-संतोष श्रीवास्तव की रिपोर्ट
देश की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर आ खड़ी है जहाँ हर छोटी हलचल आने वाले बड़े सियासी भूचाल का संकेत देती है। आगामी चुनावों, विशेषकर उत्तर प्रदेश के 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले, विपक्षी दलों के सबसे बड़े मंच यानी ‘INDI गठबंधन’ के भीतर पड़ी दरारें अब सतह पर साफ दिखने लगी हैं। गठबंधन की रणनीतिक बैठकों से प्रमुख दलों के दूरी बनाने और सीटों के बंटवारे को लेकर मची रस्साकशी ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ विपक्ष की एकजुटता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को एक बार फिर बढ़त हासिल करने का खुला मौका दे दिया है।
एकता के दावों की जमीनी हकीकत और सीटों का घमासान
जब विपक्षी दलों ने मिलकर ‘INDI गठबंधन’ का गठन किया था, तब यह उम्मीद बंधाई गई थी कि यह मंच क्षेत्रीय और वैचारिक मतभेदों को दरकिनार कर बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत विकल्प पेश करेगा। लोकसभा चुनाव 2024 में इस एकजुटता के कुछ सकारात्मक परिणाम भी दिखे, लेकिन अब विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही सीटों के बंटवारे और स्थानीय महत्वाकांक्षाओं ने गठबंधन की नींव को हिलाना शुरू कर दिया है।
- कांग्रेस की बड़ी मांग: उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी द्वारा कम से कम 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की जिद और गठबंधन के तहत बड़ी हिस्सेदारी के दावे ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि उनके पास सभी 403 विधानसभा सीटों पर कैडर की तैयारी है।
- समाजवादी पार्टी का पलटवार: दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी (SP) ने इस आक्रामक तेवर पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। सपा का स्पष्ट संदेश है कि सीटों का फैसला हवा में नहीं, बल्कि ‘विनिबिलिटी’ (जीत की क्षमता) और जमीनी जनाधार के आधार पर होना चाहिए।
- समन्वय की कमी: आगामी बैठकों से प्रमुख दलों का किनारा करना और रायबरेली, अमेठी तथा पश्चिमी यूपी जैसे क्षेत्रों में खींचतान इस बात का प्रमाण है कि गठबंधन के भीतर आपसी अविश्वास और अंतर्कलह बढ़ती जा रही है।
बीजेपी का आक्रामक रुख और जीत का दावा
विपक्षी खेमे में मची इस रार का सीधा फायदा उठाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने आगामी चुनावों में अपनी जीत का दम भरना शुरू कर दिया है। बीजेपी नेतृत्व लगातार यह कह रहा है कि ‘INDI गठबंधन’ कोई वैचारिक गठबंधन नहीं, बल्कि सिर्फ अवसरवादी दलों का एक स्वार्थी समूह है, जो सत्ता हासिल करने के लिए इकट्ठा हुआ था।
राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि विपक्ष का यह बिखराव बीजेपी के चुनावी कैंपेन को आसान बना रहा है। जहाँ एक तरफ बीजेपी अपने अनुशासित संगठन, स्पष्ट वैचारिक एजेंडे और मजबूत नेतृत्व के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है, वहीं विपक्ष आपसी कलह और समन्वयहीनता से जूझ रहा है।
यह अकाट्य सत्य है कि एक जीवंत लोकतंत्र के लिए सत्ता पक्ष के साथ-साथ एक मजबूत और एकजुट विपक्ष का होना आवश्यक है। लेकिन वर्तमान में ‘INDI गठबंधन’ जिस दौर से गुजर रहा है, उससे जनता के बीच नकारात्मक संदेश जा रहा है।
यदि समय रहते गठबंधन के घटक दलों ने व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और अहंकार को त्यागकर व्यावहारिक फॉर्मूला नहीं अपनाया, तो 2027 का चुनाव उनके लिए एक राजनीतिक सबक साबित होगा। फिलहाल, गेंद पूरी तरह से विपक्ष के पाले में है कि वे अपने बिखरते कुनबे को संभालते हैं या आपसी फूट का खामियाजा भुगतने के लिए तैयार होते हैं।

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