JPSC नियुक्ति घोटाला: CBI जांच में कॉपियों से लेकर मेरिट लिस्ट तक गड़बड़ी के गंभीर आरोप

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– Santosh K Srivastav : Editor in Chief & Publisher

फॉरेंसिक जांच में नंबरों में हेरफेर, OMR शीट में फर्जीवाड़ा और उत्तर पुस्तिकाओं में काट-छांट के आरोप; 60 आरोपियों पर मुकदमा चलाने की सिफारिश

रांची, 28 जुलाई 2026। झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की दूसरी संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा से जुड़े कथित नियुक्ति घोटाले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की जांच में कई गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि मेधावी अभ्यर्थियों की जगह अपात्र उम्मीदवारों को लाभ पहुंचाने के लिए उत्तर पुस्तिकाओं, ओएमआर शीट और अंक तालिकाओं में कथित तौर पर व्यापक स्तर पर हेरफेर किया गया। सीबीआई ने मामले में 60 आरोपियों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी, कूटरचना और भ्रष्टाचार के आरोपों में मुकदमा चलाने की सिफारिश की है।

सीबीआई के अनुसार, जांच के दौरान संदिग्ध उत्तर पुस्तिकाओं की वैज्ञानिक जांच गुजरात के गांधीनगर स्थित फॉरेंसिक साइंस प्रयोगशाला से कराई गई। फॉरेंसिक रिपोर्ट में कई उत्तर पुस्तिकाओं में अंकों में बदलाव और काट-छांट की पुष्टि होने का दावा किया गया है। एजेंसी ने इन निष्कर्षों को अदालत के समक्ष साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया है।

जांच में यह भी आरोप लगाया गया है कि कई अभ्यर्थियों की ओएमआर शीट में बहुत कम उत्तर भरे गए थे, लेकिन आधिकारिक अंक तालिका में उन्हें वास्तविक प्रदर्शन से कहीं अधिक अंक दिए गए। सीबीआई का कहना है कि ओएमआर शीट और घोषित अंकों के बीच स्पष्ट विरोधाभास पाया गया, जो कथित अनियमितता का महत्वपूर्ण आधार बना।

मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में भी कथित तौर पर बड़े पैमाने पर काट-छांट और अंकों में वृद्धि के प्रमाण मिलने का दावा किया गया है। सीबीआई के अनुसार, कई उत्तर पुस्तिकाओं में मूल अंक बदलकर अधिक अंक दर्ज किए गए, जिससे मेरिट सूची प्रभावित हुई।

एजेंसी ने वर्ष 2019 में विशेषज्ञों के माध्यम से कई उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन भी कराया। जांच रिपोर्ट के अनुसार, कुछ मामलों में मूल मूल्यांकन और घोषित अंकों के बीच 30 से 80 प्रतिशत तक का अंतर पाया गया।

सीबीआई का यह भी दावा है कि पूछताछ के दौरान कई मूल्यांकनकर्ताओं ने मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने दबाव या निर्देश के आधार पर कुछ अभ्यर्थियों के अंक बढ़ाए थे। जांच में यह आरोप भी लगाया गया कि जिन अभ्यर्थियों के अंकों में सबसे अधिक वृद्धि हुई, उनमें से कई तत्कालीन आयोग पदाधिकारियों के रिश्तेदार थे।

रिपोर्ट में परीक्षा संचालन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। सीबीआई के अनुसार, स्कैनिंग, कोडिंग-डिकोडिंग और परिणाम तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य नियमों के विपरीत एक निजी व्यक्ति को सौंपे गए थे, जबकि उसकी नियुक्ति से संबंधित वैध प्रशासनिक अभिलेख उपलब्ध नहीं मिले।

जांच एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया है कि प्रश्नपत्र, उत्तर कुंजी और परीक्षा से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए, जिसे साक्ष्य नष्ट करने की संभावित कोशिश के रूप में देखा गया। इसके अलावा, प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में निर्धारित संख्या से कहीं अधिक अभ्यर्थियों को सफल घोषित किए जाने को भी जांच में नियमों के उल्लंघन का हिस्सा बताया गया है।

फिलहाल मामला न्यायालय में विचाराधीन है और जांच प्रक्रिया आगे भी जारी है। आरोपों पर संबंधित पक्षों की न्यायिक प्रक्रिया के तहत प्रतिक्रिया और अंतिम निर्णय आना शेष है।