धर्म समाज को जोड़ने और उन्नति की राह दिखाने वाला अनुशासन: डॉ. मोहन भागवत

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-एस०एन०चतुर्वेदी की रिपोर्ट

उज्जैन में ‘युवा धर्म संसद-2026’ का भव्य शुभारंभ, 25 राज्यों के 1600 युवा जुटे

उज्जैन, 19 सितंबर: धर्म व्यक्ति और समाज को जोड़ने, बिखरने से बचाने तथा निरंतर उन्नति की ओर ले जाने वाला अनुशासन है। धर्म को केवल वृद्धावस्था या अनुष्ठानों तक सीमित नहीं माना जा सकता, बल्कि इसका विचार युवावस्था से ही शुरू होना चाहिए। यह विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अवन्तिका (उज्जैन) के गीता भवन सभागार में व्यक्त किए। वे सेवाज्ञ संस्थानम् द्वारा आयोजित ‘युवा धर्म संसद’ के छठवें संस्करण के उद्घाटन सत्र को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।

डॉ. भागवत ने धर्म और ‘रिलीजन’ के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि धर्म संस्कृत के ‘धृ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ धारण करना है। धर्म पलायन का नाम नहीं, बल्कि भौतिक प्रगति, आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन है। उन्होंने कहा कि सत्य, करुणा, शुचिता और तप मानवीय धर्म के मूल आधार हैं। यातायात नियमों का पालन करना, कचरा न फैलाना और दूसरों को कष्ट न देना भी व्यावहारिक धर्म का हिस्सा है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे व्यक्तिगत सफलता को समाज की भलाई से जोड़ें।

सत्र में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने युवाओं को ‘इंडिया से भारत’ की ज्ञान चेतना से जुड़ने का संदेश दिया। वहीं, सेवाज्ञ संस्थानम् के संरक्षक आचार्य मिथिलेशनन्दिनी शरण महाराज ने आत्मनिर्माण और भारत-बोध पर बल दिया।

संस्थानम् के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशीष आशु की उपस्थिति में शुरू हुए इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय विमर्श में 25 राज्यों के 1600 युवा और 300 से अधिक शिक्षाविद्, शोधकर्ता व धर्माचार्य भाग ले रहे हैं। इसमें तकनीक, शिक्षा, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण जैसे समसामयिक विषयों पर मंथन हो रहा है।

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