अयोध्या में पारमेष्ठि गुरु शक्ति पूर्णिमा महोत्सव, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का संगम

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अयोध्या से विजय कुमार झा

सद्गुरुदेव श्रीमाली ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का किया आह्वान, कहा— अब विचारों के स्तर पर होगा सनातन का संग्राम

अयोध्या, 30 जुलाई। रामलला की पावन नगरी अयोध्या के कारसेवकपुरम स्थित जानकी घाट के समीप निखिल मंत्र विज्ञान (अंतरराष्ट्रीय सिद्धाश्रम साधक परिवार) द्वारा आयोजित द्विदिवसीय पारमेष्ठि गुरु शक्ति पूर्णिमा महोत्सव के दूसरे दिन भक्ति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला। देश-विदेश से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं और साधकों की उपस्थिति में पूरा परिसर “जय श्री राम”, “जय गुरुदेव”, “जय निखिल” और “हर-हर महादेव” के जयघोष से गुंजायमान रहा।

शनिवार देर रात तक चले इस आध्यात्मिक शिविर में विशेष साधना, गुरुदीक्षा एवं शक्तिपात दीक्षाओं का आयोजन किया गया। सद्गुरुदेव नंदकिशोर श्रीमाली ने बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को दीक्षा प्रदान की, जिसके साथ अनेक नए साधक निखिल परिवार से जुड़े।

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500 वर्षों के संघर्ष का प्रतीक है राम मंदिर

परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंदजी महाराज (डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली) एवं वंदनीया माता भगवती की प्रेरणा में आयोजित इस महोत्सव को संबोधित करते हुए सद्गुरुदेव नंदकिशोर श्रीमाली ने भगवान श्रीराम, गुरु-तत्व और अयोध्या की आध्यात्मिक महिमा पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कारसेवकपुरम के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि आज का भव्य राम मंदिर लगभग 500 वर्षों के संघर्ष और करीब 30 पीढ़ियों के धैर्य, त्याग एवं शौर्य का परिणाम है। उन्होंने कहा कि मंदिर निर्माण अंतिम विजय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के नए युग की शुरुआत है।

उन्होंने कहा कि भविष्य का संघर्ष शस्त्रों से नहीं, बल्कि विचारों के स्तर पर होगा। ऐसे समय में सनातन संस्कृति के मूल्यों, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण की भावना को नई पीढ़ी तक पहुंचाना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

गुरु का उद्देश्य आत्मबल और आनंद की प्राप्ति

सद्गुरुदेव ने गुरु-तत्व की व्याख्या करते हुए कहा कि गुरु केवल जीवन की समस्याओं का समाधान नहीं बताते, बल्कि शिष्य को इतना आत्मनिर्भर और आत्मबलवान बनाते हैं कि वह किसी भी परिस्थिति में विचलित न हो।

उन्होंने कहा कि भौतिक सुख और वास्तविक आनंद में अंतर है। सुख बाहरी संसाधनों से प्राप्त होता है, जबकि आनंद अंतर्मन की स्थिति है। गुरु का मार्गदर्शन मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान तथा सीमित सोच से व्यापक दृष्टिकोण की ओर ले जाता है।

हनुमान को बताया बुद्धि, विवेक और समर्पण का आदर्श

रामकथा के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए सद्गुरुदेव ने कहा कि हनुमान केवल बल के प्रतीक नहीं, बल्कि अद्भुत बुद्धि, विवेक, समर्पण और निष्ठा के आदर्श हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में केवल शक्ति नहीं, बल्कि सद्बुद्धि और सकारात्मक विचार ही व्यक्ति को सफलता और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं।

सकारात्मक दृष्टिकोण से मिलता है जीवन का आनंद

अपने उद्बोधन में सद्गुरुदेव ने कहा कि अधिकांश समस्याओं का कारण परिस्थितियां नहीं, बल्कि हमारा दृष्टिकोण होता है। उन्होंने लोगों से प्रतिदिन ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने, बीती कटु स्मृतियों को भूलकर नए उत्साह के साथ जीवन की शुरुआत करने तथा सकारात्मक सोच अपनाने का आग्रह किया।

संघर्ष से भागना नहीं, उसका सामना करना सीखें

साधकों को कर्मयोग का संदेश देते हुए सद्गुरुदेव ने कहा कि जीवन निरंतर संघर्ष का नाम है। न्याय, सत्य और धर्म की स्थापना के लिए साहस, धैर्य और सत्कर्म आवश्यक हैं। उन्होंने प्रेरक काव्य पंक्तियों के माध्यम से जीवन में संघर्ष के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि चुनौतियों से पलायन नहीं, बल्कि उनका दृढ़ता से सामना करना ही सफलता का मार्ग है।

महोत्सव का समापन गुरु आरती, महाप्रसाद वितरण एवं सद्गुरुदेव के आशीर्वचन के साथ हुआ। कार्यक्रम के दौरान प्रसिद्ध भजन गायक महेंद्र मानकर एवं उनकी मंडली ने भक्तिमय प्रस्तुतियों से श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। मंच संचालन मनोज भारद्वाज ने किया।