– एस०एन०चतुर्वेदी की रिपोर्ट
कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक बोले- पुरोहित परंपरा भारतीय संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान और लोकमंगल की आधारशिला
नई दिल्ली, 31 जुलाई। श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली एवं दिल्ली संस्कृत अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पुरोहित सम्मेलन का उद्घाटन वैदिक मंगलाचरण एवं मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुआ। सम्मेलन में देश-विदेश से आए विद्वानों, आचार्यों, पुरोहितों, शोधार्थियों एवं संस्कृत-सेवियों ने भारतीय पुरोहित परंपरा के संरक्षण, संवर्धन तथा शोधपरक विकास पर व्यापक विचार-विमर्श किया।
सम्मेलन का आयोजन सामान्य पूजन, विशिष्ट पूजन, अनुष्ठानिक पूजन, यज्ञ-पूजन, पाठाधि-पूजन तथा विभिन्न वैदिक संस्कारों के शास्त्रीय एवं शोधपरक अध्ययन को केंद्र में रखकर किया गया। इसका उद्देश्य भारतीय पुरोहित परंपरा के सांस्कृतिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं सामाजिक पक्षों का अकादमिक विश्लेषण करते हुए उसकी समकालीन प्रासंगिकता और वैश्विक उपयोगिता को स्थापित करना है।
सम्मेलन की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि भारतीय पुरोहित परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सनातन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक जीवन-दर्शन तथा लोकमंगल की भावना की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, स्मृतियों और पुराणों में वर्णित संस्कार परंपरा मानव जीवन को संस्कारित एवं अनुशासित बनाती है तथा पुरोहित समाज इस अमूल्य विरासत का संवाहक और संरक्षक है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पुरोहितों को केवल कर्मकांड तक सीमित रखने के बजाय उन्हें शास्त्रीय ज्ञान, शोध-दृष्टि, आधुनिक तकनीक, व्यवहारिक प्रशिक्षण और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी सशक्त बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने पुरोहित शिक्षा को अनुसंधान, डिजिटल तकनीक एवं अंतरराष्ट्रीय संवाद से जोड़ने पर बल देते हुए कहा कि इससे भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूती मिलेगी।
विशिष्ट अतिथि साध्वी विभानंद गिरिजी महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति की आत्मा वैदिक परंपरा और सनातन संस्कारों में निहित है। उन्होंने युवाओं को संस्कृत, वेद और भारतीय जीवन मूल्यों से जोड़ने का आह्वान किया।
मुख्य अतिथि संस्कृत भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री जयप्रकाश ने कहा कि संस्कृत भाषा और पुरोहित परंपरा एक-दूसरे की पूरक हैं। उन्होंने प्रशिक्षित एवं संस्कारित पुरोहितों के निर्माण तथा वैदिक परंपरा के वैज्ञानिक स्वरूप को समाज के समक्ष प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की आवश्यकता बताई।
विशिष्ट अतिथि प्रो. देवी प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि पुरोहित केवल कर्मकांड संपन्न कराने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज का सांस्कृतिक मार्गदर्शक, नैतिक प्रेरक और आध्यात्मिक शिक्षक भी है। वहीं सारस्वत अतिथि प्रो. संतोष कुमार शुक्ला एवं प्रो. वृंदावन दास ने पुरोहित शिक्षा, वैदिक साहित्य और कर्मकांडीय परंपरा के व्यवस्थित शोध एवं प्रलेखन पर बल दिया।

पुरोहित विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक प्रो. रामराज उपाध्याय ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि इसका उद्देश्य पुरोहित शिक्षा को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करना तथा वैदिक संस्कारों के वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय अध्ययन को प्रोत्साहित करना है।
अंतरराष्ट्रीय सत्र में दक्षिण अफ्रीका के श्री सनातन धर्म युवक पुरोहित मंडल एवं हिंदू पृष्ठ संगठन, डरबन के अध्यक्ष अमीचंद महाराज ने प्रवासी भारतीय समाज में वैदिक संस्कारों के संरक्षण में पुरोहितों की भूमिका पर अपने विचार रखे। वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका से शिवराम पोडेल ऑनलाइन माध्यम से जुड़े और भारतीय वैदिक संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता तथा प्रशिक्षित पुरोहितों की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
समापन सत्र में विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सम्मेलन में शामिल सभी विद्वानों, शोधार्थियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय एवं दिल्ली संस्कृत अकादमी का यह संयुक्त आयोजन भारतीय पुरोहित परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और अकादमिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
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उन्होंने कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत अध्ययन और पुरोहित शिक्षा के क्षेत्र में नए मानदंड स्थापित कर रहा है। सम्मेलन के सफल आयोजन में आयोजन समिति, पुरोहित विभाग, शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों, शोधार्थियों एवं स्वयंसेवकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
सम्मेलन का संचालन प्रो. सुंदर नारायण झा ने किया। उपस्थित विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि भारतीय पुरोहित परंपरा केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान, सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक समरसता और वैश्विक मानव कल्याण की मजबूत आधारशिला है। सम्मेलन ने इस क्षेत्र में शोध, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए आयाम स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की।

