JSSC-CGL विवाद: परीक्षा रद्द होने के बाद 1,932 चयनित अभ्यर्थियों की नौकरी पर क्या होगा?

Live ख़बर

– Santosh Kr. Srivastav : Editor in Chief & Publisher

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सरकार के सामने केवल परीक्षा रद्द करने का निर्णय नहीं, बल्कि उसके बाद पैदा होने वाले कानूनी, प्रशासनिक और नैतिक सवालों का जवाब देना भी बड़ी चुनौती है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 17 अगस्त को कैबिनेट की विशेष बैठक के बाद JSSC-CGL समेत TDPL से जुड़ी परीक्षाओं, उनके परिणामों, चयन और संबंधित प्रक्रियाओं को रद्द करने की घोषणा की है। सरकार ने वर्ष 2014 से हुई छोटी-बड़ी गड़बड़ियों की जांच कराने तथा परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में समिति गठित करने की बात भी कही है।

सरकार का यह फैसला छात्र आंदोलन के दबाव में आया हो अथवा शासन की समीक्षा का परिणाम हो, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस परीक्षा, परिणाम और चयन प्रक्रिया को सरकार ने निरस्त कर दिया है, उसके आधार पर पहले ही सरकारी सेवा में नियुक्त हो चुके कर्मचारियों की स्थिति क्या होगी?

JSSC-CGL 2023 के माध्यम से 2,025 पदों पर नियुक्ति होनी थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार आयोग ने 1,932 अभ्यर्थियों को सफल घोषित किया था।

पदवार स्थिति इस प्रकार बताई गई है-

  • सहायक प्रशाखा पदाधिकारी : 863 पदों के विरुद्ध 847 चयन
  • कनीय सचिवालय सहायक : 343 पदों के विरुद्ध 293 चयन
  • श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी : 182 पदों के विरुद्ध 170 चयन
  • प्लानिंग असिस्टेंट : 5 पदों के विरुद्ध 4 चयन
  • प्रखंड कल्याण पदाधिकारी : 195 पदों के विरुद्ध 191 चयन
  • प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी : 252 पदों के विरुद्ध 249 चयन
  • अंचल निरीक्षक-सह-कानूनगो : 185 पदों के विरुद्ध 178 चयन

कुल 2,025 रिक्तियों के विरुद्ध 1,932 अभ्यर्थियों का चयन हुआ।

यह केवल आंकड़ा नहीं है। इसके पीछे हजारों परिवारों की उम्मीदें, चयनित अभ्यर्थियों की वर्षों की तैयारी, नियुक्ति पत्र, पदस्थापन और सरकारी तंत्र में उनकी वर्तमान जिम्मेदारियां जुड़ी हैं। ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना होगा कि परीक्षा और चयन निरस्त होने के बाद इन नियुक्तियों की कानूनी स्थिति क्या होगी।

क्या परिणाम रद्द होगा लेकिन नौकरी जारी रहेगी? क्या नियुक्ति पत्र वैध माना जाएगा? क्या विभिन्न जिलों में पदस्थापित कर्मचारी काम करते रहेंगे? क्या जांच पूरी होने तक उनकी सेवाएं जारी रहेंगी? अथवा विवादित चयन के आधार पर हुई नियुक्तियों की भी समीक्षा कर नई भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाएगी?

इन सवालों को अब लंबे समय तक टाला नहीं जा सकता।

झारखंड की परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवालों का दायरा JSSC-CGL से कहीं बड़ा है। JPSC की परीक्षाएं भी कथित अनियमितताओं की जांच के घेरे में हैं। जुलाई 2026 में CID की कार्रवाई के दौरान JPSC की तत्कालीन उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता गुप्ता, TSR Data Processing Private Limited यानी TDPL के निदेशक रामवीर सिंह सहित अन्य लोगों की गिरफ्तारी का मामला सामने आया।

JPSC की वर्ष 2023 संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा का अंतिम परिणाम 25 जुलाई 2025 को जारी किया गया था, जिसमें 342 अभ्यर्थियों को विभिन्न राज्य सेवाओं के लिए सफल घोषित किया गया था। इनमें झारखंड प्रशासनिक सेवा, झारखंड राज्य पुलिस सेवा, वित्त, श्रम, सहकारिता, शिक्षा, उत्पाद समेत विभिन्न सेवाओं के पद शामिल हैं।

ऐसे में जांच का दायरा केवल एक परीक्षा तक सीमित रखना भर्ती व्यवस्था की मूल समस्या का समाधान नहीं करेगा।

अब सरकार के सामने सबसे जरूरी कदम एक सार्वजनिक और आधिकारिक डेटाबेस जारी करना होना चाहिए। इसमें यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि विवादित अथवा निरस्त की गई परीक्षाओं के आधार पर-

  • कितने अभ्यर्थी चयनित हुए?
  • कितने लोगों को नियुक्ति दी गई?
  • कितने कर्मचारी प्रशिक्षण में हैं?
  • कितने लोग वर्तमान में सेवा में हैं?
  • किस विभाग में कितने कर्मचारी कार्यरत हैं?
  • किस जिले में किस पद पर नियुक्ति हुई है?
  • सरकार के नए निर्णय के बाद उनकी सेवा स्थिति क्या होगी?

पारदर्शिता का यही रास्ता सरकार और अभ्यर्थियों दोनों के हित में होगा।

यह विवाद का सबसे कठिन प्रश्न है।

यदि सरकार यह मानती है कि परीक्षा में ऐसी गंभीर अनियमितताएं हुईं कि परीक्षा, परिणाम और चयन प्रक्रिया को निरस्त करना आवश्यक हो गया, तो उसी चयन के आधार पर हुई नियुक्तियों को बिना समीक्षा के जारी रखना स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करेगा।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी चयनित अभ्यर्थियों को बिना किसी प्रक्रिया के तत्काल नौकरी से हटा दिया जाए। नियुक्ति समाप्त करने अथवा सेवा से अलग करने के लिए संबंधित सेवा नियमों, नियुक्ति आदेश, न्यायिक निर्देश और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन आवश्यक होगा।

सरकार को कठोरता और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाना होगा।

परीक्षा में अनियमितता का आरोप लगने मात्र से हर सफल अभ्यर्थी व्यक्तिगत रूप से दोषी नहीं हो जाता। संभव है कि बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने पूरी ईमानदारी से परीक्षा दी हो और उन्हें किसी कथित गड़बड़ी की जानकारी तक न रही हो।

इसलिए सरकार को दो अलग-अलग प्रश्नों में अंतर करना होगा-

पहला, क्या चयन प्रक्रिया निष्पक्ष और वैध थी?

दूसरा, क्या किसी व्यक्तिगत अभ्यर्थी ने अनुचित साधन का इस्तेमाल किया?

यदि किसी अभ्यर्थी ने व्यक्तिगत रूप से कोई गलत कार्य नहीं किया, तब भी पूरी चयन प्रक्रिया की वैधानिकता का प्रश्न अलग रहेगा। वहीं, किसी व्यक्ति को केवल इसलिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि वह विवादित परीक्षा में सफल हुआ था।

यही संतुलन इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण होगा।

इस मामले का सबसे बड़ा खतरा यह है कि परीक्षा विवाद राजनीतिक समझौते का विषय न बन जाए। यदि परीक्षा रद्द कर दी गई, आंदोलन शांत हो गया, जांच समिति बन गई और बाद में नियुक्त अभ्यर्थी उसी पद पर बने रहे, तो सरकार पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

दूसरी ओर, यदि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के सभी नियुक्तियां समाप्त कर दी जाती हैं, तो नियुक्त अभ्यर्थी न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

इससे मामला एक नई कानूनी और राजनीतिक भूलभुलैया में फंस सकता है।

इसलिए सरकार को आधे-अधूरे फैसले से बचना होगा।

व्यावहारिक रास्ता यह हो सकता है कि सरकार विवादित चयन के आधार पर हुई सभी नियुक्तियों के लिए समयबद्ध विशेष सेवा-समीक्षा प्रक्रिया शुरू करे।

इस प्रक्रिया में प्रत्येक नियुक्ति की वैधानिक स्थिति स्पष्ट की जाए। संबंधित कर्मचारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। आदेश कारणयुक्त और नियमसम्मत हों तथा जरूरत पड़ने पर न्यायिक परीक्षण की कसौटी पर भी टिक सकें।

अर्थात नीति स्पष्ट होनी चाहिए-

नरमी नहीं, लेकिन मनमानी भी नहीं।

इस पूरे विवाद से निकलने का एक प्रभावी रास्ता नई और निष्पक्ष पुनर्परीक्षा हो सकता है।

जिन अभ्यर्थियों ने पहले परीक्षा दी थी, उन्हें दोबारा परीक्षा में शामिल होने का अवसर दिया जाए। उन्हें आवेदन शुल्क में राहत मिले, उचित आयु-सीमा छूट दी जाए और आवेदन प्रक्रिया को सरल रखा जाए।

नई परीक्षा ऐसी व्यवस्था के तहत हो, जिसमें प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परिणाम प्रकाशन तक बहुस्तरीय निगरानी हो।

इससे किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से दोषी ठहराए बिना चयन प्रक्रिया को दोबारा विश्वसनीय आधार पर स्थापित किया जा सकता है।

यदि विवादित नियुक्तियों पर कार्रवाई होती है तो सरकार के सामने प्रशासनिक कामकाज का सवाल भी आएगा। प्रखंडों, जिलों और विभागों में बड़ी संख्या में पद प्रभावित हो सकते हैं।

इसके लिए सरकार को अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करनी होगी। वैधानिक रूप से उपलब्ध अतिरिक्त प्रभार, विभागीय पदोन्नति या अन्य वैकल्पिक व्यवस्थाओं के माध्यम से कामकाज चलाया जा सकता है।

लेकिन प्रशासन चलाने के नाम पर विवादित नियुक्तियों को स्थायी संरक्षण देना भी उचित नहीं होगा।

साथ ही सरकार को नई भर्ती की स्पष्ट समयसीमा घोषित करनी चाहिए।

JSSC-CGL के 1,932 चयन और JPSC सिविल सेवा के 342 चयन को जोड़कर देखने पर भी तस्वीर पूरी नहीं होती। अलग-अलग भर्ती परीक्षाओं के स्थगन और जांच की खबरों से संकेत मिलता है कि समस्या परीक्षा संचालन की पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ चुकी है।

इसलिए सरकार को केवल TDPL की भूमिका तक सीमित रहने के बजाय परीक्षा प्रणाली की संरचना की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए।

परीक्षा संचालन में निजी एजेंसियों की भूमिका हो सकती है, लेकिन उनकी नियुक्ति, अनुबंध, निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए।

यदि किसी एजेंसी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे हैं, तो यह भी सार्वजनिक होना चाहिए कि-

  • एजेंसी को परीक्षा का काम किस प्रक्रिया से मिला?
  • निगरानी किस स्तर पर हुई?
  • सरकारी अधिकारियों की क्या जिम्मेदारी थी?
  • एसओपी का पालन क्यों नहीं हुआ?
  • उल्लंघन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई?
  • झारखंड सरकार को अब निम्न कदमों पर तेजी से आगे बढ़ना चाहिए-
  • TDPL से संबंधित सभी परीक्षाओं और उसकी भूमिका की आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक की जाए।
  • प्रत्येक परीक्षा के पदवार परिणाम और चयनित अभ्यर्थियों की संख्या जारी की जाए।
  • विवादित चयन के आधार पर हुई नियुक्तियों की वैधानिक समीक्षा शुरू की जाए।
  • नियुक्त कर्मचारियों की वर्तमान सेवा स्थिति सार्वजनिक की जाए।
  • पुनर्परीक्षा की स्पष्ट समयसीमा घोषित की जाए।
  • पुराने अभ्यर्थियों को आयु सीमा और आवेदन शुल्क में उचित राहत दी जाए।
  • नई परीक्षा के लिए बहुस्तरीय स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था बनाई जाए।
  • प्रश्नपत्र निर्माण, प्रिंटिंग, वितरण, परीक्षा केंद्र, मूल्यांकन और परिणाम तक हर चरण की जवाबदेही तय की जाए।
  • दोषी अधिकारियों और एजेंसियों की जिम्मेदारी तय की जाए।
  • पूरी प्रक्रिया के लिए समयबद्ध रोडमैप सार्वजनिक किया जाए।

झारखंड का प्रतियोगी परीक्षार्थी केवल सरकारी नौकरी नहीं मांग रहा। वह निष्पक्ष अवसर मांग रहा है।

जिस युवा ने वर्षों तैयारी की, परीक्षा दी और किसी कथित अनियमितता के कारण उसका भविष्य प्रभावित हुआ, उसके साथ न्याय होना चाहिए। साथ ही उस अभ्यर्थी के साथ भी अन्याय नहीं होना चाहिए जिसने पूरी ईमानदारी से परीक्षा दी और चयनित हुआ।

सरकारी नौकरी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। यह सार्वजनिक पद है और इसका आधार केवल नियुक्ति पत्र नहीं, बल्कि वैध, निष्पक्ष और विश्वसनीय चयन प्रक्रिया है।

इसलिए जिस चयन प्रक्रिया को सरकार ने निरस्त कर दिया है, उसके आधार पर हुई नियुक्तियों की स्थिति को सामान्य मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। उन सभी नियुक्तियों की वैधानिक समीक्षा आवश्यक है। साथ ही पुराने अभ्यर्थियों को निष्पक्ष पुनर्परीक्षा का अवसर मिलना चाहिए।

अब सरकार की असली परीक्षा शुरू हुई है।

यदि सरकार केवल आंदोलन समाप्त कराने के लिए परीक्षा रद्द करती है, तो कुछ समय बाद वही सवाल फिर खड़े होंगे। लेकिन यदि सरकार इस अवसर का उपयोग भर्ती व्यवस्था को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए करती है, तो आज का संकट भविष्य में व्यवस्था सुधार की मिसाल बन सकता है।

सरकार को यह स्पष्ट संदेश देना होगा-

यही युवाओं के साथ न्याय है और यही सुशासन की पहली शर्त भी।

अगर परीक्षा रद्द हुई, परिणाम रद्द हुआ और चयन भी रद्द हुआ, लेकिन उसी चयन से मिली नौकरियों को बचाने का कोई रास्ता निकाला गया, तो सवाल उठेगा-क्या व्यवस्था सुधरी है या केवल आंदोलन शांत किया गया है?

झारखंड के लाखों प्रतियोगी परीक्षार्थियों को अब इसी सवाल के जवाब का इंतजार है।