JPSC परीक्षा प्रणाली पर बढ़ता अविश्वास: कब लौटेगा युवाओं का भरोसा?

Live ख़बर

– Santosh K Srivastav : Editor in Chief & Publisher

देश में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल नौकरी या प्रवेश का माध्यम नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों, उनके संघर्ष और परिवारों की उम्मीदों का आधार हैं। कोई छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है, कोई परिवार आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद कोचिंग और पढ़ाई का खर्च उठाता है, तो कोई नौकरी छोड़कर पूरी तरह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट जाता है। ऐसे में जब किसी परीक्षा पर पेपर लीक, अनियमितता या धांधली के आरोप लगते हैं, तो केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जाती है।

हाल के वर्षों में NEET, JPSC, JSSC, शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती और अन्य कई प्रतियोगी परीक्षाएं विवादों में रही हैं। कहीं प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप लगे, कहीं ओएमआर शीट में गड़बड़ी सामने आई, तो कहीं परीक्षा परिणामों को लेकर न्यायालयों का दरवाजा खटखटाना पड़ा। इन घटनाओं ने युवाओं के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या उनकी मेहनत वास्तव में सुरक्षित है?

केवल जांच नहीं, भरोसा भी जरूरी

झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच के तहत सीआईडी और रांची पुलिस द्वारा कई जिलों में की गई छापेमारी यह संकेत देती है कि जांच एजेंसियां पूरे नेटवर्क तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं। जांच जारी है और अंतिम निष्कर्ष संबंधित एजेंसियों तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएंगे। इसलिए किसी भी व्यक्ति या संस्था के संबंध में दोष तय होने से पहले निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

लेकिन इससे अलग एक बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर हर कुछ महीनों में किसी न किसी परीक्षा पर सवाल क्यों उठ जाते हैं? यदि बार-बार यही स्थिति बनती है, तो इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में ऐसी कमजोरियां हैं, जिन पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।

सबसे बड़ी कीमत ईमानदार अभ्यर्थी चुकाता है

जब कोई परीक्षा विवादों में आती है तो सबसे अधिक नुकसान उस छात्र का होता है जिसने पूरी ईमानदारी से तैयारी की होती है। परीक्षा रद्द होने पर उसे फिर से तैयारी करनी पड़ती है, मानसिक तनाव झेलना पड़ता है और कई बार आयु सीमा तथा रोजगार के अवसर भी प्रभावित होते हैं।

प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है। यदि मेहनती अभ्यर्थी का विश्वास टूटता है, तो पूरी व्यवस्था की साख प्रभावित होती है।

तकनीक समाधान है, लेकिन अकेला समाधान नहीं

आज भारत डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है। आधार, यूपीआई और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (Digital Public Infrastructure) ने यह साबित किया है कि बड़े पैमाने पर भी सुरक्षित और पारदर्शी डिजिटल व्यवस्था बनाई जा सकती है।

ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि वित्तीय लेन-देन सुरक्षित हो सकते हैं, तो प्रतियोगी परीक्षाएं क्यों नहीं?

उत्तर केवल तकनीक में नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन में छिपा है। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उसकी छपाई, सुरक्षित भंडारण, परिवहन, परीक्षा संचालन, मूल्यांकन और परिणाम जारी करने तक हर चरण में समान स्तर की सुरक्षा और जवाबदेही आवश्यक है।

Follow this link to JOIN our WhatsApp Community

जवाबदेही तय करना होगी

हर विवाद के बाद एफआईआर दर्ज होती है, गिरफ्तारियां होती हैं, जांच समितियां बनती हैं और सुधारों की घोषणा होती है। लेकिन यदि दोषियों को समयबद्ध सजा नहीं मिलती और संस्थागत सुधार लागू नहीं होते, तो वही समस्याएं दोबारा सामने आती हैं।

परीक्षा प्रणाली में सबसे बड़ी आवश्यकता जवाबदेही (Accountability) की है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या भ्रष्टाचार सामने आता है, तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों अथवा अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। इससे व्यवस्था में अनुशासन भी आएगा और युवाओं का विश्वास भी मजबूत होगा।

राष्ट्रीय स्तर पर एक समान सुरक्षा मानक जरूरी

देश में अलग-अलग आयोग और भर्ती एजेंसियां अपनी-अपनी प्रक्रिया के अनुसार परीक्षाएं आयोजित करती हैं। इससे सुरक्षा मानकों में भी अंतर दिखाई देता है।

अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए राष्ट्रीय न्यूनतम सुरक्षा मानक (National Minimum Security Standards) तैयार करें। इनमें डिजिटल सुरक्षा, साइबर ऑडिट, एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र, बायोमेट्रिक सत्यापन, लाइव मॉनिटरिंग, डेटा सुरक्षा और नियमित स्वतंत्र ऑडिट को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।

युवाओं को केवल आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए

आज का युवा केवल यह सुनना नहीं चाहता कि जांच चल रही है। वह यह विश्वास चाहता है कि उसकी अगली परीक्षा निष्पक्ष होगी और उसकी वर्षों की मेहनत किसी कथित गिरोह, तकनीकी कमजोरी या प्रशासनिक लापरवाही की भेंट नहीं चढ़ेगी।

यदि सरकारें, आयोग और जांच एजेंसियां पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करें, तो परीक्षा प्रणाली पर जनता का भरोसा फिर से मजबूत हो सकता है।

प्रतियोगी परीक्षाएं किसी भी राष्ट्र की प्रतिभा चयन प्रणाली की रीढ़ होती हैं। यदि यही व्यवस्था संदेह के घेरे में आ जाए, तो उसका प्रभाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि युवाओं के मनोबल और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी पड़ता है।

इसलिए आवश्यकता केवल नई तकनीक अपनाने की नहीं, बल्कि ऐसी मजबूत, पारदर्शी और जवाबदेह परीक्षा व्यवस्था विकसित करने की है, जिसमें प्रत्येक अभ्यर्थी को यह विश्वास हो कि उसकी सफलता केवल उसकी मेहनत और योग्यता से तय होगी। यही विश्वास किसी भी लोकतांत्रिक और विकसित राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी है।