– आचार्य संतोष
भारतीय सनातन संस्कृति में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। वर्ष भर आने वाली चौबीस एकादशियों में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी, जिसे हरिशयनी, पद्मा अथवा आषाढ़ी एकादशी भी कहा जाता है, अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसके साथ ही चार माह तक चलने वाले चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जो तप, जप, व्रत, दान, साधना और आत्मसंयम का काल माना गया है।
सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु का यह शयन सांसारिक गतिविधियों से विराम का प्रतीक नहीं, बल्कि सृष्टि के सूक्ष्म संचालन और आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय का प्रतीक है। इसी कारण इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः स्थगित रखे जाते हैं, जबकि धार्मिक अनुष्ठानों, कथा-श्रवण, सत्संग, तीर्थ, दान तथा भक्ति को विशेष महत्व दिया जाता है।
शास्त्रों में देवशयनी एकादशी का महत्व
पद्म पुराण और स्कन्द पुराण में देवशयनी एकादशी का विस्तृत महात्म्य वर्णित है। इन ग्रंथों के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने, भगवान विष्णु का पूजन करने और रात्रि जागरण करने से मनुष्य को अनेक यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है तथा पापों का क्षय होता है।
भगवान विष्णु के शयन काल का प्रार्थना श्लोक:
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्।
बुद्धे च बुद्धयेदेतद् जगत्सर्वं चराचरम्॥
भावार्थ: हे जगन्नाथ! आपके सो जाने पर यह संपूर्ण जगत् सो जाता है और आपके जागने पर ही संपूर्ण चराचर जगत् जाग्रत हो जाता है।
शयनागमन के समय भगवान को समर्पित किया जाने वाला मंत्र:
सुप्तायां त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्।
बुद्धे च बुद्धयेत् सर्वं जगत् स्थावरजङ्गमम्॥
उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ गोविंद त्यज निद्रां जगत्पते।
पद्म पुराण में कहा गया है-
एकादशीव्रतं नाम सर्वपापप्रणाशनम्।
सर्वकामप्रदं पुण्यं विष्णुलोकप्रदायकम्॥
भावार्थ: एकादशी का व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला, सभी शुभ इच्छाओं को पूर्ण करने वाला तथा भगवान विष्णु के परम धाम की प्राप्ति कराने वाला माना गया है।
स्कन्द पुराण में भी उल्लेख मिलता है-
एकादश्यां निराहारो यो भजेत् केशवं हरिम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥
भावार्थ: जो भक्त एकादशी के दिन उपवास रखकर भगवान केशव की आराधना करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त करता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में भी अनन्य भक्ति का महत्व बताते हुए कहा है-
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (गीता 9.22)
भावार्थ: जो भक्त अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके योग-क्षेम का भार स्वयं भगवान वहन करते हैं।
इसी प्रकार विष्णु सहस्रनाम में भगवान विष्णु का ध्यान इस प्रकार किया गया है—
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
यह श्लोक भगवान विष्णु के शेषशायी स्वरूप का ध्यान कराने वाला अत्यंत लोकप्रिय स्तोत्र है।
व्रत एवं पूजा-विधि
देवशयनी एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। पूजा स्थल को शुद्ध कर भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। भगवान को पीले पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप, नैवेद्य तथा पंचामृत अर्पित कर विधिपूर्वक पूजा की जाती है।
पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप, विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता अथवा विष्णु पुराण का पाठ अत्यंत शुभ माना गया है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखते हैं और रात्रि में भजन-कीर्तन तथा भगवान के नाम का स्मरण करते हैं। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक पारण कर व्रत का समापन किया जाता है।
चातुर्मास का आध्यात्मिक संदेश
देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होने वाला चातुर्मास केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मअनुशासन और आध्यात्मिक जागरण का अवसर भी है। वर्षा ऋतु के इन चार महीनों में संत-महात्मा एक स्थान पर निवास कर साधना करते हैं और श्रद्धालु भी सात्विक जीवन, संयमित आहार, दान-पुण्य तथा ईश्वर-चिंतन के माध्यम से आत्मिक उन्नति का प्रयास करते हैं। यह काल मन, वाणी और कर्म की शुद्धि का संदेश देता है।
व्रत के धार्मिक एवं आध्यात्मिक लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत मानसिक शांति, पारिवारिक सुख, आर्थिक समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम माना जाता है। श्रद्धापूर्वक किए गए जप, तप, दान और भक्ति से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है तथा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
देवशयनी एकादशी 2026 का शुभ मुहूर्त
- तिथि: आषाढ़ शुक्ल एकादशी (एकादशी तिथि का प्रारंभ 24 जुलाई को पूर्वाह्न 9:14 बजे से 25 जुलाई को पूर्वाह्न 11:36 बजे तक।
- ग्रेगोरियन तिथि: 25 जुलाई 2026 (शनिवार)
- पारण: 25 जुलाई को द्वादशी तिथि (अपराह्न 2:00 बजे तक) प्रातःकाल में ।
देवशयनी एकादशी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि जीवन में संयम, श्रद्धा, सेवा और आध्यात्मिक साधना को अपनाने का संदेश देने वाला महान अवसर है। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में प्रवेश के साथ प्रारंभ होने वाला चातुर्मास मनुष्य को बाहरी भौतिक आकर्षणों से हटकर आत्मचिंतन, धर्म और सदाचार की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। यही इस पावन पर्व का वास्तविक संदेश और सनातन संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।
भगवान श्री हरि विष्णु आप सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें!

