Anjaan Jee : Editor in Chief & Publisher
सत्ता परिवर्तन की आहट के बीच गठबंधन की रणनीति, जातीय समीकरण और नए चेहरों की तलाश
बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। लंबे समय तक राज्य की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर नई राजनीतिक दिशा का संकेत दे दिया है। यदि सब कुछ तय योजना के अनुसार हुआ तो वे जल्द ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देंगे और बिहार को नया नेतृत्व मिलेगा। यह बदलाव केवल पद परिवर्तन भर नहीं होगा, बल्कि राज्य की राजनीतिक संरचना और शक्ति संतुलन में भी महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।
राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया 16 मार्च तक चलेगी और नए सदस्यों को 9 अप्रैल के बाद शपथ दिलाई जाएगी। इसी समयावधि के बीच नई सरकार के गठन की संभावनाएं भी तेज हो गई हैं। सूत्रों के अनुसार पहले गठबंधन के घटक दल-भारतीय जनता पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड)-अपने-अपने विधायक दल के नेता चुनेंगे, इसके बाद एनडीए विधायक दल की बैठक में अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
राजनीतिक हलकों में यह लगभग तय माना जा रहा है कि इस बार मुख्यमंत्री पद भाजपा के हिस्से में जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो 2005 के बाद पहली बार बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री शपथ लेगा। चर्चा यह भी है कि जदयू को संतुलन बनाए रखने के लिए दो उपमुख्यमंत्री पद दिए जा सकते हैं।
नई सरकार के गठन के साथ मंत्रिमंडल का विस्तार भी संभावित है। पिछली बार 26 मंत्रियों के साथ सरकार बनी थी, लेकिन इस बार पूर्ण आकार की सरकार के तहत लगभग 32 मंत्रियों को शामिल किए जाने की चर्चा है। इसमें भाजपा और जदयू के अलावा सहयोगी दलों-लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), राष्ट्रीय लोक मोर्चा और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा-को भी प्रतिनिधित्व मिल सकता है।
हालांकि सत्ता के इस समीकरण में कुछ महत्वपूर्ण पदों को लेकर खींचतान की संभावना भी है। विधानसभा स्पीकर और गृह विभाग को लेकर दोनों दलों के बीच दावेदारी की चर्चा है। जदयू इन पदों पर दावा कर रहा है, जबकि भाजपा इन्हें अपने पास बनाए रखने के पक्ष में है। ऐसे में आने वाले दिनों में गठबंधन के भीतर बातचीत और संतुलन साधने की राजनीति अहम भूमिका निभाएगी।
मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरों में सबसे आगे नाम मौजूदा उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का माना जा रहा है। वे कोइरी समाज से आते हैं और उनके नाम पर “लव-कुश” यानी कुर्मी-कोइरी सामाजिक समीकरण को साधने की संभावना देखी जा रही है। दूसरी ओर मौजूदा उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा भी मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। संघ से जुड़ाव, संगठनात्मक अनुभव और प्रशासनिक छवि उनके पक्ष को मजबूत बनाती है।
इसके साथ ही राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि भाजपा किसी अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के नेता को मुख्यमंत्री बनाकर सबको चौंका सकती है। ऐसा हुआ तो यह सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा।
उधर जदयू के भीतर भी भविष्य की रणनीति पर विचार चल रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय चौधरी को उपमुख्यमंत्री पद के लिए प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। वहीं यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि नीतीश कुमार अपने पुत्र निशांत कुमार को धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति में आगे ला सकते हैं।
कुल मिलाकर बिहार की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां नेतृत्व परिवर्तन के साथ सत्ता का संतुलन भी नए रूप में सामने आ सकता है। आने वाले कुछ सप्ताह न केवल नई सरकार का चेहरा तय करेंगे, बल्कि यह भी बताएंगे कि राज्य की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी।
