-आचार्य संतोष, वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक
‘प्रौष्ठपदी पूर्णिमा’ से पितृ पक्ष का शुभारंभ, जानिए कुतप-रौहिण मुहूर्त, सूर्य गोचर और षोडश कलाओं का रहस्य
पटना, 24 सितंबर 2026। सनातन पंचांग पद्धति और सौर-चांद्र संवत्सर विधान में भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से लेकर आश्विन शुक्ल पूर्णिमा तक का कालखंड आध्यात्मिक चेतना, ऋण-विमुक्ति और अमृत-तत्व की प्राप्ति का परम पावन संधिकाल माना गया है। काल-विधान के सूक्ष्म विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि पितृ पक्ष (महालय) का आरंभ आश्विन की शरद पूर्णिमा से नहीं, बल्कि भाद्रपद मास की शुक्ल पूर्णिमा से होता है। धर्मशास्त्रों में इसे ‘प्रौष्ठपदी पूर्णिमा’ कहा गया है। यह तिथि चातुर्मास के अंतर्गत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णता तथा आश्विन कृष्ण पक्ष के आरंभ का प्रवेश द्वार है, जिस दिन भगवान सत्यनारायण, चंद्र देव और उमा-महेश्वर के पूजन का विधान है।
श्रीमद्भागवत महापुराण (12.13.13) में कहा गया है कि जो जातक भाद्रपद पूर्णिमा के दिन सुवर्णयुक्त सिंहासन पर श्रीमद्भागवत ग्रंथ की स्थापना कर दान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। वहीं ‘धर्मसिंधु’ और ‘निर्णयसिंधु’ के अनुसार, जिन पूर्वजों का देहावसान किसी भी मास की पूर्णिमा तिथि को हुआ हो, उनके लिए श्राद्ध और तर्पण इसी प्रौष्ठपदी पूर्णिमा के दिन संपन्न किया जाता है। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित है कि श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण से संतुष्ट होकर पितर दीर्घायु, सुयोग्य संतान, धन-वैभव, आरोग्य और मोक्ष का वरदान देते हैं:
“आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः॥”
ज्योतिषीय पृष्ठभूमि: सूर्य का कन्या गोचर और पितरों का भूलोक आगमन
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब आत्मा और पितृ-कारक सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर बुध की स्वराशि कन्या में प्रवेश करते हैं (‘कन्यागते सवितरि’), तब कालपुरुष की कुंडली के षष्ठ भाव (ऋण एवं बाधा भाव) की सक्रियता से जातक पर देव, ऋषि और विशेषकर पितृ-ऋण के शोधन का दायित्व उत्पन्न होता है। शास्त्रों में उल्लेख है:
“कन्यागते सवितरि पितरो यान्ति तत्सुतान्। शून्यां प्रेतपुरिं कृत्वा यावद् वृश्चिकदर्शनम्॥”
सूर्य के वृश्चिक राशि में जाने तक पितर अपने वंशजों के यहां वास करते हैं। वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार चंद्रमा के ऊर्ध्व भाग में पितृलोक की स्थिति मानी गई है। भाद्रपद पूर्णिमा पर पूर्ण कलाओं से युक्त चंद्रमा पृथ्वी के निकट होता है, जिससे सूक्ष्म शरीरधारी पितृ-चेतना का पार्थिव लोक से संबंध सहज स्थापित होता है। कुंडली में नवम, पंचम, दशम भाव अथवा सूर्य-राहु युति जनित ‘पितृ दोष’ के शमन हेतु यह 15 दिवसीय कालखंड सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
शास्त्र सम्मत अनुष्ठान एवं प्रशस्त मुहूर्त
| अनुष्ठान / कर्म | शास्त्र सम्मत काल एवं मुहूर्त | प्रमुख नियम व दिशा |
| सत्यनारायण / लक्ष्मी पूजन | पूर्णिमा तिथि, प्रदोष काल अथवा सायंकाल | पूर्व अथवा उत्तर-पूर्व (ईशान) मुख |
| प्रौष्ठपदी श्राद्ध | ‘कुतप काल’ (पूर्वाह्न 11:45 से अपराह्न 12:35) एवं ‘रौहिण काल’ (अपराह्न 12:35 से 01:25) | दक्षिण मुख, पितृतीर्थ मुद्रा |
| तर्पण एवं पिंडदान | अपराह्न काल (अपराह्न 01:25 से 03:30 तक) | कुश, काला तिल, गंगाजल एवं ताम्र/कांस्य पात्र |
| पंचबलि कर्म | भोजन अर्पित करने से पूर्व (गौ, श्वान, काक, देवादि, पिपीलिका) | भूमि पर कुश बिछाकर पांचों ग्रास अर्पण |
शास्त्रों के अनुसार देवकार्य पूर्वाह्न में तथा पितृकार्य मध्याह्न (कुतप काल) में किए जाते हैं। अनामिका अंगुली में कुश की पवित्री धारण कर दक्षिण मुखी होकर पितृतीर्थ से जल, तिल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है। इसके उपरांत यव (जौ) अथवा पके चावल में तिल, घृत व मधु मिलाकर बने पिंड का दान किया जाता है। भोजन से पूर्व गौ, श्वान, कौआ, देवादि और चींटियों के लिए ‘पंचबलि’ का विधान अनिवार्य है।

पितृ-शोधन से शरद पूर्णिमा की अमृत वर्षा तक की आध्यात्मिक यात्रा
पितृ पक्ष की समाप्ति और आश्विन कृष्ण अमावस्या के उपरांत जब शारदीय नवरात्र पूर्ण होते हैं, तब आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’, ‘कोजागरी’ अथवा ‘रास पूर्णिमा’ का पावन पर्व उदित होता है। इस रात्रि चंद्रमा पृथ्वी के सर्वाधिक निकट आकर अपनी पूर्ण षोडश (16) कलाओं से युक्त होकर सोम-तत्व व अमृत की वर्षा करता है। खुले आकाश तले रखी खीर (अमृत-पायस) और चंद्र रश्मियों का स्पर्श वनस्पतियों में प्राण-शक्ति का संचार करता है तथा कुंडली के चंद्र-दोष और मानसिक संताप का शमन करता है।
सनत्कुमार संहिता के अनुसार, इस रात्रि महालक्ष्मी और कुबेर भूलोक पर भ्रमण कर जाग्रत साधकों को चिर-ऐश्वर्य का वरदान देते हैं:
“निशीथे वरदा लक्ष्मीः को जाग्रतीति भाषिणी। तस्मै वित्तं प्रयच्छामि यः करोति प्रजागरम्॥”
इस प्रकार सनातन परंपरा में भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ हुआ पितृ-ऋण शोधन का यह मार्ग जहां मनुष्य को अपनी जड़ों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ बनाता है, वहीं शरद पूर्णिमा उस अंतःकरण को दिव्य चेतना, अमृत-तत्व और भगवती महालक्ष्मी के अक्षय ऐश्वर्य से परिपूर्ण कर देती है।
वर्ष 2026 के पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) तक की तिथियां इस प्रकार हैं:
प्रमुख तिथियों की समय-सारणी (2026)
- भाद्रपद पूर्णिमा (प्रौष्ठपदी पूर्णिमा / पूर्णिमा श्राद्ध):
- तिथि: 26 सितंबर 2026 (शनिवार)
- महत्व: इस दिन सत्यनारायण पूजन तथा जिन पूर्वजों का निधन पूर्णिमा तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध/तर्पण किया जाता है।
- पितृ पक्ष (महालय) आरंभ (प्रतिपदा श्राद्ध):
- तिथि: 27 सितंबर 2026 (रविवार)
- महत्व: आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से 15 दिवसीय श्राद्ध पक्ष का विधिवत आरंभ।
- सर्वपितृ अमावस्या (महालय समापन / दर्श श्राद्ध):
- तिथि: 10 अक्टूबर 2026 (शनिवार)
- महत्व: अज्ञात तिथियों वाले सभी पितरों का श्राद्ध, तर्पण एवं विसर्जन।
- शारदीय नवरात्र:
- तिथि: 11 अक्टूबर 2026 से 19 अक्टूबर 2026 (कलश स्थापना से महानवमी तक; 20 अक्टूबर को विजयादशमी/दशहरा)।
- आश्विन पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा / कोजागरी पूर्णिमा):
- तिथि: 25 अक्टूबर 2026 (रविवार)
- महत्व: रात्रि जागरण, अमृत-पायस (खीर) विधान तथा महालक्ष्मी एवं कुबेर पूजन।

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