दिल्ली के साकेत थाने की घटना ने प्रेस की आजादी और महिला सुरक्षा पर खड़े किए गंभीर सवाल

Live ख़बर

– संतोष श्रीवास्तव की रिपोर्ट

पत्रकारों के साथ कथित बर्बरता पर फूटा गुस्सा, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की उठी मांग

नई दिल्ली, 03 सितंबर 2026: राजधानी दिल्ली के साकेत थाने से सामने आई एक गंभीर घटना ने न सिर्फ लोकतांत्रिक मूल्यों को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि प्रेस की आजादी और महिला सुरक्षा के सरकारी दावों की कलई भी खोल दी है। घटना को लेकर यह सवाल पुरजोर तरीके से उठ रहा है कि यदि पत्रकार सवाल पूछने जैसे अपने मौलिक संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करने पर हिरासत और कथित बर्बरता का शिकार बनेंगे, तो यह सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी पर खुला हमला है।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर आघात

एक सजग पत्रकार का मुख्य दायित्व सत्ता और प्रशासन से जनहित से जुड़े तीखे व जरूरी सवाल पूछना है। यदि इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बदले पत्रकारों को पुलिस हिरासत और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़े, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर गहरा आघात है। इस प्रकरण ने मीडिया की स्वतंत्रता और कार्यप्रणाली की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।

महिला सुरक्षा के दावों पर प्रश्नचिह्न

देश की राजधानी दिल्ली में जहां महिला सुरक्षा को लेकर लगातार कड़े कदम उठाने और बड़े-बड़े दावे करने की बात कही जाती है, वहीं महिला पत्रकारों के साथ थाने की चारदीवारी के भीतर कथित तौर पर अभद्रता और मारपीट का मामला सामने आना समूचे पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े करता है।

जवाबदेही और निष्पक्ष जांच की मांग

यद्यपि पुलिस प्रशासन अपने स्तर पर इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर रहा है, लेकिन ऐसी घटनाएं आम जनता और लोकतांत्रिक संस्थाओं का न्याय व्यवस्था पर से भरोसा कमजोर करती हैं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए यह मांग तेज हो गई है कि पूरे प्रकरण की बिना किसी बाहरी दबाव के निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, ताकि सच सामने आ सके और दोषियों की जवाबदेही तय हो सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *