पर्यावरण संतुलन के लिए सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी : जल पुरुष डॉ.राजेन्द्र सिंह

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एस०एन०चतुर्वेदी की रिपोर्ट

नई दिल्ली, 14 सितम्बर : भारत का वैभव जिस विविधता पर टिका है, उसी विविधता पर विकास के नाम पर समय-समय पर प्रहार हुआ है।इससे देश की प्रकृति और संस्कृति के सामने चुनौती खड़ी हो गई है। इस विविधता को संरक्षित किए बिना प्रकृति और संस्कृति के मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना संभव नहीं है। इसलिए भारत की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विविधता को सहेजना समय की आवश्यकता है, ऐसा स्पष्ट करते हुए जलपुरुष डॉ.राजेंद्र सिंह ने नई दिल्ली स्थित हरिजन सेवक संघ के गांधी आश्रम में “प्रकृति-संस्कृति” विषय पर आयोजित दो दिवसीय विचार-मंथन में बोल रहे थे।

परिषद में देशभर से विभिन्न सेवाभावी संस्थाओं के प्रमुख कार्यकर्ता सहभागी हुए हैं। इसका आयोजन तरुण भारत संघ, जल बिरादरी द्वारा किया जा रहा है। डॉ.राजेंद्र सिंह ने कहा कि हमारी कृषि संस्कृति, भू-विज्ञान, जल-विज्ञान,जलवायु, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक-आर्थिक पहलू भारत की भौगोलिक संरचना के महत्वपूर्ण घटक हैं। इन सभी घटकों के शक्ति-केंद्रों को पहचानकर उनका महत्व नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है। इसी के माध्यम से भारत के सांस्कृतिक वैभवऔर प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध को समझाया जा सकता है।

परिसंवाद में वक्ताओं ने कहा कि शुद्ध पानी, मिनरल्स, जीव-जंतु और कीट प्रकृति के संरक्षक हैं। इसे समझना और प्रकृति के इन घटकों का संरक्षण करना आवश्यक है।देवबन की जैव-विविधता कभी एक आदर्श के रूप में पहचानी जाती थी,लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं। प्रकृति एवं सांस्कृतिक विरासत के सामने खड़े इन खतरों पर केवल चर्चा करते रहने के बजाय अब तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता है।प्रो.दिनेश मिश्रा ने कहा कि जल संरक्षण को नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचाया जाए, इस दिशा में एनसीईआरटी काम कर रही है। हमारा सफर “नेचर से कल्चर” की ओर है।उन्होंने कहा कि अपने परिवेश को बचाने के लिए ही संस्कृति का निर्माण हुआ है और प्रकृति एवं संस्कृति के इस संबंध को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। कार्यक्रम में अनेकों प्रबुद्धजन मौजूद थे।

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