरकार पर सवाल उठाने का अवसर मिला। किसी भी महत्वपूर्ण नीति के सफल क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है कि सरकार के सभी संबंधित विभाग एक समान और स्पष्ट संदेश दें। विरोधाभासी बयान केवल भ्रम बढ़ाते हैं और नीति की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता और स्वच्छ ईंधन की दिशा में भारत का प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन जनहित की नीतियां केवल घोषित करने से सफल नहीं होतीं; उन्हें जनता का विश्वास भी अर्जित करना पड़ता है। यदि उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी, स्पष्ट विकल्प और संक्रमण काल के लिए व्यावहारिक समाधान उपलब्ध कराए जाएं, तो ऐसी नीतियां अधिक स्वीकार्य बन सकती हैं। सरकार को यह भी विचार करना चाहिए कि जिन वाहनों को अभी E20 के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं माना जाता, उनके लिए संक्रमण अवधि में वैकल्पिक ईंधन उपलब्ध रहे। साथ ही, यदि एथेनॉल मिश्रण से उत्पादन लागत में बचत होती है, तो उसका लाभ कर ढांचे या मूल्य निर्धारण के माध्यम से उपभोक्ताओं तक पहुंचाने पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

भारत की ऊर्जा नीति का उद्देश्य केवल आयातित तेल पर निर्भरता कम करना नहीं, बल्कि नागरिकों का विश्वास भी जीतना होना चाहिए। पारदर्शिता, वैज्ञानिक संवाद और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा के साथ लागू की गई नीति ही दीर्घकाल में सफल और टिकाऊ साबित होगी।