– कश्यप संजीव श्रीवास्तव
सत्ता की तनातनी से आगे बढ़कर अब शासन की जवाबदेही पर बहस जरूरी
लोकतंत्र में सरकारों का बदलना कोई असामान्य घटना नहीं है। चुनाव होंगे, जनादेश आएगा, सत्ता पक्ष बदलेगा और विपक्ष सत्ता में आएगा। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन असली सवाल सत्ता परिवर्तन का नहीं, व्यवस्था परिवर्तन का है। सवाल यह है कि सरकार बदलने के बाद क्या आम नागरिक की जिंदगी सचमुच बदलती है? क्या उसे सरकारी कार्यालयों के चक्कर कम लगाने पड़ते हैं? क्या समय पर सेवाएं मिलती हैं? क्या शिकायतों का समाधान होता है? और यदि कोई अधिकारी या तंत्र अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहता है, तो क्या उसकी जवाबदेही तय होती है?
आम नागरिक की सबसे बड़ी समस्या अक्सर राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी होती है। जन्म प्रमाणपत्र से लेकर जमीन के कागज तक, बिजली-पानी से लेकर स्वास्थ्य और शिक्षा तक, पेंशन से लेकर सरकारी योजनाओं के लाभ तक-नागरिक का सामना अंततः शासन-तंत्र से ही होता है। उसे यह जानने में शायद ही कोई रुचि हो कि फाइल किस राजनीतिक खेमे की है; उसकी चिंता यह होती है कि उसका काम कब और कैसे होगा।
दुर्भाग्य यह है कि सार्वजनिक बहस कई बार शासन की गुणवत्ता से हटकर राजनीतिक टकराव में बदल जाती है। जनता भावनात्मक मुद्दों में उलझती है और प्रशासनिक जवाबदेही का मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है। सत्ता बदलने की चर्चा होती है, लेकिन यह चर्चा कम होती है कि सत्ता में आने वाली हर सरकार को नागरिकों के प्रति जवाबदेह कैसे बनाया जाए।
यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है-क्या केवल मंत्री की जवाबदेही पर्याप्त है?
मंत्री सरकार की नीतिगत दिशा और राजनीतिक नेतृत्व के लिए जिम्मेदार होते हैं। वहीं उन नीतियों और निर्णयों को जमीन पर लागू करने की जिम्मेदारी प्रशासनिक तंत्र की होती है। इसलिए किसी योजना की विफलता, सरकारी सेवा में अनावश्यक विलंब अथवा नियमों की अनदेखी होने पर जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला स्पष्ट होनी चाहिए। जहां किसी अधिकारी की भूमिका, लापरवाही या कर्तव्य में चूक प्रमाणित हो, वहां केवल राजनीतिक बयानबाजी से काम नहीं चल सकता। जिम्मेदारी जिस स्तर पर तय होती है, जवाबदेही भी उसी स्तर पर होनी चाहिए।
बिहार में इस दिशा में कानूनी व्यवस्था मौजूद है। बिहार लोक सेवाओं का अधिकार अधिनियम, 2011 सरकारी सेवाओं को निर्धारित प्रक्रिया और समय-सीमा में उपलब्ध कराने का ढांचा देता है। वहीं बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 के तहत नागरिकों को शिकायत की सुनवाई, निवारण का अवसर और निर्णय की जानकारी प्राप्त करने का कानूनी अधिकार दिया गया है। राज्य सरकार के अनुसार इस व्यवस्था के तहत शिकायतों की सुनवाई और निवारण के लिए अधिकतम 60 कार्य दिवस की समय-सीमा निर्धारित है तथा अपील की व्यवस्था भी उपलब्ध है।
फिर भी कानून होना और उसका प्रभावी क्रियान्वयन-दो अलग बातें हैं।
आज जरूरत किसी एक दल या सरकार को कठघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था पर गंभीर बहस की है जिसमें जवाबदेही व्यक्ति और पद दोनों से जुड़ी हो। यदि किसी निर्णय में नियमों की अनदेखी हुई है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि निर्णय किसने लिया, उसे लागू करने की जिम्मेदारी किसकी थी, निगरानी किस स्तर पर होनी थी और चूक होने पर किस अधिकारी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई।
इसी संदर्भ में एक व्यापक ‘Accountability Bill’ यानी जवाबदेही कानून की मांग पर विचार किया जा सकता है। ऐसा कानून किसी मंत्री, अधिकारी या राजनीतिक दल को निशाना बनाने का माध्यम नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें सत्ता किसी भी दल की हो, प्रशासनिक जवाबदेही के मानक न बदलें।
ऐसे कानून में कई महत्वपूर्ण प्रावधानों पर विचार हो सकता है-सरकारी सेवाओं के लिए स्पष्ट समय-सीमा, प्रत्येक निर्णय के लिए उत्तरदायी अधिकारी की पहचान, निर्धारित मानकों के उल्लंघन पर कारण बताओ प्रक्रिया, प्रमाणित लापरवाही पर दंड, शिकायतों की स्वतंत्र समीक्षा, अपील का अधिकार और समयबद्ध कार्रवाई की सार्वजनिक निगरानी। साथ ही ईमानदार अधिकारियों को दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से सुरक्षा और किसी भी कार्रवाई से पहले निष्पक्ष जांच तथा प्राकृतिक न्याय सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।
क्योंकि जवाबदेही का अर्थ डर पैदा करना नहीं, जिम्मेदारी सुनिश्चित करना है।
यदि कोई अधिकारी सही निर्णय लेने के बावजूद केवल शिकायत के डर से निर्णय लेने से बचने लगे, तो व्यवस्था और अधिक जटिल हो सकती है। इसलिए जवाबदेही कानून ऐसा होना चाहिए जो लापरवाही और भ्रष्टाचार पर कठोर हो, लेकिन ईमानदार प्रशासनिक निर्णय को सुरक्षा भी दे।
लोकतंत्र में आंदोलन की अपनी भूमिका है। आंदोलन सरकारों का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं, जनमत बना सकते हैं और परिवर्तन की मांग को मजबूत कर सकते हैं। लेकिन स्थायी परिवर्तन केवल नारों से नहीं आता। उसके लिए कानून, संस्थाएं, पारदर्शी प्रक्रिया और निरंतर निगरानी की आवश्यकता होती है।
इसलिए आज आवश्यकता केवल ‘सरकार बदलने’ की राजनीति से आगे बढ़कर ‘व्यवस्था सुधारने’ की राजनीति पर बहस करने की है।
जनता को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी अधिकारी से अपना वैधानिक काम कराने के लिए किसी नेता की सिफारिश की आवश्यकता न पड़े। उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें शिकायत दर्ज कराने के बाद उसका परिणाम जानने का अधिकार हो। उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें गलती होने पर जिम्मेदारी किसी दूसरे स्तर पर धकेल देने की गुंजाइश कम हो।
अंततः सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अगली सरकार किसकी होगी। लोकतंत्र का अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगली सरकार चाहे किसी की भी हो, वह जनता के प्रति कितनी जवाबदेह होगी।
पार्टियां बदलती रहेंगी, चेहरे बदलते रहेंगे, सरकारें आती-जाती रहेंगी। लेकिन यदि प्रशासनिक जवाबदेही की व्यवस्था मजबूत नहीं हुई, तो आम नागरिक की समस्याएं अपना चेहरा बदलकर फिर सामने आती रहेंगी।
इसलिए अब केवल आंदोलन नहीं-संस्थागत परिवर्तन चाहिए। केवल सत्ता परिवर्तन नहीं-व्यवस्था में जवाबदेही चाहिए। और इसी बहस को एक व्यापक, निष्पक्ष और नागरिक-केंद्रित ‘Accountability Bill’ की दिशा में आगे बढ़ाना समय की महत्वपूर्ण जरूरत हो सकती है।

