-संतोष श्रीवास्तव की रिपोर्ट
अकादमिक तनाव, सामाजिक अलगाव और कमजोर काउंसलिंग तंत्र के बीच पिसते छात्र, व्यापक सुधार की मांग
देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में किसी भी युवा छात्र की असमय मौत समूचे समाज, अभिभावकों और नीति-निर्माताओं को गहरे सदमे में डाल देती है। यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि हमारी पूरी उच्च शिक्षा व्यवस्था की आंतरिक खामियों पर खड़ा होने वाला गंभीर सवाल है। ऐसी दुखद घटनाएं अक्सर संस्थानों में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, छात्रों पर मानसिक दबाव, सामाजिक ताने-बाने और आरक्षण व्यवस्था के व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच उपजे अंतर्विरोधों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला खड़ा करती हैं।
आईआईटी और आईआईएम जैसे शीर्ष संस्थानों की वास्तविक स्थिति को देखें तो यहां की पढ़ाई और मूल्यांकन प्रणाली बेहद कड़ी है। प्रवेश परीक्षा पास कर आने के बावजूद विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों के छात्रों के बीच तैयारी और भाषा के स्तर पर भारी अंतर देखने को मिलता है। जिन छात्रों की प्राथमिक शिक्षा सीमित संसाधनों वाले स्कूलों में हुई हो, उनके लिए कॉलेज के शुरुआती एक-दो वर्षों में प्रतिस्पर्धी माहौल के साथ तालमेल बिठाना अत्यधिक तनावपूर्ण साबित होता है। इस खाई को पाटने के लिए परिसरों में उपचारात्मक कक्षाओं (रेमेडियल सपोर्ट) और समर्पित मेंटरशिप व्यवस्था की भारी कमी है, जिसके चलते कई छात्र खुद को अलग-थलग महसूस करने लगते हैं।
आरक्षण नीति के संदर्भ में संवैधानिक लक्ष्य सामाजिक वंचना को दूर कर ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में शामिल करना रहा है। हालांकि, मौजूदा दौर में इसके व्यावहारिक पहलुओं पर दोतरफा चुनौतियां सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां सीमित सीटों के चलते सामान्य वर्ग के छात्र उच्च अंक लाने के बाद भी अवसरों के अभाव की शिकायत करते हैं, वहीं दूसरी तरफ आरक्षित वर्ग के छात्रों के लिए दाखिले के बाद कैंपस के भीतर जातिगत पूर्वाग्रह, भाषाई असहजता और सामाजिक स्वीकार्यता का संकट खड़ा हो जाता है। साथ ही, आरक्षण का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचने को लेकर क्रीमी लेयर की समीक्षा का मुद्दा भी विमर्श में बना रहता है।
मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों का स्पष्ट मानना है कि छात्र संकट को किसी एक कारण या केवल जातिगत विवाद तक सीमित करना समस्या को सतही तौर पर देखना होगा। सामाजिक स्तर पर विफलता को अभिशाप या कलंक मानने की प्रवृत्ति, परिवारों की अवास्तविक अपेक्षाएं, और साथियों के बीच तुलना का दबाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करता है। इसके अलावा, अधिकांश परिसरों में पेशेवर काउंसलिंग और संवेदनशील सहायता तंत्र का अभाव छात्रों को संकट के समय अकेला छोड़ देता है। शिक्षा विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि शिक्षण संस्थान केवल प्रवेश परीक्षा और प्लेसमेंट के आंकड़ों तक सीमित रहने के बजाय ऐसा संवेदनशील और समावेशी तंत्र विकसित करें, जो हर छात्र को मानसिक और शैक्षणिक संबल प्रदान कर सके।
