– एस०एन०चतुर्वेदी की रिपोर्ट
मातृभाषा में शिक्षा, अनुवाद और भारतीय भाषाओं के बीच संवाद पर हुआ सार्थक अकादमिक विमर्श
पटना, 09 अगस्त। अनुग्रह नारायण सिंह महाविद्यालय, पटना के हिंदी विभाग एवं भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के संयुक्त तत्वावधान में 7 एवं 8 अगस्त को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सह कार्यशाला का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के प्रथम दिन भारतीय भाषाओं, हिंदी, मातृभाषा में शिक्षण, अनुवाद तथा राष्ट्रनिर्माण में भाषा की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक एवं सार्थक अकादमिक विमर्श हुआ।
कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. रत्ना अमृत के मार्गदर्शन में किया गया। उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुल सचिव प्रो. अबू बकर रिजवी ने भाषा को समाज की स्मृति, संस्कृति एवं सामूहिक चेतना का महत्वपूर्ण वाहक बताया।
नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान की प्रो. मनीषा प्रियम ने भाषा और समाज के संबंध पर विस्तार से विचार रखा। वहीं, मैसूर स्थित भारतीय भाषा संस्थान के डॉ. तारिक खान ने विषय प्रवेश कराया। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. कुमार वरुण ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अभिषेक दत्ता ने किया।

भाषा और राष्ट्रनिर्माण पर चर्चा
प्रथम तकनीकी सत्र में ‘भाषा और राष्ट्रनिर्माण’ विषय पर चर्चा हुई। सत्र की अध्यक्षता प्रो. कलानाथ मिश्र ने की। प्रेम कुमार मणि तथा महात्मा गांधी अध्ययन एवं उच्च शोध केंद्र, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के निदेशक प्रो. शैलेश कुमार सिंह ने विषय पर अपने विचार रखे। सत्र का संचालन डॉ. भारती कुमारी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. कुमार वरुण ने किया।
मातृभाषा में पाठ्यक्रम निर्माण की चुनौतियां
द्वितीय तकनीकी सत्र में ‘मातृभाषा में शिक्षण : पाठ्यक्रम निर्माण की चुनौतियां’ विषय पर विमर्श हुआ। सत्र की अध्यक्षता प्रो. रविंद्रनाथ श्रीवास्तव ने की। मुख्य वक्ता काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिंदी विभाग के प्रो. आशीष त्रिपाठी ने मातृभाषा आधारित शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम निर्माण में आने वाली विभिन्न चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। सत्र का संचालन डॉ. सरिता सिन्हा ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मधु मंजरी ने किया।
हिंदी और अनुवाद के समृद्ध संसार पर विमर्श
तृतीय तकनीकी सत्र में ‘हिंदी का समृद्ध संसार और अनुवाद’ विषय पर चर्चा हुई। सत्र की अध्यक्षता डॉ. संजय कुमार सिंह ने की। मुख्य वक्ता केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के प्रो. धनजी प्रसाद ने हिंदी और अनुवाद की व्यापक संभावनाओं पर विचार व्यक्त किए। संचालन डॉ. नवीन कुमार ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. तारिक खान ने किया।
संगोष्ठी के दौरान यह विचार प्रमुखता से उभरकर सामने आया कि भारतीय भाषाओं के बीच बेहतर संवाद, मातृभाषा में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा अनुवाद के माध्यम से ज्ञान का व्यापक प्रसार देश की भाषाई एवं सांस्कृतिक समृद्धि को मजबूत कर सकता है। वक्ताओं ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक चेतना से भी जुड़ी हुई है।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रबुद्धजनों ने संगोष्ठी सह कार्यशाला की सराहना करते हुए इसे भारतीय भाषाओं, मातृभाषा आधारित शिक्षा और अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अकादमिक पहल बताया।

