– Santosh Kr. Srivastav : Editor in Chief & Publisher
जनसंख्या, प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन के बीच संतुलन की चुनौती
भारत में परिसीमन का मुद्दा केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने का विषय नहीं है। यह देश के लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, संघीय ढांचे, राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी और भविष्य की सत्ता-संरचना से जुड़ा एक गंभीर संवैधानिक प्रश्न है। इसलिए परिसीमन की चर्चा होते ही राजनीतिक बहस तेज होना स्वाभाविक है। लेकिन असली सवाल यह है कि देश में परिसीमन क्यों जरूरी है और इस पर इतनी राजनीति क्यों हो रही है?
परिसीमन का मूल उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों का ऐसा पुनर्गठन करना है, जिससे बदलती जनसंख्या के अनुरूप राजनीतिक प्रतिनिधित्व में संतुलन कायम किया जा सके। समय के साथ जनसंख्या बढ़ती है, शहरों का विस्तार होता है, नए क्षेत्र विकसित होते हैं और कुछ इलाकों में आबादी का दबाव बढ़ता है। ऐसी स्थिति में यदि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं लंबे समय तक उसी रूप में बनी रहें, तो मतदाताओं और प्रतिनिधित्व के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है।
लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक के मत का महत्व लगभग समान होना चाहिए। यही परिसीमन की बुनियादी भावना है।
लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में परिसीमन केवल गणित का सवाल नहीं है। यहां जनसंख्या के साथ-साथ संघीय संतुलन और राज्यों के हित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
जनसंख्या बढ़ी तो प्रतिनिधित्व भी बढ़े?
एक सामान्य लोकतांत्रिक सिद्धांत यह कहता है कि जिस क्षेत्र की जनसंख्या अधिक है, वहां अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए। लेकिन भारत की परिस्थितियां कुछ अलग हैं।
देश के कई राज्यों ने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास की दिशा में प्रभावी कदम उठाए। वहीं कुछ राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत अधिक रही। अब यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्विन्यास मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर होता है, तो बेहतर जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों के सामने यह चिंता खड़ी होती है कि कहीं उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम न हो जाए।
यहीं परिसीमन का सबसे जटिल प्रश्न सामने आता है।
क्या जिस राज्य ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया, उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उसकी कीमत चुकानी चाहिए?
और दूसरी ओर-
क्या अधिक आबादी वाले राज्यों के नागरिकों को केवल इसलिए अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए कि उनके राज्य की जनसंख्या अधिक है?
दोनों सवाल लोकतांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और दोनों का संतुलित उत्तर तलाशना आवश्यक है।
परिसीमन पर राजनीति क्यों?
परिसीमन पर राजनीति इसलिए हो रही है क्योंकि संसद में सीटों की संख्या केवल आंकड़ा नहीं होती। सीटों की संख्या सीधे राष्ट्रीय राजनीति में राज्यों के प्रभाव से जुड़ी होती है।
यदि किसी राज्य की लोकसभा सीटें बढ़ती हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर उसका राजनीतिक वजन बढ़ सकता है। इसके विपरीत सीटों में अपेक्षाकृत कम वृद्धि या हिस्सेदारी में गिरावट उस राज्य के राजनीतिक प्रभाव को प्रभावित कर सकती है।
इसी कारण परिसीमन की बहस में उत्तर और दक्षिण, बड़े और छोटे राज्यों तथा जनसंख्या नियंत्रण और प्रतिनिधित्व जैसे सवाल सामने आते हैं।
लेकिन इस बहस को उत्तर बनाम दक्षिण के राजनीतिक संघर्ष में बदलना उचित नहीं होगा।
भारत की ताकत उसकी विविधता में है और भारतीय संघीय व्यवस्था का आधार राज्यों के बीच सहयोग और संवैधानिक विश्वास है। परिसीमन ऐसा विषय नहीं होना चाहिए, जो क्षेत्रीय असुरक्षा या राजनीतिक विभाजन को बढ़ाए।
जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों की चिंता भी जायज
परिसीमन की बहस में एक पक्ष यह भी है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए दशकों तक नीतियां लागू कीं, उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यदि किसी राज्य ने छोटे परिवार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तीकरण जैसी नीतियों के माध्यम से जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया, तो यह राष्ट्रीय विकास में उसका योगदान है।
ऐसे राज्यों को यह भरोसा होना चाहिए कि जनसंख्या नियंत्रण की सफलता उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए दंड का कारण नहीं बनेगी।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि अधिक आबादी वाले राज्यों के नागरिकों को समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रखा जाए।
इसलिए समाधान किसी एक पक्ष को विजेता बनाने में नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने में है जिसमें दोनों पक्षों के लोकतांत्रिक अधिकार और राष्ट्रीय हित सुरक्षित रहें।
क्या कुल सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है?
परिसीमन की बहस में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी होना चाहिए कि क्या बदलती जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए संसद की कुल सीटों की संख्या में वृद्धि की जा सकती है।
यदि समस्या यह है कि कुछ राज्यों की आबादी बढ़ी है और उनके वर्तमान प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा हुआ है, तो समाधान केवल मौजूदा सीटों को एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरित करने तक सीमित क्यों रहे?
क्या ऐसा मॉडल विकसित नहीं किया जा सकता, जिसमें बढ़ती आबादी को बेहतर प्रतिनिधित्व मिले और साथ ही जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी भी सुरक्षित रहे?
इन सवालों पर राजनीतिक नारों के बजाय गंभीर संवैधानिक और विशेषज्ञ विमर्श की आवश्यकता है।
परिसीमन को चुनावी हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए
सत्ता पक्ष और विपक्ष-दोनों की जिम्मेदारी है कि परिसीमन को राजनीतिक लाभ-हानि का मुद्दा बनाने से बचें।
सत्ता पक्ष को राज्यों की आशंकाओं को गंभीरता से सुनना चाहिए और विपक्ष को भी केवल विरोध के लिए विरोध करने के बजाय व्यावहारिक विकल्प सामने रखने चाहिए।
देश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि परिसीमन की आवश्यकता क्यों है, इसके संभावित प्रभाव क्या होंगे और राज्यों के हितों की रक्षा कैसे की जाएगी।
पारदर्शिता, संवैधानिकता और व्यापक राजनीतिक सहमति-परिसीमन की प्रक्रिया की तीन महत्वपूर्ण शर्तें होनी चाहिए।
परिसीमन पर राजनीति नहीं, राष्ट्रीय विमर्श हो
भारत में राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया हैं। लेकिन परिसीमन जैसे संवैधानिक विषय को ऐसी राजनीति से बचाया जाना चाहिए, जो समाज या राज्यों के बीच स्थायी विभाजन पैदा करे।
यह बहस किसी दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि इस प्रश्न पर होनी चाहिए कि भारत का लोकतंत्र आने वाले दशकों में अधिक न्यायपूर्ण और प्रभावी कैसे बने।
जनसंख्या का सम्मान हो, जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों का भी सम्मान हो। अधिक आबादी वाले नागरिकों को उचित प्रतिनिधित्व मिले और बेहतर जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों के हित भी सुरक्षित रहें।
यही वास्तविक संतुलन है।
मेरा मानना है की परिसीमन ऐसा हो, जिससे लोकतंत्र और मजबूत हो
परिसीमन यदि संवैधानिक रूप से आवश्यक है तो उसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसकी प्रक्रिया और परिणामों को लेकर व्यापक संवाद जरूर होना चाहिए।
परिसीमन का उद्देश्य केवल सीटों का पुनर्वितरण नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य होना चाहिए-हर नागरिक को प्रभावी प्रतिनिधित्व, हर राज्य को सम्मानजनक राजनीतिक हिस्सेदारी और पूरे देश को मजबूत संघीय लोकतंत्र देना।
भारत में लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है। यह विश्वास, प्रतिनिधित्व, समानता और संघीय साझेदारी का भी नाम है।
इसलिए परिसीमन पर अंतिम बहस का सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किस राज्य को कितनी सीट मिलेगी, या किस राजनीतिक दल को कितना फायदा होगा।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होना चाहिए-
“परिसीमन ऐसा कैसे हो, जिससे भारत का लोकतंत्र और मजबूत हो?”
इस प्रश्न का उत्तर किसी एक राजनीतिक दल, किसी एक क्षेत्र या किसी एक विचारधारा के पास नहीं है। इसका उत्तर संविधान, राज्यों के हित, नागरिकों के समान प्रतिनिधित्व और व्यापक राष्ट्रीय सहमति के बीच संतुलन से निकलेगा।
परिसीमन सत्ता के समीकरण बदलने का माध्यम नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र को आने वाली पीढ़ियों के लिए और अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, संतुलित और मजबूत बनाने का अवसर बने-यही इस पूरी प्रक्रिया की सबसे बड़ी सफलता होगी।

