बिहार में भ्रस्टाचार के लिये दोषी कौन? – हिसाब मांगती सरकारी रकम और खामोश जवाबदेही

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– कश्यप संजीव श्रीवास्तव की रिपोर्ट

₹92,132 करोड़ के उपयोगिता प्रमाण-पत्र लंबित होना केवल प्रशासनिक देरी नहीं, वित्तीय अनुशासन की गंभीर परीक्षा है

पटना | 27 अगस्त 2026 : सरकार जब जनता के पैसे से योजनाएं बनाती है, बजट जारी करती है और विभागों को राशि उपलब्ध कराती है, तो उस धन के उपयोग का हिसाब देना भी उसकी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। ऐसे में बिहार में ₹92,132.75 करोड़ से संबंधित 62,632 उपयोगिता प्रमाण-पत्रों का 31 मार्च 2025 तक लंबित रहना महज कागजी प्रक्रिया में देरी मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह आंकड़ा शासन की वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही के सामने एक गंभीर सवाल की तरह खड़ा है।

उपयोगिता प्रमाण-पत्र मूलतः यह प्रमाणित करता है कि सरकार से प्राप्त राशि का इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए किया गया, जिसके लिए वह जारी हुई थी। इसलिए जब हजारों प्रमाण-पत्र वर्षों तक लंबित रहते हैं, तो सवाल केवल यह नहीं होता कि प्रमाण-पत्र क्यों नहीं भेजा गया। बड़ा सवाल यह है कि सरकारी धन के उपयोग का सत्यापन आखिर किस स्तर पर और कब हुआ?

उपलब्ध आंकड़ों में सबसे चिंताजनक पहलू लंबित राशि का आकार है। 2019-20 से पहले के ही 3,505 उपयोगिता प्रमाण-पत्रों से जुड़ी राशि ₹21,515.36 करोड़ बताई गई है। यानी कुछ मामलों में देरी वर्षों पुरानी है। यह स्थिति बताती है कि समस्या किसी एक वित्तीय वर्ष या किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है।

पंचायती राज विभाग पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी

विभागवार उपलब्ध चार्ट इस तस्वीर को और गंभीर बनाता है। पंचायती राज विभाग से संबंधित लंबित राशि ₹32,383.08 करोड़ दिखाई गई है। इसके बाद शिक्षा विभाग की ₹19,097 करोड़ और नगर विकास एवं आवास विभाग की ₹17,876.32 करोड़ की राशि है।

पंचायती राज व्यवस्था सीधे गांवों और स्थानीय विकास से जुड़ी है। इसलिए इस विभाग में इतनी बड़ी राशि के उपयोगिता प्रमाण-पत्र लंबित होना विशेष चिंता का विषय है। गांव की सड़क, नाली, पेयजल, भवन या अन्य विकास योजनाओं पर खर्च होने वाली राशि का हिसाब समय पर उपलब्ध होना चाहिए। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके क्षेत्र के विकास के नाम पर जारी धन कहां और किस काम में खर्च हुआ।

हालांकि, यहां एक सावधानी भी जरूरी है। प्रस्तुत चार्ट में केवल पांच विभागों की राशि दिखाई गई है और इनकी कुल राशि ₹78,811.86 करोड़ बनती है। इसलिए इसे कुल ₹92,132.75 करोड़ की विभागवार पूरी सूची मानना उचित नहीं होगा। आंकड़ों की व्याख्या में यह अंतर बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि वित्तीय जवाबदेही की पहली शर्त ही तथ्यात्मक शुद्धता है।

CAG की रिपोर्ट के बाद अगला कदम क्या?

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG का काम सरकारी आय-व्यय की जांच कर संवैधानिक संस्थाओं के सामने रिपोर्ट रखना है। इसके बाद विधानसभा की लोक लेखा समिति की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। समिति संबंधित विभागों से जवाब मांग सकती है, अनियमितताओं की जांच कर सकती है और आवश्यक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकती है।

बिहार विधानसभा की लोक लेखा समिति का कार्यकाल 31 मार्च 2027 तक है। ऐसे में उसके सामने यह एक महत्वपूर्ण अवसर है कि लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्रों के मामले को केवल आंकड़ों की समीक्षा तक सीमित न रखा जाए, बल्कि यह भी पूछा जाए कि देरी किन स्तरों पर हुई, किस विभाग ने कितनी राशि का हिसाब नहीं दिया और इसके लिए जवाबदेही किसकी बनती है।

विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण

वित्तीय अनियमितता या सरकारी धन के उपयोग से जुड़े मामलों में विपक्ष की भूमिका केवल राजनीतिक बयान देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विधानसभा में विपक्ष जनता की ओर से सरकार से सवाल पूछने वाली महत्वपूर्ण संस्था है।

यदि सरकारी राशि के उपयोग से संबंधित इतने बड़े आंकड़े सामने आते हैं, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर सार्वजनिक धन के सवाल के रूप में देखें।

विपक्ष को सवाल पूछना चाहिए, लेकिन सवालों का आधार दस्तावेज और तथ्य होने चाहिए। उसी तरह सरकार को भी आलोचना को राजनीतिक हमला मानने के बजाय लंबित मामलों के समयबद्ध निस्तारण की ठोस कार्ययोजना सामने रखनी चाहिए।

जनता का पैसा है, हिसाब भी जनता को चाहिए

लोकतंत्र में बजट केवल सरकार का दस्तावेज नहीं होता। उसमें लगा पैसा जनता का पैसा होता है। करदाताओं से प्राप्त राशि जब किसी योजना के लिए खर्च की जाती है, तो उसका हिसाब भी सार्वजनिक जवाबदेही का हिस्सा बनता है।

₹92,132.75 करोड़ कोई छोटी रकम नहीं है। इतने बड़े वित्तीय आंकड़े के सामने सबसे जरूरी सवाल यह है कि लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्रों के निपटारे की समयसीमा क्या है? क्या प्रत्येक विभाग के लिए लक्ष्य निर्धारित किया गया है? क्या पुराने मामलों को प्राथमिकता देकर उनका सत्यापन कराया जाएगा? और जहां लापरवाही सामने आएगी, क्या जिम्मेदार अधिकारियों या संस्थाओं की जवाबदेही तय होगी?

इन सवालों के जवाब केवल सरकारी फाइलों में नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श में भी आने चाहिए।

सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि उपयोगिता प्रमाण-पत्रों की लंबित फाइलें केवल कागज का बोझ हैं या उनके पीछे सरकारी धन के उपयोग और निगरानी की कोई बड़ी कहानी छिपी है।