– एस०एन०चतुर्वेदी की रिपोर्ट
एशियाटिक सोसाइटी और भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर विशेषज्ञों ने साझा किए विचार
वाराणसी, 25 अगस्त। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के भारत अध्ययन केंद्र एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थायें” विषय पर 15 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला (10 से 31 अगस्त 2026) का आयोजन किया गया।
कार्यशाला के दौरान “एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल और भारतविद्या” विषय पर वक्तव्य देते हुए बीएचयू के बांग्ला विभाग की सहायक आचार्य डॉ. संपन चक्रवर्ती ने कहा कि वर्ष 1784 में सर विलियम जोन्स द्वारा स्थापित एशियाटिक सोसाइटी ने प्राचीन ज्ञान-परंपराओं, भाषाओं, इतिहास और संस्कृति के अध्ययन को संस्थागत आधार प्रदान किया। उन्होंने बताया कि इस संस्था ने भारतविद्या के विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

वहीं, द्वितीय सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के आचार्य प्रो. बलराम शुक्ल ने “भारतीय ज्ञान परंपरा: सातत्य और संवर्धन” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा कोई स्थिर या जड़ व्यवस्था नहीं, बल्कि निरंतर प्रवाहित होने वाली एक जीवंत धारा है। भारतीय परंपरा की असली शक्ति इसके सातत्य और परिवर्तनशीलता में निहित है, जो समय के अनुसार नए संदर्भों में पुनर्व्याख्यायित होकर स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखती है।

