– एस०एन०चतुर्वेदी की रिपोर्ट
गुरु-शिष्य परंपरा और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण का दिया गया संदेश, विद्वानों ने विद्यार्थियों का किया मार्गदर्शन
जयपुर, 31 जुलाई। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर में विक्रम संवत् 2083 की आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा (व्यास पूर्णिमा) के पावन अवसर पर गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और गरिमामय वातावरण में आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय के नूतन भवन स्थित सभागार में आयोजित इस समारोह में गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को केंद्र में रखते हुए विविध कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए।
कार्यक्रम का शुभारंभ परिसर के प्रभारी निदेशक प्रो. विष्णुकान्त पाण्डेय के नेतृत्व में माता सरस्वती एवं महर्षि वेदव्यास के विधिवत पूजन-अर्चन के साथ हुआ। इसके पश्चात वैदिक एवं पौराणिक मंगलाचरण, राष्ट्रगीत तथा विश्वविद्यालय के कुलगीत का सामूहिक गायन किया गया। परिसर की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत स्वागत गीत ने समारोह को विशेष गरिमा प्रदान की।
समारोह की अध्यक्षता प्रभारी निदेशक प्रो. विष्णुकान्त पाण्डेय ने की। इस अवसर पर प्रतिष्ठिताचार्य प्रो. रामकुमार शर्मा एवं प्रो. वाई.एस. रमेश ने अपने उद्बोधनों में भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु के महत्व तथा गुरु-शिष्य संबंधों की विशिष्टता पर प्रकाश डालते हुए विद्यार्थियों को संस्कार, अनुशासन और ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर रहने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में विभिन्न विद्याशाखाओं के अध्यक्ष एवं समन्वयकों डॉ. सच्चिदानन्द स्नेही, प्रो. कृष्णा शर्मा, प्रो. रेखा पाण्डेय, प्रो. शुभस्मिता मिश्र एवं डॉ. आरती मीना ने भी गुरु पूर्णिमा के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए।

परिसर के सह-निदेशक (प्रशासनिक) प्रो. शीश राम ने विद्यार्थियों को आत्मविश्वास के साथ जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हुए कहा कि गुरु का मार्गदर्शन व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण और जीवन की सफलता का आधार होता है।
अध्यक्षीय संबोधन में प्रभारी निदेशक प्रो. विष्णुकान्त पाण्डेय ने प्रो. रामकुमार शर्मा एवं प्रो. वाई.एस. रमेश का अभिनंदन करते हुए व्याकरण एवं शास्त्रीय परंपरा की दृष्टि से ‘गुरु’ शब्द के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने विद्यार्थियों से भारतीय संस्कृति के मूल्यों, अनुशासन और ज्ञान को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया।
समारोह के दौरान मंचासीन प्रतिष्ठिताचार्यों, विद्याशाखा समन्वयकों, आचार्यों, सह-आचार्यों, सहायक आचार्यों एवं सह-निदेशकों को पुष्प-दंडिका, शॉल एवं माल्यार्पण कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने सांस्कृतिक एवं बौद्धिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भारतीय गुरु-परंपरा, संस्कृत साहित्य और ज्ञान संस्कृति का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। विश्वविद्यालय के कुलगीत का सामूहिक गायन समारोह का प्रमुख आकर्षण रहा।
Follow this link to JOIN our WhatsApp Community
कार्यक्रम के संयोजक प्रो. गौरांग बाघ ने स्वागत उद्बोधन एवं आयोजन में सहयोग देने वाले सभी शिक्षकों, कर्मचारियों, समिति सदस्यों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया। सह-संयोजक डॉ. दयानिधि शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया, जबकि कार्यक्रम का संचालन डॉ. सत्यकाम आर्य एवं डॉ. विनोद कुमार शर्मा ने संयुक्त रूप से किया।
समारोह के उपरांत विश्वविद्यालय की ओर से सभी विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के लिए अल्पाहार की व्यवस्था की गई। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। गुरु पूर्णिमा का यह आयोजन भारतीय ज्ञान परंपरा, गुरु-शिष्य संबंधों और संस्कृत की समृद्ध शास्त्रीय विरासत के प्रति विद्यार्थियों में श्रद्धा एवं जागरूकता को और सुदृढ़ करने वाला रहा।

