जीवितपुत्रिका व्रत (जिउतिया): संतान की दीर्घायु और रक्षा का 36 घंटे का अखंड निर्जला तप

Live ख़बर

–आचार्य संतोष (वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक)

सनातन धर्म में माताओं द्वारा संतानों के कल्याण, आरोग्य और दीर्घायु के लिए रखे जाने वाले सभी व्रतों में जीवितपुत्रिका व्रत (जिउतिया) को सबसे कठिन और निष्ठावान माना गया है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत मातृ-स्नेह, तपस्या और आत्मसंयम की पराकाष्ठा है।

1. महात्म्य एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

भविष्य पुराण और महाभारत के अनुसार, इस व्रत का संबंध द्वापर युग से है। महाभारत युद्ध के उपरांत अश्वत्थामा ने पांडवों के कुल का समूल नाश करने के लिए उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु पर अचूक ब्रह्मास्त्र चला दिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समस्त पुण्यों और योगमाया के प्रभाव से उत्तरा के मृतप्राय गर्भ को पुनः जीवनदान दिया। वही बालक आगे चलकर महाराज परीक्षित के रूप में विख्यात हुआ।

इसके साथ ही, गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन के परोपकार और त्याग की स्मृति में यह व्रत समर्पित है। जीमूतवाहन ने नागराज शंखचूड़ की रक्षा के लिए पक्षीराज गरुड़ के समक्ष स्वयं को अर्पित कर दिया था। इस व्रत में भगवान जीमूतवाहन के साथ-साथ प्रतीकात्मक रूप से चील्ह और सियारिन की पूजा की जाती है।

2. वेद एवं पुराणों के श्लोक व मंत्र

पूजा के समय माताओं द्वारा संतान की रक्षा और जीमूतवाहन की आराधना हेतु निम्नलिखित श्लोकों का पाठ किया जाता है:

  • भगवान जीमूतवाहन का ध्यान मंत्र:जीमूतवाहनं शान्तं त्रिनेत्रं द्विभुजं वरम्।वरदाभयहस्तं च शंखचक्रधरं विभुम्॥(शांत स्वरूप, त्रिनेत्रधारी, दोनों हाथों में वर और अभय मुद्रा धारण करने वाले कल्याणकारी जीमूतवाहन को नमन है।)
  • संतान सुरक्षा एवं दीर्घायु प्रार्थना:ॐ नमो जीमूतवाहनाय नमः।दीर्घायुष्यं प्रदेहि मे पुत्रस्य वरदो भव॥
  • चील्ह-सियारिन प्रतीकात्मक अर्घ्य मंत्र:जिनपुत्र्यै नमस्तुभ्यं श्येन्यै च शृगालिके।मम पुत्रस्य रक्षणं कुरुताम् सर्वदा मुदा॥

3. ज्योतिषीय महत्व

  • पितृपक्ष (महालय) का पुण्य प्रभाव: यह व्रत पितृपक्ष के दौरान पड़ता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और दान-पुण्य करने से कुल के पितरों का भी विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे वंश वृद्धि में आने वाली सभी बाधाएं व पितृदोष शांत होते हैं।
  • संतान भाव की शुद्धि: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जातक की कुंडली में पंचम भाव (संतान भाव) और देवगुरु बृहस्पति (संतान कारक) की पीड़ा या अनिष्ट ग्रहों का प्रभाव इस कठिन तपस्या और उपवास से दूर होता है।

4. तिथि एवं शुभ मुहूर्त

  • नहाय-खाय (सप्तमी): 02 अक्टूबर 2026, शुक्रवार (इस दिन भोर में ‘ओठगन’ या सरगही की परंपरा निभाई जाती है)
  • अष्टमी व्रत तिथि: 03 अक्टूबर 2026, शनिवार (अहोरात्र निर्जला उपवास)
  • पारण (नवमी): 04 अक्टूबर 2026, रविवार (प्रातः सूर्योदय के बाद अष्टमी समाप्त होने पर)

पूजन के शुभ मुहूर्त (03 अक्टूबर 2026):

  • प्रातः काल चर-लाभ-अमृत चौघड़िया: 07:30 AM से 10:30 AM
  • अभिजित मुहूर्त: 11:45 AM से 12:32 PM
  • गोधूलि / प्रदोष काल (विशेष पूजन समय): 05:45 PM से 07:05 PM

5. पारंपरिक पूजन विधि एवं नियम

  1. नहाय-खाय व ओठगन (सप्तमी): व्रत के एक दिन पूर्व सात्विक भोजन लिया जाता है। अष्टमी की भोर में (सूर्योदय से पूर्व) महिलाएं ‘ओठगन’ करती हैं, जिसमें मडुआ (रागी) की रोटी, नोनी का साग, तोरी (नेनुआ) आदि ग्रहण किया जाता है।
  2. निर्जला संकल्प (अष्टमी): सूर्योदय के साथ 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होता है।
  3. प्रतीक निर्माण: गाय के गोबर, चिकनी मिट्टी या बालू से भगवान जीमूतवाहन तथा चील्ह (चील) और सियारिन (लोमड़ी) की मूर्तियां बनाई जाती हैं।
  4. पूजन सामग्री: कुशा की प्रतिमा, सरसों की खली, तेल, दूब, अक्षत, सिंदूर, फूल, लाल-पीला रक्षासूत्र (जिउतिया धागा), और पांच प्रकार के फल चढ़ाए जाते हैं।
  5. कथा श्रवण व जिउतिया धारण: दोपहर या संध्या के समय बांस के पत्तों, कलश और दीपक के समक्ष बैठकर पारंपरिक कथाएं सुनी जाती हैं। इसके बाद माताएं लाल-पीला रेशमी धागा (जिउतिया) गले में धारण करती हैं।
  6. पारण (नवमी): नवमी तिथि में सूर्य देव को अर्घ्य देकर, नोनी का साग, मडुआ की रोटी और चना ग्रहण कर व्रत खोला जाता है।

6. पारंपरिक पौराणिक कथाएं

(क) राजा जीमूतवाहन का आत्मत्याग

गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन बड़े दयालु और परोपकारी थे। उन्होंने अपना राजपाट भाइयों को सौंपकर वन में वृद्ध माता-पिता की सेवा का मार्ग चुना।

वन में एक दिन उन्हें एक वृद्धा के विलाप करने की आवाज सुनाई दी। पूछने पर नागमाता ने बताया कि पक्षीराज गरुड़ के साथ हुए समझौते के तहत प्रतिदिन एक नाग वध्यशिला पर गरुड़ के आहार हेतु जाता है, और आज उनके इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी है।

वृद्धा का विलाप सुनकर जीमूतवाहन ने स्वयं को शंखचूड़ के स्थान पर लाल वस्त्र ओढ़कर वध्यशिला पर प्रस्तुत कर दिया। जब गरुड़ उन्हें नोंचने लगे, तब जीमूतवाहन के मुख पर पीड़ा के स्थान पर असीम शांति व परोपकार का संतोष देखकर गरुड़ स्तब्ध रह गए। गरुड़ के पूछने पर जीमूतवाहन ने सारा सत्य बताया। उनके इस महान आत्मोत्सर्ग से द्रवित होकर गरुड़ ने न केवल उनके प्राण बख्शे, बल्कि नागों को भी सदैव के लिए अभयदान दे दिया। तभी से जीमूतवाहन संतान रक्षा के देवता के रूप में पूजे जाते हैं।

(ख) चील्ह और सियारिन की लोककथा

नर्मदा नदी के तट पर एक विशाल पाकर (पाकड़) के पेड़ पर एक चील्ह (चील) और नीचे खोह में एक सियारिन (लोमड़ी) रहती थीं। दोनों में घनिष्ठ मित्रता थी। एक बार आश्विन कृष्ण अष्टमी को गांव की महिलाओं को जिउतिया की पूजा करते देख दोनों ने भी संतान कल्याण हेतु निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया।

चील्ह ने भूख-प्यास सहकर पूरी निष्ठा से निर्जला व्रत पूरा किया। किंतु सियारिन का संयम आधी रात को टूट गया; पास के श्मशान से जलते शव की गंध पाकर उसने मांस और हड्डियां खाकर व्रत भंग कर दिया।

अगले जन्म में दोनों सगी बहनों के रूप में जन्मीं:

  • चील्ह का जन्म राजा मलयकेतु की पटरानी शीलावती के रूप में हुआ, जिसे व्रत की निष्ठा के फलस्वरूप सात तेजस्वी और दीर्घायु पुत्र प्राप्त हुए।
  • सियारिन का जन्म राजा के मंत्री की पत्नी कपुरावती के रूप में हुआ, जिसका व्रत भंग दोष के कारण कोई भी पुत्र जीवित नहीं बचता था।

ईर्ष्यावश कपुरावती ने शीलावती के सातों पुत्रों के सिर कटवाकर भिजवाए, परंतु भगवान जीमूतवाहन की कृपा से वे बालक पुनः जीवित हो गए। अंततः शीलावती ने कपुरावती को पूर्वजन्म के जिउतिया व्रत की निष्ठा और नियम-भंग के कर्मफल का स्मरण कराया, जिससे कपुरावती को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ।

यह व्रत स्पष्ट संदेश देता है कि पूजा में मन, वचन और कर्म की पवित्रता और कठोर संयम ही संतान की सुरक्षा का अचूक कवच बनते हैं। इसी श्रद्धा के साथ आज भी माताएं चील्ह-सियारिन के मस्तक पर सिंदूर और खली-तेल अर्पित कर यह कथा दोहराती हैं

कुंडली विश्लेष्ण और समाधान के लिए आज ही संपर्क करें :

संतोषाचार्य जी
ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य
https://wa.me/c/919934324365

See on Google

Reviews : https://g.page/r/CahjHRndp1TjEAE/reviewhttps://share.google/rcndENQZwdAj5IjmF

Verified by MonsterInsights