डिजिटल युग में पत्रकारिता का भविष्य आज़ादी से नहीं, जवाबदेही से सुरक्षित होगा।

Live ख़बर

– Santosh K Srivastav : Editor in Chief & Publisher

माइक, मोबाइल और पत्रकारिता : अब जवाबदेही का कानून जरूरी

पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है-यह वाक्य वर्षों से दोहराया जाता रहा है। किंतु आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि पत्रकारिता लोकतंत्र का स्तंभ है या नहीं, बल्कि यह है कि लोकतंत्र के इस स्तंभ की रक्षा कौन करेगा? जिस पेशे की पहचान सत्य, निष्पक्षता और जनहित से होनी चाहिए थी, वह डिजिटल युग में अभूतपूर्व अव्यवस्था, अराजकता और जवाबदेही के संकट से गुजर रहा है।

तकनीक ने सूचना के प्रवाह को लोकतांत्रिक बनाया है। यह परिवर्तन स्वागतयोग्य है। डिजिटल मीडिया ने उन आवाज़ों को मंच दिया जिन्हें परंपरागत मीडिया में स्थान नहीं मिल पाता था। दूरदराज़ के गांवों से लेकर महानगरों तक अनेक स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारों ने भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और सामाजिक विसंगतियों को उजागर कर लोकतंत्र को मजबूत किया है। इसलिए समस्या डिजिटल पत्रकारिता नहीं है; समस्या उसके नाम पर विकसित हो रही वह अनियंत्रित व्यवस्था है, जिसमें समाचार और सनसनी, पत्रकारिता और ब्लैकमेलिंग, जनहित और व्यक्तिगत स्वार्थ के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।

दिल्ली उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणी इसी संकट की गंभीरता को रेखांकित करती है। न्यायालय ने कहा कि आज हाथ में मोबाइल और सस्ता माइक्रोफोन लेकर कोई भी स्वयं को पत्रकार घोषित कर देता है, जबकि उसके पास न पत्रकारिता का प्रशिक्षण है, न पेशेवर नैतिकता और न ही किसी प्रकार की संस्थागत जवाबदेही। यह टिप्पणी किसी एक मामले तक सीमित नहीं है; यह उस सामाजिक यथार्थ का प्रतिबिंब है जिसे आम नागरिक, प्रशासन और स्वयं पत्रकारिता जगत प्रतिदिन अनुभव कर रहा है।

आज अनेक स्थानों पर समाचार संकलन के नाम पर भय का वातावरण बनाया जा रहा है। किसी सरकारी कार्यालय, अस्पताल, विद्यालय, व्यावसायिक प्रतिष्ठान अथवा स्थानीय निकाय में अचानक कैमरा और माइक्रोफोन लेकर पहुंच जाना, अधूरी जानकारी के आधार पर आरोपों से भरे वीडियो प्रसारित करना, भ्रामक शीर्षकों से सोशल मीडिया पर वायरल करना और कथित रूप से वीडियो हटाने या न चलाने के बदले आर्थिक लाभ की अपेक्षा करना—यदि ऐसी गतिविधियां घटित हो रही हैं, तो वे केवल मीडिया की समस्या नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता के लिए भी गंभीर चुनौती हैं।

इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव उन पत्रकारों पर पड़ रहा है जिन्होंने वर्षों के अध्ययन, प्रशिक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ अपनी पहचान बनाई है। जब बिना किसी मानक, प्रशिक्षण या उत्तरदायित्व के कोई भी व्यक्ति स्वयं को पत्रकार घोषित कर देता है, तब जनता के लिए वास्तविक पत्रकार और अवसरवादी तत्वों के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप संदेह की दृष्टि पूरे मीडिया समुदाय पर पड़ती है। किसी लोकतंत्र के लिए इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति क्या हो सकती है कि जनता का भरोसा समाचार माध्यमों से ही डगमगाने लगे।

विडंबना यह है कि भारत में चिकित्सा, विधि, लेखा, अभियांत्रिकी और अनेक अन्य पेशों के लिए न्यूनतम योग्यता, पंजीकरण और नियामक संस्थाएं अनिवार्य हैं, किंतु समाचार आधारित डिजिटल पत्रकारिता जैसा अत्यंत प्रभावशाली क्षेत्र आज भी लगभग बिना किसी समान राष्ट्रीय मानक के संचालित हो रहा है। यह स्थिति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विस्तार नहीं, बल्कि जवाबदेही के अभाव का परिणाम है।

यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, किंतु यह किसी को पत्रकार का वैधानिक दर्जा स्वतः प्रदान नहीं करता। प्रत्येक नागरिक अपनी बात कह सकता है, वीडियो बना सकता है, ब्लॉग लिख सकता है और सोशल मीडिया पर विचार व्यक्त कर सकता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति स्वयं को पत्रकार बताकर सार्वजनिक संस्थाओं से जवाब मांगता है, मीडिया की संस्थागत पहचान का उपयोग करता है और समाज में अपनी बात को विशेष विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत करता है, तब उससे उत्तरदायित्व और आचार संहिता का पालन अपेक्षित होना स्वाभाविक है। अधिकार और उत्तरदायित्व-दोनों लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं।

इसीलिए अब समय आ गया है कि भारत सरकार समाचार आधारित डिजिटल पत्रकारिता के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति तैयार करे। इस नीति का उद्देश्य मीडिया को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता की रक्षा करना होना चाहिए। इसके अंतर्गत समाचार प्रसारित करने वाले डिजिटल मंचों के लिए पंजीकरण, मान्यता प्राप्त स्व-नियामक संस्था (Self-Regulatory Body) से संबद्धता, आचार संहिता का अनिवार्य पालन, तथ्य-जांच की व्यवस्था, प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र और गंभीर उल्लंघनों पर स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान सुनिश्चित किए जाने चाहिए।

वेब जर्नलिस्ट्स स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (WJSA) जैसे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में पंजीकृत स्व-नियामक निकाय इस दिशा में महत्वपूर्ण आधार बन रहे हैं। इनके माध्यम से डिजिटल पत्रकारों के लिए आचार संहिता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को संस्थागत स्वरूप दिया जा सकता है। इसके साथ ही पत्रकारिता का औपचारिक प्रशिक्षण अथवा मान्यता प्राप्त प्रमाणन भी समाचार-आधारित डिजिटल रिपोर्टिंग के लिए न्यूनतम योग्यता के रूप में विचारणीय है। मीडिया कानून, मानहानि, निजता, संवैधानिक अधिकार, तथ्य सत्यापन और नैतिक पत्रकारिता का ज्ञान केवल अकादमिक विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में विश्वास बनाए रखने की अनिवार्य शर्त है।

निस्संदेह, किसी भी नियामक व्यवस्था का उपयोग स्वतंत्र और खोजी पत्रकारिता को दबाने के लिए नहीं होना चाहिए। यदि नियमन सत्ता के नियंत्रण का माध्यम बन गया तो उसका लोकतंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसलिए नीति निर्माण का मूल सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए-स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, किंतु जवाबदेही अनिवार्य हो। यही संतुलन लोकतंत्र की आत्मा है।

राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक कानून बनने में समय लग सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वर्तमान में प्रशासन निष्क्रिय बना रहे। यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग, जबरन वसूली, फर्जी समाचार, सामाजिक वैमनस्य फैलाने या अन्य दंडनीय गतिविधियों के प्रमाण उपलब्ध हों, तो राज्य सरकारों और जिला प्रशासन को प्रचलित कानूनों के अंतर्गत कठोर कार्रवाई करने में संकोच नहीं करना चाहिए। कानून का भय ईमानदार पत्रकारों के लिए नहीं, बल्कि पत्रकारिता की आड़ में अपराध करने वालों के लिए होना चाहिए।

भारत आज डिजिटल सूचना क्रांति के निर्णायक दौर में है। यह वही समय है जब पत्रकारिता का भविष्य तय होगा। यदि जवाबदेही का ढांचा विकसित नहीं किया गया, तो समाचार और अविश्वास साथ-साथ बढ़ेंगे; यदि संतुलित नियमन लागू किया गया, तो डिजिटल पत्रकारिता लोकतंत्र की सबसे सशक्त और विश्वसनीय संस्था बनकर उभरेगी।

अब निर्णय सरकार, संसद और नीति-निर्माताओं के हाथ में है। प्रश्न यह नहीं है कि डिजिटल पत्रकारिता का विस्तार होना चाहिए या नहीं; प्रश्न यह है कि उसका विस्तार विश्वसनीयता के साथ होगा या अराजकता के साथ। लोकतंत्र के हित में इसका उत्तर अब और अधिक देर तक टाला नहीं जा सकता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *