– आचार्य संतोष, ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य
सनातन धर्म में चतुर्थी तिथि का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व है। भगवान गणेश को समर्पित संकष्टी चतुर्थी तथा सुहाग, दांपत्य प्रेम और पति की दीर्घायु की कामना से जुड़ा करवा चौथ भारतीय संस्कृति के दो महत्त्वपूर्ण पर्व हैं। दोनों पर्वों में चंद्रमा के दर्शन, व्रत, पूजा, संकल्प और ईश्वर के प्रति श्रद्धा का विशेष स्थान है। करवा चौथ कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है, जबकि संकष्टी चतुर्थी प्रत्येक चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आती है। इसलिए जब कार्तिक कृष्ण चतुर्थी पर करवा चौथ का पर्व पड़ता है, तब यह तिथि गणेश आराधना और दांपत्य मंगल-दोनों दृष्टियों से विशेष महत्त्व रखती है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि संकष्टी चतुर्थी और करवा चौथ की पूजा-पद्धतियों में कुछ समानताएँ अवश्य हैं, लेकिन दोनों की अपनी अलग धार्मिक परंपराएँ, व्रत-कथाएँ और उपासना-विधियाँ भी हैं।
1. संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महात्म्य
‘संकष्टी’ शब्द का अर्थ है-संकटों से मुक्ति या विपत्तियों का निवारण। भगवान श्रीगणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धिदाता और मंगलकर्ता माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान गणेश की पूजा करते हैं तथा रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में व्रत खोलने की विधि स्थानीय परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकती है।
गणेशजी की उपासना का मूल भाव केवल बाहरी बाधाओं को दूर करना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर स्थित अज्ञान, अहंकार, आलस्य और अविवेक को दूर करना भी है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत साधक को आत्मसंयम, धैर्य, विवेक और सकारात्मक चिंतन की प्रेरणा देता है।
विशेष रूप से अंगारकी संकष्टी चतुर्थी, अर्थात् मंगलवार को पड़ने वाली संकष्टी, अनेक गणेश भक्तों के लिए अत्यंत पुण्यकारी मानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक गणेश आराधना करने से जीवन के कार्यों में आने वाली बाधाओं का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है।

2. करवा चौथ का महात्म्य और दांपत्य जीवन में महत्व
करवा चौथ उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रचलित पर्व है। इस दिन विवाहित महिलाएँ अपने पति की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, दीर्घायु तथा दांपत्य जीवन की मंगलकामना के लिए व्रत रखती हैं। कई स्थानों पर अविवाहित युवतियाँ भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं।
‘करवा’ मिट्टी के उस पात्र को कहा जाता है, जिसका उपयोग परंपरागत रूप से जल अर्पित करने में किया जाता है, जबकि ‘चौथ’ चतुर्थी तिथि का संकेत है। इस पर्व में माता पार्वती, भगवान शिव, श्रीगणेश और कार्तिकेय की पूजा की परंपरा विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित है। व्रत-कथा सुनना, करवा बदलना, सुहाग की सामग्री अर्पित करना और रात्रि में चंद्रदर्शन करना इसके प्रमुख अंग हैं।
करवा चौथ का व्यापक सामाजिक संदेश पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, समर्पण, सहयोग और परस्पर सम्मान को सुदृढ़ करना है। आधुनिक जीवन में इस पर्व का भाव केवल पत्नी के त्याग तक सीमित न रहकर पति-पत्नी दोनों की एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और साथ निभाने के संकल्प से भी जुड़ता है।
3. वेद-पुराणों में श्लोक एवं उपासना का आधार
धार्मिक आलेखों में शास्त्रीय प्रमाण देते समय यह अंतर समझना आवश्यक है कि कौन-सा मंत्र वैदिक संहिता से है, कौन-सा पुराण या स्तोत्र से और कौन-सा लोकपरंपरा में प्रचलित है। चतुर्थी व्रत का वर्तमान स्वरूप अनेक धार्मिक ग्रंथों, पुराण-परंपराओं और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों से विकसित हुआ है।
(क) भगवान गणेश का प्रसिद्ध ध्यान मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
भावार्थ: हे वक्रतुण्ड, विशाल शरीर वाले और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी प्रभु! मेरे समस्त कार्यों को सदा विघ्नरहित बनाइए।
यह गणेशजी की आराधना में व्यापक रूप से प्रचलित प्रार्थना है। इसे किसी विशिष्ट वेद-मंत्र के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय पारंपरिक गणेश-प्रार्थना कहना उचित है।
(ख) श्रीमद्भगवद्गीता का भक्ति संबंधी श्लोक -अध्याय 9, श्लोक 26
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ ९.२६॥
भावार्थ: जो भक्त प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, उसके शुद्ध हृदय से अर्पित उस भेंट को भगवान स्वीकार करते हैं।
यह श्लोक व्रत-पूजा के मूल भाव को स्पष्ट करता है—ईश्वर के लिए आडंबर से अधिक महत्त्व श्रद्धा, शुद्धता और निष्कपट भक्ति का है। संकष्टी चतुर्थी और करवा चौथ पर भी यही भाव प्रासंगिक है।
(ग) भगवान गणेश का बीज मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः॥
यह गणपति उपासना का अत्यंत प्रचलित मंत्र है। श्रद्धालु इसका जप करते हुए गणेशजी से बुद्धि, विवेक, मंगल और विघ्नों के निवारण की प्रार्थना कर सकते हैं।
इन श्लोकों और मंत्रों का उल्लेख उपासना के आध्यात्मिक आधार के रूप में करना चाहिए। किसी मंत्र को वेदों में उद्धृत बताने के लिए उसका प्रामाणिक संहितागत संदर्भ देना आवश्यक है।
4. संकष्टी चतुर्थी और करवा चौथ का ज्योतिषीय महत्व
वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन, भावनाओं, मानसिक स्थिरता और मातृभाव का कारक माना जाता है। चतुर्थी तिथि का संबंध परंपरागत पंचांग में गणेशजी से जोड़ा जाता है। इस कारण चतुर्थी के दिन गणेश उपासना और चंद्रदर्शन को विशेष धार्मिक महत्त्व प्राप्त है।
ज्योतिषीय दृष्टि से इन पर्वों के प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:
- चंद्रमा की उपासना: चंद्रमा को अर्घ्य देना मन की शांति, भावनात्मक संतुलन और पारिवारिक सुख की कामना से जुड़ा है।
- गणेश आराधना: गणेशजी को बुद्धि, विवेक और कार्यारंभ में मंगल के अधिष्ठाता के रूप में पूजा जाता है।
- चतुर्थी तिथि: तिथि का निर्धारण केवल अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख से नहीं, बल्कि सूर्य और चंद्रमा के बीच कोणीय अंतर से होता है। इसलिए चतुर्थी का आरंभ और अंत प्रतिदिन के सामान्य समय से अलग हो सकता है।
- चंद्रदर्शन: संकष्टी चतुर्थी में चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की परंपरा है। करवा चौथ में भी चंद्रदर्शन व्रत-समापन का प्रमुख चरण है।
- दांपत्य और मानसिक सामंजस्य: करवा चौथ का धार्मिक भाव दांपत्य जीवन में विश्वास, संयम, सहयोग और शुभकामना को महत्त्व देता है।
यह भी समझना चाहिए कि ग्रहों और तिथियों से जुड़े धार्मिक फल पारंपरिक ज्योतिषीय मान्यताएँ हैं। इन्हें निश्चित वैज्ञानिक परिणाम या स्वास्थ्य की गारंटी के रूप में नहीं देखना चाहिए।
5. करवा चौथ एवं संकष्टी चतुर्थी 2026 का शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में करवा चौथ गुरुवार, 29 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन संकष्टी चतुर्थी का व्रत भी है।
करवा चौथ 2026
- गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
- व्रत की तिथि – कार्तिक कृष्ण चतुर्थी
- पूजा का मुहूर्त – शाम 5:10 – 6:27 बजे
- अनुमानित चंद्रोदय – शाम लगभग 7:47 बजे
महत्त्वपूर्ण: चतुर्थी तिथि का आरंभ 29 अक्टूबर को लगभग 28 अक्टूबर की रात्रि 1:08 बजे और समापन रात्रि 10:11 बजे बताया गया है।
6. पूजा-विधि और व्रत के प्रमुख नियम
संकष्टी चतुर्थी पर प्रातः स्नान करके भगवान गणेश का ध्यान करें। पूजा-स्थान पर गणेशजी की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पुष्प, दूर्वा, अक्षत, दीप, धूप और फल अर्पित करें। अपनी श्रद्धा के अनुसार गणेश मंत्र का जप करें और संकष्टी व्रत-कथा सुनें। रात्रि में चंद्रमा के दर्शन करके जल अर्पित करें और अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का पारण करें।
करवा चौथ पर प्रातःकाल सर्गी ग्रहण करने की परंपरा है। दिनभर व्रत रखने के बाद संध्या समय माता पार्वती, भगवान शिव और श्रीगणेश की पूजा करें। करवा चौथ की कथा सुनें, करवा पूजन करें और चंद्रोदय पर चंद्रमा को अर्घ्य दें। परंपरा के अनुसार छलनी से चंद्रदर्शन और पति का दर्शन करने के बाद व्रत खोला जाता है।
निर्जला व्रत स्वास्थ्य की दृष्टि से सभी के लिए उपयुक्त नहीं होता। गर्भवती महिलाओं, मधुमेह या अन्य रोगों से पीड़ित व्यक्तियों तथा नियमित दवा लेने वालों को चिकित्सकीय सलाह के अनुसार व्रत की विधि अपनानी चाहिए। भक्ति का उद्देश्य स्वास्थ्य को संकट में डालना नहीं, बल्कि श्रद्धा और मंगलभाव को विकसित करना है।
संकष्टी चतुर्थी और करवा चौथ दोनों भारतीय सनातन परंपरा में आस्था, संयम, परिवार और मंगलकामना के प्रतीक हैं। संकष्टी चतुर्थी हमें विघ्नहर्ता गणेश की शरण में जाकर विवेक और धैर्य प्राप्त करने की प्रेरणा देती है, जबकि करवा चौथ दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और परस्पर समर्पण का संदेश देता है।
इन पर्वों का वास्तविक महात्म्य केवल उपवास रखने या शुभ मुहूर्त में पूजा करने तक सीमित नहीं है। इनका गहरा संदेश है—मन की शुद्धता, परिवार के प्रति उत्तरदायित्व, संबंधों का सम्मान और ईश्वर के प्रति निष्कपट श्रद्धा। जब पूजा के साथ सदाचार, करुणा और पारस्परिक सम्मान जुड़ जाते हैं, तभी पर्व का आध्यात्मिक उद्देश्य सार्थक होता है।

आचार्य संतोष
ज्योतिष विशारद एवं वास्तु आचार्य
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