– Santosh Kr. Srivastav : Editor in Chief & Publisher
255 से अधिक छात्र-छात्राओं ने दिखाई प्रतिभा, वैदिक मंत्रों से गूंजा चिन्मय विद्यालय परिसर
बोकारो, 9 अगस्त। संस्कृत भारती, बोकारो के तत्वावधान में स्वर्गीय राम प्रताप दुबे की स्मृति में जिला स्तरीय अंतरविद्यालयीय संस्कृत समूहगान एवं संस्कृत समूह भावनृत्य प्रतियोगिता का आयोजन चिन्मय विद्यालय परिसर में किया गया। प्रतियोगिता में जिले के विभिन्न विद्यालयों से आए 255 से अधिक छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर अपनी प्रतिभा और संस्कृत के प्रति अनुराग का प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती एवं स्वामी चिन्मयानंद के चित्र पर माल्यार्पण, वैदिक दीप प्रज्वलन और मांगलिक मंत्रोच्चार के साथ हुआ। पूरे कार्यक्रम के दौरान संस्कृत गीत, समूहगान और भावनृत्य की प्रस्तुतियों ने वातावरण को सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक रंग से भर दिया।
संस्कृत को पहचान से जोड़ने पर जोर
कार्यक्रम की अध्यक्षता चिन्मय विद्यालय के उपप्राचार्य नरमेन्द्र कुमार ने की। मुख्य अतिथि एवं प्रतियोगिता के प्रायोजक समाजसेवी संतोष कुमार दुबे ने अपने संबोधन में कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक, राष्ट्रीय और मानवीय पहचान से जुड़ी महत्वपूर्ण विरासत है।
उन्होंने संस्कृत के प्रचार-प्रसार, संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति अपने संकल्प को दोहराते हुए कहा कि युवा पीढ़ी को संस्कृत का अध्ययन, अध्यापन, चिंतन और मनन कराने की आवश्यकता है। इससे विद्यार्थियों में नैतिक संस्कारों के साथ राष्ट्र और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होती है।
संस्कृत, संगीत और नृत्य के संगम का संदेश
संस्कृत भारती के मंत्री डॉ. उदय चंद्र झा ने कहा कि संस्कृत समाज के लिए संजीवनी के समान है। संस्कृत, शास्त्रीय संगीत और पारंपरिक नृत्य के त्रिवेणी संगम के माध्यम से समाज में सकारात्मक, ऊर्जावान और संस्कारपूर्ण वातावरण का निर्माण किया जा सकता है।
धनबाद क्षेत्र के संयोजक डॉ. विनय कुमार पांडेय ने संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता और नैतिक पक्ष पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने संस्कृत को सर्वकालिक सदाचार एवं भारतीय संस्कारों की जननी बताया।

राम प्रताप दुबे के योगदान को किया याद
कार्यक्रम के दौरान संस्कृत भारती के उपाध्यक्ष डॉ. आत्मानंद सिंह ऋषि ने स्वर्गीय राम प्रताप दुबे के जीवन, उनके आदर्शों तथा संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए किए गए उनके सेवा-संकल्पों को याद किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित व्यक्तित्वों के प्रयासों को आगे बढ़ाना समाज की जिम्मेदारी है।
प्रतियोगिता के निष्पक्ष मूल्यांकन के लिए राकेश, जगदीश बावला, अमित, रंजू, सोनल दत्त एवं डॉ. नरेंद्र राय ने निर्णायक की भूमिका निभाई। मंच का संचालन डॉ. श्रीहरि पांडेय, डॉ. विनय पांडेय एवं डॉ. शशिकांत पांडेय ने किया।
कार्यक्रम में डॉ. रामनारायण सिंह, डॉ. रोशन शर्मा, डॉ. भूपेंद्र गौतम, शशिकांत तिवारी, आरएम मलिक सहित संस्कृत भारती के शिक्षक, कार्यकर्ता, अभिभावक और बड़ी संख्या में संस्कृत प्रेमी उपस्थित रहे। विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित किया और संस्कृत भाषा एवं भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के प्रति नई पीढ़ी की रुचि को सामने रखा।

