– संतोष श्रीवास्तव की रिपोर्ट
महिला विश्वविद्यालय की तर्ज पर दलित विश्वविद्यालय की मांग-क्या इससे सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को उनका अधिकार मिल सकेगा?
बिहार में ‘समृद्ध महिला – समृद्ध बिहार’ की तर्ज पर महिला विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा ने शिक्षा और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है। प्रस्तावित व्यवस्था में कुलपति से लेकर शिक्षण कार्य तक महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की बात कही गई है।
ऐसे में एक सवाल उठना स्वाभाविक है-यदि किसी विशेष वर्ग के सशक्तीकरण के लिए अलग विश्वविद्यालय की परिकल्पना की जा सकती है, तो ‘समृद्ध दलित – समृद्ध भारत’ की तर्ज पर दलित विश्वविद्यालय क्यों नहीं?
ऐसा विश्वविद्यालय हो, जहां कुलपति से लेकर शिक्षक तक सभी दलित हों और केवल दलित विद्यार्थी ही शिक्षा प्राप्त करें। कक्षा 1 से लेकर स्नातकोत्तर, पीएचडी, मेडिकल और इंजीनियरिंग तक की पढ़ाई की व्यवस्था हो। इससे उस वर्ग के विद्यार्थियों को अपनी अलग शैक्षणिक व्यवस्था और अवसर मिल सकेंगे।
लेकिन इसी के साथ सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के अधिकार का प्रश्न भी उतनी ही मजबूती से उठना चाहिए। यदि कोई सामान्य वर्ग का विद्यार्थी अधिक अंक प्राप्त करता है, बेहतर प्रदर्शन करता है और योग्यता के आधार पर किसी संस्थान में प्रवेश की अपेक्षा रखता है, तो केवल आरक्षण व्यवस्था के कारण उसे अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
समान अवसर का अर्थ यह भी है कि योग्यता के आधार पर प्राप्त अधिकार सुरक्षित रहें।
यदि अलग-अलग सामाजिक वर्गों के लिए अलग शैक्षणिक संस्थानों की व्यवस्था सामाजिक न्याय का माध्यम बन सकती है, तो सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के लिए भी ऐसी व्यवस्था पर विचार होना चाहिए, जहां उन्हें आरक्षण की प्रतिस्पर्धा से अलग अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिले।
अन्य विश्वविद्यालयों में आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि अधिक अंक और बेहतर प्रदर्शन के बावजूद उनके लिए अवसर सीमित हैं।
सामाजिक न्याय का उद्देश्य किसी एक वर्ग को आगे बढ़ाना भर नहीं, बल्कि हर वर्ग को उसका उचित अधिकार दिलाना होना चाहिए।
यही समय है कि शिक्षा व्यवस्था में अवसर, अधिकार और योग्यता – तीनों को साथ रखकर ऐसी व्यवस्था पर विचार किया जाए, जिसमें किसी भी विद्यार्थी को अपनी सामाजिक पहचान के कारण अवसर मिलने या छिनने का अनुभव न हो।
सवाल केवल विश्वविद्यालय बनाने का नहीं है; सवाल यह है कि शिक्षा के क्षेत्र में अधिकार और अवसर का संतुलन कब स्थापित होगा?

