-संतोष श्रीवास्तव की रिपोर्ट
सतही बयानबाजी से इतर व्यवस्था की नब्ज: सत्ता के लिए प्रशासनिक सर्जरी का मौका, विपक्ष के लिए जनआंदोलन की जमीन
पटना। बिहार की राजनीति में अपराध की हर बड़ी घटना के बाद बयानों, आरोपों और संवेदनाओं का एक तयशुदा ढर्रा चलता है। जमुई कांड भी इसी फेहरिस्त में शामिल दिखता है, लेकिन अगर इसके ‘गुप्तचित्र’ – यानी व्यवस्था की उन अंतर्निहित दरारों को डिकोड किया जाए जो अमूमन राजनीतिक शोर में दब जाती हैं – तो यह मामला सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।
नेता अक्सर केवल वही ‘चित्र’ देखते हैं जो तत्कालिक चुनावी नफा-नुकसान तय करता है, जबकि असली खेल प्रशासनिक तंत्र की विफलता और समाज के उस मूक आक्रोश में छुपा है जो अब पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को धता बताने की कगार पर खड़ा है।
1. सम्राट चौधरी और सत्ता पक्ष के लिए: ‘विश्वस्तरीय कानून-व्यवस्था’ का रोडमैप
गृह और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर जब भी ‘सख्त शासन’ या ‘मॉडल लॉ एंड ऑर्डर’ की बात होती है, तो उसका आधार बुलडोजर या तबादले नहीं, बल्कि थाने के स्तर पर मौजूद प्रशासनिक संरचना होती है। जमुई की घटना ने स्पष्ट किया है कि:
- थाना स्तर की स्वायत्तता बनाम राजनीतिक सिंडिकेट: बिहार में अपराध की जड़ें अक्सर निचले स्तर पर पुलिस, स्थानीय बिचौलियों और आपराधिक तत्वों के उस गठजोड़ से सींची जाती हैं, जिसे मुख्यालय स्तर से तोड़ा नहीं जाता। अगर उपमुख्यमंत्री व गृह विभाग से जुड़े नेतृत्व को कानून-व्यवस्था का नजीर पेश करना है, तो ‘थाना-स्तर की जवाबदेही’ को पारदर्शी और कठोर बनाना होगा।
- इंटेलिजेंस नेटवर्क का पुनर्गठन: जमुई जैसे सीमावर्ती और रणनीतिक रूप से संवेदनशील जिलों में स्थानीय आसूचना (Local Intelligence) पूरी तरह पंगु दिखी है। आधुनिक तकनीक, त्वरित प्रतिक्रिया और स्थानीय बीट प्रणाली को दुरुस्त किए बिना कोई भी राज्य अपराध-मुक्त नहीं बन सकता।
- जांच और सजा (Conviction Rate) की समयसीमा: कानून का डर तब पैदा होता है जब अपराध के 30 से 60 दिनों के भीतर स्पीडी ट्रायल के जरिए सजा मुकम्मल हो। केवल गिरफ्तारी से बात नहीं बनेगी; चार्जशीट की गुणवत्ता और अभियोजन पक्ष की मजबूती से ही ‘लॉ एंड ऑर्डर’ का वैश्विक मानक गढ़ा जा सकता है।
2. विपक्ष के लिए: जाति और पार्टी लाइन से परे बड़े जनांदोलन की ज़मीन
बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा त्रासद पहलू यह रहा है कि अपराध को भी जातिगत चश्मे से देखा जाने लगता है। यहीं विपक्ष बार-बार मात खाता है। अगर विपक्ष जमुई कांड के ‘गुप्तचित्र’ को समझ सके, तो वह राज्य में एक अभूतपूर्व जनांदोलन खड़ा कर सकता है:
- ‘सुरक्षा’ को नागरिक अधिकार बनाना: अपराध किसी एक जाति या धर्म को नहीं, बल्कि एक सामान्य नागरिक और परिवार की सुरक्षा की भावना को लहूलुहान करता है। यदि विपक्ष इसे जातिगत विमर्श से खींचकर ‘नागरिक सुरक्षा और न्याय’ का बुनियादी मुद्दा बना दे, तो वह उस मध्यम वर्ग और ग्रामीण जनता को जोड़ सकता है जो पारंपरिक रूप से किसी खास पार्टी से नहीं बंधी है।
- प्रेस कॉन्फ्रेंस से निकलकर सड़कों पर सघन संवाद: सिर्फ एक्स (ट्विटर) पर प्रतिक्रिया देने या प्रतीकात्मक धरना देने के बजाय, अगर पीड़ित परिवारों और आम जनता के साथ ब्लॉक और पंचायत स्तर पर ‘सुरक्षा संवाद’ शुरू किया जाए, तो यह बिहार में 1974 जैसी चेतना को पुनर्जीवित करने का माध्यम बन सकता है।
व्यवस्था का मर्म: चित्र नहीं, गुप्तचित्र पहचानिए
जमुई की घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि इस बात का आईना है कि सत्ता के नियंत्रण तंत्र में कहां-कहां दीमक लग चुकी है और विपक्ष की कल्पनाशीलता कहां आकर सीमित हो जाती है। जब तक राजनेता इस घटना को वोटों के गणित से अलग करके ‘सख्त कानून की नजीर’ और ‘जनता के अस्तित्व की लड़ाई’ के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक चित्र बदलते रहेंगे, लेकिन कैनवास का स्याह सच कभी नहीं बदलेगा।

