कठिनाइयों में भी मुस्कुराना सिखाते हैं भगवान शिव

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– आचार्य संतोष : ज्योतिष विशारद, वास्तु आचार्य, वेदांत साधक एवं भारतीय संस्कृति के प्रचारक

भगवान शिव भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में केवल आराध्य देव नहीं हैं, बल्कि जीवन जीने की एक ऐसी दृष्टि के प्रतीक भी हैं, जो मनुष्य को विषम परिस्थितियों में धैर्य, संयम और आत्मविश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देती है। शिव का स्वरूप जितना रहस्यमय है, उतना ही गहरा उनका संदेश भी है। उनके मस्तक पर चंद्रमा है, जटाओं में गंगा है, गले में सर्प है, शरीर पर भस्म है और हाथ में त्रिशूल है। उनके आसपास ऐसी अनेक प्रतीकात्मक शक्तियां दिखाई देती हैं, जिन्हें सामान्य दृष्टि से भय, विनाश या कठिनाई का प्रतीक माना जा सकता है। फिर भी शिव शांत हैं, स्थिर हैं और प्रसन्न हैं।

जीवन में कठिनाइयां आना स्वाभाविक है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसके जीवन में संघर्ष न हो। किसी के सामने आर्थिक समस्या है, किसी के सामने पारिवारिक चुनौती, कोई अपने स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर चिंतित है तो कोई अपने कार्यक्षेत्र में संघर्ष कर रहा है। कई बार परिस्थितियां इतनी कठिन हो जाती हैं कि मनुष्य को लगता है कि अब आगे कोई रास्ता नहीं बचा। ऐसे समय में भगवान शिव का जीवन-दर्शन हमें भीतर से मजबूत बनने की प्रेरणा देता है।

शिव के गले में सर्प का होना एक गहरा संदेश देता है। सर्प भय और विष का प्रतीक माना जाता है, लेकिन शिव उसी सर्प को अपने गले का आभूषण बनाकर धारण करते हैं। इसका अर्थ यह समझा जा सकता है कि जीवन में मौजूद भय, संकट और विषमताओं को केवल देखकर डरना नहीं चाहिए। उन्हें समझना चाहिए, स्वीकार करना चाहिए और अपनी चेतना पर नियंत्रण बनाए रखना चाहिए।

भगवान शिव के संदर्भ में समुद्र मंथन की कथा भी जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश देती है। समुद्र मंथन से जब हलाहल विष निकला और उससे संसार के विनाश का संकट उत्पन्न हुआ, तब शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण किया। उन्होंने विष को अपने भीतर फैलने नहीं दिया। नीलकंठ बनने की यह कथा हमें बताती है कि जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं, जब हमें नकारात्मकता, कटुता और संकट का सामना करना पड़ता है। लेकिन उस विष को अपने व्यवहार, विचार और संबंधों में फैलने देना उचित नहीं है।

मनुष्य के जीवन में भी प्रतिदिन अनेक प्रकार के ‘विष’ आते हैं। किसी की कही हुई कठोर बात, किसी का अपमान, असफलता, धोखा, निराशा, ईर्ष्या, तनाव और अनिश्चितता- ये सब मन के भीतर विष पैदा कर सकते हैं। यदि हम प्रत्येक नकारात्मक अनुभव को अपने भीतर जमा करते जाएंगे तो मन अशांत होता जाएगा। शिव हमें सिखाते हैं कि विष को पहचानिए, उसका सामना कीजिए, लेकिन उसे अपने व्यक्तित्व का हिस्सा मत बनने दीजिए।

यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों में मुस्कुराने की क्षमता अत्यंत महत्वपूर्ण है। मुस्कुराना समस्याओं से इनकार करना नहीं है। मुस्कुराना यह स्वीकार करना है कि समस्या बड़ी हो सकती है, लेकिन उससे लड़ने का हमारा साहस उससे बड़ा है।

कहा जाता है कि जीवन में मुश्किलें आएंगी, लेकिन उन्हें हंसकर सहने वाला शिव और कठिनाइयों के सामने टूट जाने वाला शव बन जाता है। यह कथन प्रतीकात्मक रूप से मनुष्य को चेताता है कि जीवन की सक्रियता संघर्ष करने में है। जो व्यक्ति परिस्थितियों के सामने अपने भीतर की ऊर्जा खो देता है, वह जीवित होते हुए भी निराशा में जकड़ जाता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी आशा, धैर्य और मुस्कान बनाए रखता है, वह कठिन समय को भी अवसर में बदल सकता है।

शिव का ध्यानमग्न स्वरूप भी हमें यही सिखाता है कि बाहरी दुनिया चाहे कितनी भी अशांत क्यों न हो, भीतर एक ऐसा स्थान होना चाहिए जहां शांति सुरक्षित रहे। आज के समय में मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या बाहरी कठिनाइयां ही नहीं, बल्कि लगातार बढ़ता मानसिक तनाव भी है। मोबाइल, सोशल मीडिया, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव और भविष्य की चिंता ने मनुष्य को लगातार बेचैन बनाए रखा है। ऐसे समय में शिव का ध्यान हमें अपने भीतर लौटने की प्रेरणा देता है।

यदि हम हर छोटी बात पर प्रतिक्रिया देने लगें, हर आलोचना को व्यक्तिगत अपमान समझें और हर असफलता को जीवन का अंत मान लें, तो मन कभी शांत नहीं रह सकता। इसके विपरीत यदि हम परिस्थितियों को स्वीकार करना सीखें, अपनी गलतियों से सीखें और भविष्य के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखें तो कठिन से कठिन समय भी हमें तोड़ने के बजाय मजबूत बना सकता है।

शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा भी शीतलता और संतुलन का प्रतीक है। क्रोध और आवेश के समय विवेक को बनाए रखना जीवन की बड़ी उपलब्धि है। शक्ति का अर्थ केवल आक्रामक होना नहीं है। वास्तविक शक्ति वह है जो सामर्थ्य होने के बावजूद संयम रखे। शिव विनाश के देवता कहे जाते हैं, लेकिन उनका विनाश भी सृजन के लिए मार्ग तैयार करता है। इससे सीख मिलती है कि जीवन में कुछ पुरानी नकारात्मक आदतों, विचारों और भय को समाप्त करना भी आवश्यक है, ताकि नई ऊर्जा और सकारात्मकता का जन्म हो सके।

आज समाज को ऐसे ही शिवत्व की आवश्यकता है। हमें अपने आसपास की विषमताओं को देखकर निराश होने के बजाय समाधान खोजने की आदत विकसित करनी होगी। परिवार में मतभेद हों तो संवाद का रास्ता अपनाना होगा। कार्यक्षेत्र में असफलता मिले तो प्रयास जारी रखना होगा। समाज में कठिनाई दिखाई दे तो केवल शिकायत करने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देना होगा।

मुस्कान का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति को कोई दुख नहीं है। वास्तविक मुस्कान वह है जो दुख के बीच भी उम्मीद को जीवित रखती है। यह मुस्कान मनुष्य के भीतर यह विश्वास पैदा करती है कि आज की परिस्थिति अंतिम सत्य नहीं है। समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं और यदि मनुष्य धैर्य बनाए रखे तो कठिनाइयों के बाद नए अवसर भी आते हैं।

विषमता के बीच मुस्कान बनाए रखने वाला व्यक्ति दूसरों के लिए भी आशा का स्रोत बन जाता है। एक शांत व्यक्ति अपने परिवार को शांति दे सकता है, एक सकारात्मक शिक्षक विद्यार्थियों में विश्वास पैदा कर सकता है और एक धैर्यवान नेतृत्वकर्ता पूरी टीम को कठिन समय में संभाल सकता है। इस प्रकार व्यक्तिगत शांति सामाजिक शक्ति में बदल जाती है।

भगवान शिव का संदेश अंततः यही है कि जीवन से कठिनाइयों को पूरी तरह समाप्त करना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन कठिनाइयों के बीच अपने मन को कैसे संभालना है, यह हमारे हाथ में अवश्य है।

इसलिए जब जीवन में संकट आए, तो घबराने के बजाय स्वयं से पूछें- क्या मैं इस परिस्थिति को धैर्य के साथ संभाल सकता हूं? जब कोई अपमान करे, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय संयम रखें। जब असफलता मिले, तो उसे अंत नहीं बल्कि सीख मानें। जब भविष्य अनिश्चित दिखाई दे, तो वर्तमान कर्म पर ध्यान दें।

शिव की तरह विष को कंठ तक रखें, हृदय तक न पहुंचने दें। कठिनाइयों को जीवन का हिस्सा मानें, लेकिन उन्हें अपनी मुस्कान का कारण न बनने दें।

क्योंकि जिस मनुष्य ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी आंतरिक शांति को बचा लिया, उसने जीवन की सबसे बड़ी विजय प्राप्त कर ली।

सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥