शिक्षक दिवस: जब शिक्षा संस्कार से जुड़ती है, तभी समाज का भविष्य संवरता है

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संतोष श्रीवास्तव, मुख्य संपादक सह प्रकाशक

सिर्फ सम्मान और समारोह नहीं, शिक्षक की गरिमा, स्वतंत्रता और जिम्मेदारी पर भी हो गंभीर विमर्श

5 सितंबर 2026 | संपादकीय

5 सितंबर आते ही देश शिक्षक दिवस मनाता है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में कार्यक्रम होते हैं, विद्यार्थी अपने शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हैं और गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता पर चर्चा होती है। लेकिन शिक्षक दिवस केवल फूल, माला, उपहार और औपचारिक भाषणों का दिन नहीं होना चाहिए। यह उस व्यक्ति और व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करने का अवसर है, जो आने वाली पीढ़ियों के ज्ञान, चरित्र और दृष्टिकोण को आकार देती है।

भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। वे महान दार्शनिक, शिक्षाविद् और भारत के पूर्व राष्ट्रपति थे। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य को बेहतर मनुष्य बनाने की प्रक्रिया है।

आज शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऑनलाइन शिक्षा और बदलते रोजगार बाजार ने शिक्षक की भूमिका को भी बदल दिया है। अब शिक्षक केवल किताब का पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं रह गया है। उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह विद्यार्थियों को सूचना के विशाल संसार में सही ज्ञान, विवेक और सत्य की पहचान करना सिखाए।

आज एक विद्यार्थी के हाथ में मोबाइल है और कुछ सेकंड में उसके सामने हजारों सूचनाएं आ जाती हैं। लेकिन सूचना और ज्ञान में अंतर है। ज्ञान के साथ विवेक आवश्यक है और विवेक के साथ संस्कार। यही वह क्षेत्र है जहां शिक्षक की भूमिका मशीनों से अलग और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

शिक्षक की गरिमा भी शिक्षा की गुणवत्ता का प्रश्न है

हम शिक्षक से उत्कृष्ट परिणाम, अनुशासन, नवाचार और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की अपेक्षा करते हैं। लेकिन क्या हमने शिक्षक को उसके कार्य के अनुरूप सम्मान, संसाधन और कार्य करने की स्वतंत्रता दी है?

शिक्षक को केवल परीक्षा परिणामों और आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता। एक शिक्षक विद्यार्थी के भीतर आत्मविश्वास पैदा करता है, असफलता से लड़ना सिखाता है और सही-गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता विकसित करता है। कई बार शिक्षक का एक वाक्य विद्यार्थी के पूरे जीवन की दिशा बदल देता है।

इसलिए शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को सम्मानित करने के साथ-साथ उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रशिक्षण, कार्य-परिस्थितियों और पेशेवर स्वतंत्रता पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

बदलते समय में शिक्षक की नई भूमिका

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक शिक्षा के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन ला रही है। आने वाले समय में विद्यार्थियों को जानकारी देने का काम तकनीक तेजी से कर सकती है, लेकिन प्रश्न पूछने की आदत, तर्क करने की क्षमता, संवेदनशीलता, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करना शिक्षक का महत्वपूर्ण दायित्व बना रहेगा।

एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी को केवल यह नहीं बताता कि क्या सोचना है, बल्कि यह सिखाता है कि कैसे सोचना है

यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है।

गुरु का सम्मान तभी सार्थक होगा

शिक्षक दिवस पर एक दिन शिक्षक के चरण छू लेना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सम्मान तब होगा जब समाज शिक्षा को प्राथमिकता देगा, विद्यालयों को बेहतर बनाएगा, शिक्षकों को उचित सम्मान देगा और विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने तथा अपनी प्रतिभा विकसित करने का अवसर देगा।

हमें यह भी समझना होगा कि शिक्षक अकेले शिक्षा व्यवस्था को नहीं बदल सकता। परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार—चारों की साझा जिम्मेदारी है कि बच्चों को ऐसा वातावरण मिले, जिसमें ज्ञान के साथ संवेदना और सफलता के साथ नैतिकता भी विकसित हो।

शिक्षक राष्ट्र निर्माता कहे जाते हैं। यह केवल एक भावनात्मक उपमा नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक सत्य है। आज की कक्षा में बैठा विद्यार्थी ही कल का डॉक्टर, इंजीनियर, किसान, वैज्ञानिक, न्यायविद, पत्रकार, प्रशासक या जनप्रतिनिधि बनेगा। उसके व्यक्तित्व में शिक्षक की दी हुई शिक्षा और संस्कार किसी न किसी रूप में दिखाई देंगे।

इस शिक्षक दिवस पर इसलिए केवल शुभकामना न दें – शिक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी स्वीकार करें।

क्योंकि मजबूत इमारत की नींव दिखाई नहीं देती, लेकिन पूरी इमारत उसी पर खड़ी होती है। शिक्षक भी समाज की वही नींव हैं।

शिक्षक को सम्मान देना वास्तव में भविष्य को सम्मान देना है।

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